Tuesday, September 6, 2016

गांधी हत्या: पटेल ने दी थी संघ को क्लीन चिट

आरएसएस के लोगों पर महात्मा गांधी की हत्या का आरोप लगाने, मुकरने और फिर मानहानि केस में डटने का फैसला लेकर राहुल गांधी ने बहुत समझदारी का परिचय नहीं दिया है। एक कुशल राजनेता के लक्षण यह होते हैं कि पहले तो वह बोलता ही तौल कर है और गलती से कुछ गड़बड़ हो जाए तो माफी मांगने से नहीं हिचकता। राहुल ने इनमें से किसी भी तरह की समझदारी नहीं दिखाई, हालांकि वह इसके लिए जाने भी नहीं जाते। राहुल ने सीधे तौर पर आरएसएस से जुड़े लोगों को महात्मा गांधी की हत्या के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया। उनके इस आरोप में कितनी सच्चाई है, इसके लिए हमें कुछ तथ्यों पर नजर डालनी होगी।

महात्मा गांधी की हत्या के बाद संघ पर लगे प्रतिबंध का हवाला देते हुए वामपंथी इतिहासकार इस मामले में आरएसएस को जिम्मेदार ठहराते रहे हैं। लेकिन, इससे बड़ा तथ्य यह रहा है कि आरएसएस पर जिस नेहरू सरकार ने बैन लगाया और गुरु गोलवलकर को गिरफ्तार किया था, उसी सरकार ने संघ पर से बैन हटाया भी था। कुछ लोग सरदार पटेल और नेहरू के बीच हुए पत्र व्यवहार के हवाले से संघ को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश करते रहे हैं। इस थिअरी में बड़ा झोल है। यह सच है कि पटेल ने नेहरू को लिखे एक पत्र में आरएसएस पर सांप्रदायिक तनाव पैदा करने का आरोप लगाया था। सिर्फ इसके आधार पर ही वामपंथी लेखक संघ पर गांधी हत्या का कलंक लगाने की कोशिश में रहते हैं।

पटेल ने दी थी आरएसएस को क्लीन चिट

दरअसल, यह तथ्यों की चोरी का मामला है। सरदार पटेल ने गृह मंत्री की हैसियत से प्रधानमंत्री नेहरू को 27 फरवरी, 1948 को लिखे पत्र में कहा था, ‘आरएसएस इस सबमें शामिल नहीं था। यह हिंदू महासभा की एक अतिवादी विंग थी, जिसने सावरकर के नेतृत्व में गांधी हत्या की साजिश रची।’उनका यह पत्र सीधे तौर पर आरएसएस को क्लीन चिट है। हालांकि अदालत में विनायक दामोदर सावरकर के खिलाफ लगे आरोप भी साबित नहीं हो सके। खास बात यह है कि सावरकर ने अपना मुकदमा खुद लड़ा और तथ्यों की जंग में जीत गए।

जुलाई, 1948 में संघ से बैन हटाने की मांग करते हुए नेहरू मंत्रीमंडल के सदस्य श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने पटेल को पत्र लिखकर संघ पर लगे बैन को हटाने और मुस्लिम समुदाय के एक वर्ग को ‘देशद्रोही’ बताया था। इस पत्र के जवाब में पटेल ने लिखा था, ‘आरएसएस की गतिविधियां सरकार और राज्य के समक्ष खतरा पैदा करती हैं। जहां तक मुस्लिमों की बात है, मैं आप से पूरी तरह सहमत हूं कि कुछ लोग देश के प्रति वफादार नहीं हैं और खतरा साबित हो सकते हैं।’

जाहिर है कि कांग्रेस के नेता होने की वजह से पटेल की कुछ सीमाएं थीं और वह आरएसएस का खुलकर समर्थन नहीं कर सकते थे। आखिर वह दूसरे ध्रुव पर जो खड़े थे। लेकिन, वामपंथी इतिहासकार इस तथ्य के एक सिरे को ही पकड़ते हैं, संघ की निंदा को तो उन्होंने हाथोंहाथ लिया, लेकिन मुस्लिम समुदाय के कट्टरवादी तबके के बारे में की गई उनकी टिप्पणी को हजम कर गए। यह सभी तथ्य सरदार पटेल पर प्रकाशित पुस्तक ‘कलेक्टड वर्क्स ऑफ सरदार वल्लभभाई पटेल’ में मौजूद हैं। लेकिन, वामपंथी इन तथ्यों का सुविधा के अनुसार इस्तेमाल करते रहे हैं।

