Thursday, March 22, 2012

सांस्कृतिक पत्रकारिता के प्रकाशस्तंभ- हनुमान प्रसाद पोद्दार

भारत में पत्रकारिता का क्षेत्र राजनीति, अर्थव्यवस्था और वैश्विक उथल-पुथल की जानकारी देने तक ही सीमित नहीं है। भारत वह संस्कृति है जो विभिन्न आघातों और संक्रमण के बाद भी अपने मूल रूप में विद्यमान है। भारत की महान संस्कृति के यशोगान के लिए पत्रकारिता ने भी अपना योगदान दिया है। जिसे प्रायः सांस्कृतिक पत्रकारिता भी कहते हैं। संस्कृति का व्याख्यान करना और उसके आयामों को स्पष्ट करने का कार्य सांस्कृतिक पत्रकारिता के माध्यम से होता आया है। भारत में सांस्कृतिक पत्रकारिता की श्रृंखला में गीता प्रेस के संस्थापक सदस्य रहे हनुमान प्रसाद पोद्दार का नाम भी उल्लेखनीय है।

हनुमान प्रसाद पोद्दार का जन्म शनिवार, 17 दिसंबर, 1890 को राजस्थान के रतनगढ़ में हुआ था। उनके पिता का नाम भीमराज तथा माता का नाम रिखीबाई था। बाल्यावस्था में ही बालक हनुमान की माता रिखीबाई कभी न पूर्ण होने वाली कमी देकर चली गईं। उसके पश्चात दादी मां रामकौर देवी ने ही बालक का पालन-पोषण किया। दादी रामकौर देवी के सान्निध्य में बालक को भारतीय परंपरा और संस्कृति विरासत में मिली थीं, जिसकी उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से आजीवन सेवा की।

‘कल्याण‘ मासिक पत्र के संपादक के रूप में पोद्दार जी का पत्रकारिता के क्षेत्र में विशेष स्थान है। ‘कल्याण‘ के संपादक के रूप में हनुमान प्रसाद जी को विश्व भर के आध्यात्म प्रेमियों के बीच लोकप्रियता मिली। ‘कल्याण‘ के संपादन के अलावा उनको गीता-प्रेस में दिए गए योगदान के लिए जाना जाता है। गीता-प्रेस के आजीवन ट्रस्टी रहे पोददार जी की गीता-प्रेस के संस्थापक जयदयाल गोयनका से प्रगाढ़ मित्रता थी। जयदयाल गोयनका को गीता में गहरी रूचि थी, वे प्रतिदिन गीता का अध्ययन किया करते थे और विभिन्न स्थानों में घूम-घूम कर गीता का प्रचार भी किया करते थे। गीता को आमजन तक पहुंचाने के लिए शुद्ध पाठवाली पुस्तक की आवश्यकता थी जो उस समय उपलब्ध नहीं थी।

गोयनका जी ने गीता की व्याख्या कर कलकत्ता के वणिक प्रेस से पांच हजार प्रतियां छपवायीं। जिसमें मुद्रण से संबंधित विभिन्न गलतियां थीं, अतः उन्होंने धार्मिक-आध्यात्मिक प्रकाशन हेतु सन 1923 में गीता-प्रेस की स्थापना की। गीता-प्रेस की स्थापना यद्यपि जयदयाल गोयनका ने की, किंतु संपादन की जिम्मेदारी हनुमान प्रसाद पोद्दार के पास ही थी। वे गीता-प्रेस के ट्रस्टी भी थे।

गीता प्रेस के माध्यम से उन्होंने भारतीय संस्कृति की सेवा करते हुए भारत के समृद्ध ग्रंथों एवं परंपराओं की व्याख्या कर उनको जन-जन तक पहुंचाने का कार्य किया। भारतीय संस्कृति को लेकर किसी प्रकाशन ने यदि कोई पहल की है तो निर्विवाद रूप से गीता प्रेस उनमें से प्रथम है। हनुमान प्रसाद पोद्दार ने मुख्यतः आध्यात्मिक विषयों पर ही लिखा है, उन्होंने अपने लेखन की शुरूआत विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख एवं निबंधों के लेखन से की थी। उनके लेख एवं निबंधों का पुस्तक रूप में संकलन कर उनको श्रद्धांजलि देते हुए ‘पावन स्मरण‘ किया गया है। उनके लेखों एवं निबंधों को निम्न चार श्रेणियों में दिया गया है-