कट्टर मुस्लिमों को पटेल ने दिया था पाक जाने का ऑफर

6 जनवरी, 1948 को लखनऊ में एक जनसभा को संबोधित करते हुए पटेल ने कट्टरवादी मुस्लिमों को चेताते हुए कहा, ‘आप लोग कश्मीर में पाकिस्तान के हमले की निंदा क्यों नहीं करते? आप दो घोड़ों की सवारी नहीं कर सकते। आप को एक घोड़ा चुनना होगा। जो लोग पाकिस्तान जाना चाहते हैं, वह जा सकते हैं और वहां शांति से रह सकते हैं।’

गांधी हत्या पर गठित आयोग ने दी क्लीन चिट

महात्मा गांधी की हत्या से जुड़े तथ्यों की पड़ताल के लिए तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने 1965 में जेएल कपूर आयोग गठित किया था। इस आयोग ने 1969 में रिपोर्ट सौंपी थी, जिसमें आरएसएस या आरएसएस के लोगों (जैसा राहुल गांधी का कहना है) को किसी भी तरह से जिम्मेदार नहीं माना गया। यहां तक कि महाराष्ट्र सरकार की ओर से सीआईडी और पुलिस कमिश्नर से मांगी गई रिपोर्ट में भी संघ पर कोई आरोप नहीं लगा। आयोग ने जिन लोगों से गवाही ली, उनमें से किसी ने भी गांधी हत्या के मामले में संघ की संलिप्तता को लेकर कोई बात नहीं की। अलबत्ता, संघ को विभाजन की त्रासदी में पाकिस्तान से लुट-पिटकर आने वाले हिंदुओं की मदद करने वाला संगठन करार दिया।

(नवभारत टाइम्स डॉट कॉम में प्रकाशित ब्लॉग)

Thursday, September 1, 2016

गिलगित-बाल्टिस्तान: पाकिस्तानी उत्पीड़न का स्थान

जम्मू-कश्मीर में भारत सरकार और सेना की भूमिका के मद्देनजर स्थानीय लोगों के मानवाधिकारों की अक्सर बात की जाती रही है। एक तबका तो ऐसा है, जो जम्मू-कश्मीर की तथाकथित आजादी के नाम पर अलगाववादियों को भी बौद्धिक समर्थन देता रहा है। लेकिन, हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। जम्मू-कश्मीर भी एक ऐसा सिक्का है, जिसके दो पहलू जगजाहिर हैं, पहला है भारत के हिस्से का जम्मू-कश्मीर और दूसरा पाकिस्तान द्वारा जबरन कब्जाया गया जम्मू-कश्मीर। निश्चित तौर पर एक देश के तौर पर यह हमारी असफलता है कि जम्मू-कश्मीर के एक तबके को हम आज भी भरोसे में नहीं ले पाए हैं।

लेकिन, दूसरा पहलू इससे भी कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है, जिस पर हमारे यहां बहुत कम चर्चा होती है। रणनीतिक तौर पर सरकारों की नजरों से ओझल होने के चलते हम भी पाकिस्तान द्वारा कब्जाए जम्मू-कश्मीर को भूल से गए हैं। लेकिन, पिछले दिनों जब एक बार फिर लंबे समय बाद केंद्र सरकार की ओर से इस मुद्दे को उठाया गया तो कुछ हलचल दिखी है। खुद प्रधानमंत्री ने बलूचिस्तान और पीओके (पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर) में मानवाधिकारों के हनन का मुद्दा उठाया है। लेकिन, बहुत कम लोग जानते हैं कि पाकिस्तान यहां किस तरह स्थानीय लोगों को कुचलने की कोशिश कर रहा है। आइए आज बात करते हैं, गिलगित-बाल्टिस्तान की।

करीब 15 लाख की आबादी और 72,494 स्क्वेयर किलोमीटर क्षेत्रफल वाले गिलगित-बाल्टिस्तान को पाकिस्तान में पीओके के उत्तरी क्षेत्र के नाम से जाना जाता है। पांच जिलों में बंटे इस उत्तरी क्षेत्र की बड़ी आबादी शियाओं और इस्माइलियों की है, जिन्हें सुन्नी इस्लामिक राष्ट्र पाकिस्तान में लगातार प्रताड़ित किया जा रहा है। इस इलाके के मूल निवासी शियाओं, इस्माइलियों और विभिन्न जनजातियों के उत्पीड़न की कहानी लंबी है। पाक ने यहां के लोगों को हमेशा ही सांप्रदायिक आधार पर लड़ाने की कोशिश की है ताकि उसके उत्पीड़न के खिलाफ एकजुटता न हो सके।

अब तक के सबसे कट्टर इस्लामिक राष्ट्रपतियों में से एक जिया-उल हक के मार्शल लॉ के दौर में इस्लाम के नाम पर यहां शरीयत लागू कर दिया गया। 1982 के बाद से ही यहां सांप्रदायिक हिंसा का दौर जारी है। 1988 में पाक सेना ने यहां कई शिया प्रदर्शनकारियों को जिंदा फूंक दिया था। 1996 में बाहरी लोगों को बसाने का विरोध कर रहे शियाओं पर पाक सेना ने ताबड़तोड़ फायरिंग की थी। यहां पहली बार अक्टूबर 1994 में चुनाव हुए थे, जिसके बाद 26 सदस्यीय नॉर्दन एरियाज एग्जिक्यूटिव काउंसिल का गठन किया गया। लेकिन, मार्च 1995 में कहा गया कि इस काउंसिल के पास किसी तरह के कानून को पारित करने का अधिकार नहीं होगा, यह काउंसिल सिर्फ सलाह दे सकती है।

इस्लामाबाद से ही चलता है शासन

गिलगित-बाल्टिस्तान की सत्ता की कमान पाक सरकार के अंतर्गत काम करने वाले कश्मीर एवं नॉर्दन एरियाज अफेयर्स मिनिस्ट्री के पास है। इसका मुखिया इस्लामाबाद में स्थिति पाक सरकार का जॉइंट सेक्रटरी होता है, जिसके पास सभी मामलों के निपटारे की ताकत होती है। यहां की सिविल, पुलिस और सुरक्षा सेवाओं में पाकिस्तानियों को ही नियुक्ति दी जाती है। न्यायिक आयुक्त की ओर से सुनाया गया कोई भी फैसला यहां अंतिम होता है, इसके खिलाफ कहीं अपील नहीं की जा सकती।

डिमॉग्रफी बदलने में जुटा है पाकिस्तान

पाकिस्तान की कोशिश है कि यहां कि आबादी के संतुलन को पूरी तरह अपने पक्ष में कर लिया जाए। स्थानीय लोगों को अल्पसंख्यक बनाने की नीति के तहत पाक ने गिलगित और स्कर्दू में बड़े पैमाने पर बाहरी लोगों को जमीन आवंटित की है।  यह यूनाइटेड नेशंस कमिशन फॉर इंडिया ऐंड पाकिस्तान के प्रस्तावों का भी उल्लंघन है। यह बाहरी लोग स्थानीय समुदायों की अपेक्षा आर्थिक तौर पर समृद्ध हैं और सरकार के समर्थन से इनका उत्पीड़न कर रहे हैं। 2001 की जनगणना के मुताबिक बाहरी और स्थानीय लोगों की जनसंख्या का अनुपात 3:4 हो गया है, जो करीब एक दशक पहले ही 1:4 था। पंजाबी और पख्तून मूल के लोगों की यहां तेजी से बढ़ती आबादी के चलते स्थानीय लोग असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।

भारत का सिरदर्द बढ़ा रहा है चीन का दखल

1963 में पाकिस्तान ने सीमा समझौते के नाम पर गिलगित बाल्टिस्तान के रणनीतिक तौर पर बेहद महत्पूर्ण 5,180 स्क्वेयर किलोमीटर हिस्से को चीन को सौंप दिया था। पाकिस्तान ने इस इलाके को काराकोरम हाईवे बनाने के नाम पर चीन को सौंपा है। इस तरह चीन को पेइचिंग से कराची तक ‘लैंड लिंक’ की सुविधा मिल गई। अब दोनों देशों के बीच इस इलाके को चीन-पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरीडोर के तौर पर विकसित करने का करार हुआ है। इसमें स्थानीय लोगों से औने-पौने दामों पर जमीन लेकर उन्हें खदेड़ा जा रहा है। यहां हालिया हिंसा और विरोध प्रदर्शनों की बड़ी वजह चीन प्रायोजित परियोजनाओं के लिए अधिग्रहण ही है।

पाक सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक भारत के हिस्से में गिलगित-बाल्टिस्तान