1- आध्यात्मिक

2- राष्ट्रीय

3- नीतिमूलक

4- विधि (परामर्शमूलक, संस्मरणात्मक, सामाजिक)

उन्होंने निबंधों एवं लेखों के अलावा विभिन्न टीका साहित्य का भी सर्जन किया। हनुमान प्रसाद पोद्दार ने रामचरितमानस, विनयपत्रिका, दोहावली की विशद टीका प्रस्तुत की।सन 1927 में गीता-प्रेस से ही ‘कल्याण‘ का भी प्रकाशन होने लगा। ‘कल्याण‘ के प्रकाशन की शुरूआत का भी बड़ा रोचक प्रसंग है। सन 1926 में मारवाड़ी अग्रवाल महासभा का अधिवेशन दिल्ली में होना था। उस अधिवेशन के स्वागताध्यक्ष आत्माराम खेमका थे। वे शास्त्रज्ञ थे, किंतु हिंदी में व्याख्यान नहीं लिख सकते थे। सेठ जयदयाल गोयनका की प्रेरणा से स्वागत भाषण लिखने की जिम्मेदारी हनुमान प्रसाद पोद्दार को दी गई। हनुमान प्रसाद जी के लिखे स्वागत भाषण ने अधिवेशन में आए लोगों को मुग्ध कर दिया। इस स्वागत भाषण को सुनने के बाद सेठ जमुनालाल बजाज ने हनुमान प्रसाद जी को पत्र चलाने का प्रस्ताव दिया। यही प्रस्ताव आगे चलकर ‘कल्याण‘ मासिक पत्र के रूप में सामने आया। ‘कल्याण‘ का प्रथम अंक प्रकाशित हुआ जिसके मुख पृष्ठ पर ‘वन्दौ चरन सरोज तुम्हारे‘ पद छपा था। संपादकीय पृष्ठ पर ‘कल्याण‘ का उददेश्य लिखित था जिसके शब्द इस प्रकार थे-

‘‘कल्याण की आवश्यकता सब को है। जगत में ऐसा कौन मनुष्य है जो अपना कल्याण नहीं चाहता। उसी आवश्यकता का अनुभव कर आज यह ‘कल्याण‘ भी प्रकट हो रहा है।‘‘(हनुमान प्रसाद पोद्दार, डा. ब्रजलाल वर्मा)

‘कल्याण‘ के लिए हनुमान जी ने जो नीति बनाई थी उसमें विज्ञापनों के लिए कोई स्थान नहीं था। ‘कल्याण‘ की शुरूआत में पोद्दार गांधी जी से मिलने गए थे, उस मुलाकात में ‘कल्याण‘ को लेकर जो सीख गांधी जी ने दी हनुमान प्रसाद पोद्दार ने उसका सदा पालन किया। ‘कल्याण‘ की शुरूआत की बात सुनकर गांधी जी अत्यधिक हर्षित होते हुए बोले-

‘‘कल्याण में दो नियमों का पालन करना। एक तो कोई बाहरी विज्ञापन नहीं देना दूसरे, पुस्तकों की समालोचना मत छापना‘‘।

अपने इन निर्देशों को ठीक प्रकार से समझाते हुए गांधी जी ने कहा- ‘‘तुम अपनी जान में पहले यह देखकर विज्ञापन लोगे कि वह किसी ऐसी चीज का न हो जो भद्दी हो और जिसमें जनता को धोखा देकर ठगने की बात हो। पर जब तुम्हारे पास विज्ञापन आने लगेंगे और लोग उनके लिए अधिक पैसे देने लगेंगे तब तुम्हारे विरोध करने पर भी…साथी लोग कहेंगे…देखिए इतन पैसा आता है क्यों न विज्ञापन स्वीकार कर लिया जाए?‘‘। (पत्रकारिता के युग निर्माता- रजनीश कुमार चतुर्वेदी)