पाकिस्तान के संविधान में गिलगित-बाल्टिस्तान के स्टेटस के बारे में कुछ नहीं कहा गया है। हालांकि कश्मीर को विवादित राज्य बताया गया है। नॉर्दन एरियाज यानी गिलगित बाल्टिस्तान के स्टेटस को लेकर दायर की गई एक याचिका की सुनवाई करते हुए पीओके हाईकोर्ट ने मार्च 1993 में एक फैसले में पाक सरकार की प्रशासनिक व्यवस्था की तीखी आलोचना करते हुए कहा था कि इस इलाके की सत्ता पीओके सरकार के हाथ होनी चाहिए और पाक सरकार को इसकी मदद करनी चाहिए। इस फैसले के खिलाफ पाक सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी। इस पर सुनवाई करते हुए 14 सिंतबर, 1994 को पारित आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, ‘उत्तरी क्षेत्र भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर राज्य के हिस्से हैं। यह आजाद कश्मीर यानी पीओके का हिस्सा नहीं हैं जैसा कि आजाद कश्मीर के अंतरिम संविधान ऐक्ट 1974 में कहा गया है।’

(नवभारत टाइम्स डॉट कॉम के ब्लॉग में प्रकाशित)

Wednesday, August 10, 2016

ऐसे पत्रकारों को तो लोग ‘दलाल’ ही कहेंगे!

पत्रकार की भूमिका क्या है? एक पत्रकार के नाते इस सवाल का जवाब मुझे हमेशा यही मिला है कि जहां भी आप हो, वहां से हर मसले को निरपेक्ष दृष्टि से देखना। लेकिन, जब कोई पत्रकार किसी राजनीतिक दल का कार्यकर्ता अधिक हो जाए और उसका अपने पेशे से सरोकार सिर्फ अपनी विचारधारा के पोषण तक सीमित हो जाए तो इसे क्या कहेंगे? जाहिर है इन्हें पत्रकार नहीं, बल्कि राजनीतिक संगठन का कार्यकर्ता कहा जाएगा (भावनाओं पर काबू न रख पाने वाले लोग तो ‘दलाल’ तक कह देते हैं)। इसका एक उदाहरण नीचे संलग्न एक गोष्ठी का पत्रक है, जिसमें खुद को देश के निष्पक्ष पत्रकारों में शुमार करने वाले ओम थानवी एक सेशन के अध्यक्ष के तौर पर शिरकत करने वाले हैं। इस प्रॉपेगेंडा गोष्ठी का नाम है, ‘संघ का आतंकवाद और न्याय की असफलता’। कॉन्स्टिट्यूशन क्लब दिल्ली में प्रस्तावित कार्यक्रम के लिए छपे इस पत्रक में संघ के स्वयंसेवक (जिसकी मूंछे आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत जैसी दिखाई गई हैं) की प्रतीकात्मक तस्वीर इस्तेमाल की गई है। यानी साफ तौर पर संघ को एक आतंकी संगठन के तौर पर चित्रित करने की कोशिश की गई है।

इस गोष्ठी में हेमंत करकरे की मौत पर सवाल, देश की न्यायिक व्यवस्था का पूर्वाग्रह और ‘संघी आतंकवाद के खतरे’ जैसे फर्जी विषय शामिल किए गए हैं। इस कार्यक्रम के वक्ताओं की सूची पर भी एक बार नजर डाल लीजिए, इनमें हर्ष मंदर, तीस्ता सीतलवाड़, सुभाष गाताडे, शशि थरूर, मनोज झा, कविता कृष्णन, प्रफेसर अपूर्वानंद और सीताराम येचुरी जैसे लोग शामिल हैं। इस पूरी गैंग की विचारधारा क्या है, इसके बारे में बताने की जरूरत नहीं है। हर्ष मंदर वह व्यक्ति हैं, जो यूपीए सरकार के दौरान सोनिया गांधी की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद में सदस्य थे। आरएसएस से इनकी पुरानी वैचारिक रंजिश है। शशि थरूर तो कांग्रेस के सांसद हैं ही। प्रफेसर अपूर्वानंद एक शिक्षक से ज्यादा काम देश में वाम विचारधारा के प्रचारक का करते रहे हैं। तीस्ता सीतलवाड़ को कौन नहीं जानता, इन्हीं के एनजीओ की विदेशी फंडिंग पर सरकार ने बैन लगाया है। पीएम नरेंद्र मोदी के खिलाफ तमाम मुकदमों की अगुवा रही हैं। सीताराम येचुरी तो आखिर सीपीएम के महासचिव हैं ही।
इनका इतिहास बताता है कि ये लोग ऐसा ही कार्यक्रम आयोजित कर सकते हैं।

चिंता का सबब है ओम थानवी का इस गोष्ठी का मेहमान बनना। वह तो खुद को निरपेक्ष पत्रकारों में से एक बताते रहे हैं (हालांकि वह कभी रहे नहीं)। थानवी का इस कार्यक्रम के मेहमानों में शामिल होना बताता है कि देश में पत्रकारों की एक जमात किस हद तक गिरने पर उतारू है। ऐसे में यदि कोई इन्हें ‘दलाल’ कहता है तो क्या बुरा है? खुद इस पेशे में होने के चलते पत्रकारों के लिए ऐसे संबोधन मुझे आहत करते हैं, लेकिन अब मैं कहूंगा कि जहां थानवी जैसे हों, वहां ऐसे कहने वाले भी गलत नहीं हैं।

इस पूरी गोष्ठी की थीम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को आतंकी संगठन करार देने की है। मेरा मानना है कि इन लोगों को इस गोष्ठी के आयोजन की अनुमति ही नहीं दी जानी चाहिए। आखिर कैसे कोई बिना किसी तथ्य के किसी संगठन को आतंकवादी करार दे सकता है? यदि आपको संघ के आतंकी घटनाओं में लिप्त होने का विश्वास है तो अदालत में केस करिए। ऐसे प्रॉपेगेंडा कार्यक्रमों से क्या होगा? लेकिन यह न्यायालय क्यों जाएं, इन्होंनें तो न्यायिक व्यवस्था को ही पूर्वाग्रही करार दे दिया है। इन कथित बुद्धिजीवियों, नेताओं और पत्रकारों के इस गैंग की ओर से प्रस्तावित यह कार्यक्रम सीधे तौर पर देश की व्यवस्था को एक चुनौती है। अब इन्हें ‘दलाल’ और ‘देशद्रोही’ न कहा जाए तो क्या कहा जाए?

यह बात बिल्कुल सही है कि संघ में खामियां हैं, उसकी विचारधारा से किसी का भी असहमति रखने का अधिकार है। लेकिन आप कैसे बिना सबूत के इस तरह का अनर्गल आरोप लगा सकते हैं? यह ठीक ऐसा ही है, जैसे संघ की विचारधारा से प्रभावित पत्रकार और विचारक कांग्रेस और सीपीएम जैसे दलों को आतंकी संगठन घोषित करने का प्रॉपेगेंडा रचने के लिए किसी गोष्ठी का आयोजन करें।

राहुल गांधी को लगी फटकार से सीखें

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने संघ के लोगों को महात्मा गांधी का हत्यारा करार देने वाले बयान को लेकर यह कहते हुए फटकार लगाई थी कि आप किसी संगठन की छवि इस तरह धूमिल नहीं कर सकते। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, ‘जब आप किसी व्यक्ति या संस्था के बारे में बोलते हैं तो आपको सतर्क रहना चाहिए। नाथूराम गोडसे ने गांधीजी को मारा और आरएसएस के लोगों ने गांधीजी को मारा, इन दोनों बातों में बहुत फर्क है।’

अदालत ने इस मामले में राहुल को आपराधिक मामले से बचने के लिए संघ से माफी की सलाह दी है। बिना सोचे समझे किसी संगठन पर इस तरह का कुख्यात आरोप लगाने वालों के लिए सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला एक सबक है। इस गोष्ठी के आयोजकों को इस फैसले से सीखना चाहिए। यदि इन्हें वास्तव में लगता है कि संघ आतंकी संगठन है तो अपनी लंबी-चौड़ी वकील लॉबी के जरिए कोर्ट में याचिका दायर करें। यह गैंग जब याकूब मेमन जैसी आतंकी के बचाव में आधी रात को सुप्रीम कोर्ट पहुंच सकती है, तो फिर संघ के खिलाफ रात में न सही दिन के उजाले में याचिका दायर करें।

रस्सी जल गई, लेकिन ऐंठ न गई

यह कहावत शायद किसी ने वाम विचारधारा वाले लोगों के लिए ही रची थी। देशविरोधी बयानों, समाज को तोड़ने के अजेंडे, समुदाय विशेष के तुष्टिकरण, आतंकवाद के बचाव के लिए कुतर्क गढ़ने के इनके कृत्यों के चलते ही देश की जनता ने इन्हें खारिज कर दिया है। लेकिन, मीडिया और अकादमिक जगत में कुंडली मारे बैठा इनका एक गिरोह आज भी अपने कुत्सित प्रयासों में लगा हुआ है। राजनीतिक तौर पर देश की जनता ने इन्हें एक तरह से खत्म कर ही दिया है, यही हाल रहा तो मीडिया और अकादमिक जगत में भी इनकी विश्वसनीयता समाप्त हो जाएगी।

Monday, July 25, 2016

माया जी! यह बुद्ध का संदेश तो नहीं है...

घृणा, घृणा करने से कम नहीं होती, बल्कि प्रेम से घटती है, यही शाश्वत नियम है। यह कहना था भगवान बुद्ध का। बीजेपी नेता दयाशंकर सिंह की ओर से मायावती की तुलना ‘वेश्या’ से किए जाने के बाद उबले बीएसपी के ज्यादातर नेताओं और कार्यकर्ताओं ने जिस तरह की प्रतिक्रिया दी, वह इस संदेश के पूरी तरह विपरीत है। खुद बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने कहा, ‘उसने जो कहा, वह अपनी बहन-बेटी के लिए कहा है।’ राज्यसभा में उनकी यह प्रतिक्रिया भी मर्यादित नहीं कही जा सकती। आखिर दयाशंकर की इस टिप्पणी के जवाब में उनकी बहन-बेटी पर निशाना साधना कैसे जायज हो सकता है? दयाशंकर ने जो कहा वह कितना निंदनीय है और किस तरह पुरुषवादी एवं दलित विरोधी सोच का प्रतीक है, इसके बारे में कुछ कहने की जरूरत नहीं है।


लेकिन मायावती बड़ी नेता हैं, उनका बड़प्पन और बढ़ता यदि वह जैसे को तैसे की प्रतिक्रिया देने की बजाय खुद को पीड़ित के तौर पर ही पेश करतीं। वह उनके राजनीतिक हितों के भी अनुकूल रहता और दयाशंकर जैसे लोगों के खिलाफ एकसुर में निंदा का माहौल बनता। लेकिन बीएसपी के लोगों ने उनके ‘डीएनए में कमी’ बताकर और ‘दयाशंकर कुत्ते को फांसी दो’ जैसे नारे लगाकर भी सभ्यता का परिचय नहीं दिया। यह ऐसा ही है कि कोई शोहदा यदि राह चलते किसी लड़की से बदतमीजी कर दे तो भीड़ उसके घर पर चढ़ जाए और उसके परिवार की महिलाओं से उसका बदला लेने की कोशिश करे।

कांशीराम के नेतृत्व में जिस तरह से बीएसपी का उभार हुआ और मायावती ने उनके बाद दलित समाज की मुखर आवाज के तौर पर जिम्मेदारी संभाली, उसका मैं भी कायल हूं। उत्तर प्रदेश जैसे जटिल राजनीतिक परिस्थितियों वाले राज्य में मायावती ने कुशल प्रशासन देकर लोगों का भरोसा जीता है। लेकिन यह उनके व्यक्तित्व और कार्यशैली की ही कमी है कि समाज का एक बड़ा तबका आज भी उनको वोट नहीं देता। एक बड़ा वर्ग ऐसा है, जो मानता है कि मायावती बदले की राजनीति करती हैं।

बीते कार्यकाल की उनकी सोशल इंजिनियरिंग को छोड़ दें तो जिस तरह से उन्होंने ‘तिलक तराजू और तलवार…’ जैसे कुख्यात नारे दिए थे, वह भी कम समाज विध्वंसक नहीं थे। आखिर कोई कैसे किसी जाति विशेष के खिलाफ इस तरह के नारे लगा सकता है। लेकिन समाज में यह भी हुआ, इसे लोगों की सहिष्णुता ही कहा जाएगा कि इसके बदले में दूसरे नारे नहीं उछले।

2007 से 2012 के अपने मुख्यमंत्रित्व काल में माया ने यह साबित करने की कोशिश की थी कि उनके राज में गैर-दलितों के भी हित सुरक्षित हैं। लेकिन दयाशंकर सिंह के विरोध में जिस तरह के नारे उछले हैं, वह एक बार फिर आशंका पैदा करते हैं। यदि मायावती और बीएसपी को लगता है कि ऐसे प्रदर्शनों से दलित समाज थोक में उन्हें वोट देगा तो वे सही हो सकते हैं, लेकिन यह भी सच है कि इससे सोशल इंजिनियरिंग के दौर में जुड़ा गैर-दलित वर्ग उनसे छिटक भी सकता है। दयाशंकर के आपत्तिजनक बयान पर बीएसपी राजनीति कर रही है, इसका उसे हक भी है। लेकिन, जिस तरह की रणनीति उसने अपनाई है, वह बैकफायर कर सकती है। इस प्रकरण से मायावती सूबे की जनता में खुद को पीड़ित पक्ष के तौर पर पेश कर सकती थीं, लेकिन जैसा रुख खुद उन्होंने और समर्थकों ने अख्तियार किया है, वह उल्टे नुकसान ही पहुंचाएगा।

पीएम नरेंद्र मोदी से सीखें मायावती

2014 के आम चुनावों से कुछ महीने पहले कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक चल रही थी। एक पत्रकार ने मणिशंकर अय्यर से मोदी को लेकर सवाल पूछा तो उनका जवाब था, ’21वीं शताब्दी में वह (नरेंद्र मोदी) प्रधानमंत्री बन पाएं, ऐसा कतई मुमकिन नहीं है… लेकिन यदि वह यहां (कांग्रेस अधिवेशन में) आकर चाय बेचना चाहें तो हम उनके लिए जगह बना सकते हैं।’ इस बयान के जवाब में मोदी ने यह नहीं कहा था कि मणिशंकर अय्यर या अन्य कोई कांग्रेसी बीजेपी अधिवेशन में आकर चाय बेचे या पानी पिलाए, बल्कि राजनीतिक चातुर्य दिखाते हुए उन्होंने खुद को गरीब, शोषित और पीड़ित के तौर पर पेश किया। उनका यह कार्ड किस तरह से चला, इसकी बानगी आम चुनाव के नतीजे हैं।

यह महात्मा बुद्ध का संदेश नहीं है

बीएसपी के लोग महात्मा बुद्ध का अनुसरण करने की बात करते हैं। उनका पहला सिद्धांत ही सहिष्णुता है। कहा जाता है कि भारतीय समाज में बढ़ती हिंसा के चलते ही बौद्ध मत का प्रसार बढ़ा। लेकिन, दयाशंकर के आपत्तिजनक बयान के विरोध में बुद्ध के कथित अनुयायी जिस तरह के नारे उछाल रहे हैं और उनकी बहन-बेटियों पर टिप्पणी कर रहे हैं, वह भी मर्यादा के अनुकूल नहीं हैं। मायावती और उनके समर्थकों को सोचना ही चाहिए कि बुद्ध के किस संदेश को मानते हुए वह ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ की ओर बढ़ रहे हैं।

(नवभारत टाइम्स डॉट कॉम में प्रकाशित ब्लॉग)

यहीं खत्म होना था बुरहान का सफर

मौत। हर इंसान का अंत एक दिन इसके साथ ही होता है, लेकिन जीवन भर उसके कामों के हिसाब से ही मौत के बाद उसे जाना जाता है। कई बार तो उसके कामों के आधार पर ही तय होता है कि उसे कौन सी मौत मिलेगी। तो हिज्बुल मुजाहिदीन के आतंकी बुरहान वानी को जो मौत मिली, वह उसके कर्मों के मुताबिक ही थी।  होश संभालने के साथ ही यह लड़का आतंकी संगठन में शामिल हो गया था, आतंक का पोस्टर बॉय बना और 22 साल की उम्र में ही एक एनकाउंटर में वह ढेर हो गया। ढेर हो गया या फिर कर दिया गया, यह किसी आतंकी या गैंगस्टर के लिए ही लिखा जाता है। सामान्य लोगों का निधन होता है और महान आत्माएं तो ‘खुद’ अपना शरीर त्याग देती हैं।


मौत के उल्लेख का यह वर्गीकरण व्यक्ति के कर्मों के मुताबिक ही है। इसके बावजूद भी ऐसे कई कथित बुद्धिजीवी पाए जा रहे हैं, जो अपनी कलमकारिता से यह बताने में जुटे हैं कि बुरहान वानी ‘क्रांतिकारी’ था और उस आतंकी की तुलना भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद की शहादत से कर रहे हैं यानी उसकी मौत को शहीद होना बता रहे हैं।

ऐसे लोगों ने यह कुत्सित प्रयास पहली बार नहीं किया है। इनकी कलमें पहले भी अफजल गुरु और याकूब मेमन की फांसी के विरोध में चली थीं। इस तबके की विशेषता यह है कि ये तथ्यों और तर्कों को तोड़-मरोड़कर पेश करने की महारथ रखते हैं। किस उदाहरण को कहां इस्तेमाल कर दें, इसका भी कोई अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।

कुछ मीडिया समूह और तथाकथित उदारवादी तो एक तरह से कैंपेन चला रहे हैं और बताने में जुटे हैं कि कैसे बुरहान वानी कश्मीरियों के लिए शहीद था। तर्कों की दुष्टता यहां तक कि कश्मीर की ‘आजादी’ की मांग की तुलना भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से कर रहे हैं। ऐसे ही कुछ तर्कों के जवाब-

एक बेटा जायदाद बेचने का फैसला नहीं ले सकता

जम्मू-कश्मीर के 2,22,236 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में से 1,01,387 वर्ग किलोमीटर का इलाका भारत के हिस्से में है। इसमें से 26,293 वर्ग किमी में जम्मू बसा है, जबकि 59,146 किलोमीटर का क्षेत्रफल लद्दाख का इलाका है, बाकी बचा 15,948 वर्ग किमी का हिस्सा कश्मीर घाटी का है। यानी कश्मीर घाटी का क्षेत्रफल लद्दाख और जम्मू की तुलना में बेहद कम है।

कथित तौर पर आजादी की मांग करने वालों का बहुमत इसी इलाके में बसता है, लेकिन अलगाववादी संगठन और इनके समर्थक लेखक समूह इसे पूरा राज्य की मांग बताने पर तुले हैं। अगर किसी घर में 3 बेटे हों (जम्मू, लद्दाख और कश्मीर) तो फिर कश्मीर से पूछकर ही आजादी का फैसला क्यों होना चाहिए। फिर इसी कश्मीर घाटी में आधा हिस्सा उन कश्मीरी पंडितों और सिखों का है, जिन्हें अमानवीय प्रताड़नाएं देकर इस्लामिक आतंकवादियों ने उनके घर से खदेड़ दिया। आज वह दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। इन लोगों का भी जम्मू-कश्मीर के जर्रे-जर्रे पर उतना ही हक है, जितना घाटी के अलगाववादियों का।

पूरा जम्मू-कश्मीर अशांत नहीं

अलगाववाद समर्थक लेखक समूह तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करते हुए यह साबित करने में जुटे रहते हैं कि पूरा जम्मू-कश्मीर ही अशांत है। ऐसा नहीं है, जम्मू और लद्दाख में कभी कोई पत्थर नहीं उछला। कश्मीर घाटी की समस्या भी किस तरह से अलगाववादियों की देन है, यह भी किसी से छिपा नहीं है।

पिछले दिनों ही एक अलगाववादी नेता के बेटे ने कहा था कि गोली खाने के लिए गरीब ही क्यों हैं, आखिर इन नेताओं के बेटे खुद बंदूकें लेकर क्यों नहीं उतरते? साफ है कि इस समस्या की जड़ में पाकिस्तान के पैसों से फल-फूल रहे अलगाववादी और वे आतंकवादी हैं, जो सूबे में इस्लामी निजाम की स्थापना के लिए गोलियां चला रहे हैं। बुरहान की मां ने भी एक न्यूज पोर्टल से बातचीत में कहा है, ‘मेरा बेटा इस्लामी निजाम के लिए मरा, काफिरों से लड़ते हुए।’

यह जंग बर्बादी की है

इन आतंकियों और अलगाववादियों को अपनी कलम से खाद-पानी देने वाले लोग इसे आजादी का संघर्ष बताते हुए बुरहान जैसों की तुलना भगत सिंह से करते हैं। ध्यान देने की जरूरत है कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की आग पूरे देश में धधक रही थी। ऐसा नहीं था कि किसी राज्य में आजादी की जंग न चल रही हो। कश्मीर में एक विशेष समुदाय के कुछ भटके हुए लोग आतंकवाद की राह पर निकल पड़े हैं, इसे आजादी की जंग कैसे कहा जा सकता है?

इन आतंकियों के परिवार के लोग तो खुद स्वीकार कर रहे हैं कि उनके बेटे इस्लामी निजाम की स्थापना के लिए मरे हैं। एक तथ्य और कि आजादी की जंग में इस्लामिक स्टेट जैसे खूंखार आतंकी संगठनों के झंडे नहीं लहराए जाते। IS के झंडे लेकर जो जंग लड़ी जा रही हो, वह आजादी की तो नहीं बर्बादी की जरूर हो सकती है।

(नवभारत टाइम्स डॉट कॉम में प्रकाशित ब्लॉग)