महात्मा गांधी की इस सीख का ही परिणाम था कि हनुमान प्रसाद पोद्दार जी ने विज्ञापनों के लिए अपने पत्र में कोई स्थान नहीं रखा था। ‘कल्याण‘ ने बहुत कम समय में ही पत्रकारिता जगत में अपनी प्रतिष्ठा कायम कर ली थी। ‘कल्याण‘ की लोकप्रियता को देखते हुए गीता-प्रेस के चिंतकों का यह विचार बना कि ‘कल्याण‘ की रचनाओं को विश्व भर के आध्यात्म प्रेमियों तक पहुंचाया जाना चाहिए। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु जनवरी, 1934 में ‘कल्याण‘ के अंगे्रजी संस्करण की शुरूआत ‘कल्याण-कल्पतरू‘ नाम से की गई।

सांस्कृतिक पत्रकारिता के स्तंभ हनुमान प्रसाद पोद्दार जी के पत्रकार जीवन में ‘कल्याण‘ के बाद भी कई पड़ाव आने शेष थे। जो ‘कल्याण-कल्पतरू‘ एवं ‘महाभारत मासिक पत्रिका‘ के रूप में सामने आए। ‘महाभारत मासिक पत्रिका‘ का प्रकाशन सन 1955 से लेकर सन 1966 तक अनवरत चलता रहा।

हनुमान प्रसाद पोद्दार जी की पत्रकारिता भारत की महान सनातन संस्कृति के यशोगान को समर्पित थी। उनकी लेखनी भारतीय संस्कृति के रक्षार्थ ही चला करती थी, जिसकी बानगी उनके एक लेख के इन शब्दों में मिलती है-

‘‘भारतवर्ष ऋषि-मुनियों की भूमि और धर्म का क्षेत्र है। यहां गो-हत्या की कल्पना नहीं होनी चाहिए। यहां आज भारतीयों की स्वतंत्र सरकार होने पर भी भारतवासी अत्यंत दुखपूर्ण हृदय से प्रतिदिन 30 हजार गायों की नृशंस हत्या देख रहे हैं और सरकार से इस महापाप का परित्याग कर देने के लिए अनुरोध कर रहे हैं। धर्म प्राण भारत में गो-हत्या निवारण के लिए आंदोलन करना तथा साधु-महात्माओं को जेल जाना और प्राणोत्सर्ग करना पड़ रहा है। यह वास्तव में लज्जा और दुर्भाग्य की बात है‘‘। (हनुमान प्रसाद पोद्दार, डा. ब्रजलाल वर्मा)

अपने संपूर्ण साहित्यिक एवं पत्रकारिता के जीवन में हनुमान प्रसाद पोद्दार अपने लेखन के माध्यम से भारतीय संस्कृति का सुव्याख्यान करते रहे। सन 1969 में हनुमान प्रसाद पोद्दार जी पेट की गंभीर बीमारी के शिकार हो गए, लंबी बीमारी के पश्चात 22 मार्च, सन 1971 को हनुमान प्रसाद पोद्दार जी ने अपने प्राण त्याग दिए। विश्व कल्याण की भावना को संचारित करने वाला वह महामानव इस दुनिया से विदा हो गया।

उनका जाना भारत के सांस्कृतिक लेखन की अपूर्णीय क्षति थी। हनुमान प्रसाद पोद्दार को श्रद्धांजलि देते हुए तत्कालीन नेपाल नरेश ने कहा-

‘‘मैं तीन दशकों से भी अधिक समय से श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार को ‘कल्याण‘ में प्रकाशित उनके लेखों के माध्यम से जानता हूं और मैं कह सकता हूं कि श्री पोद्दार का जीवन एक उत्थानकारी और महान उद्देश्य के प्रति पूर्ण समर्पण था।‘‘

हनुमान प्रसाद पोद्दार ने भारत की सनातन हिन्दू संस्कृति की आजीवन सेवा की थी। चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के शब्दों में-

‘‘श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार ने हिन्दू-धर्म की स्मरणीय सेवाएं की हैं। यह सर्वथा उचित है कि उनकी सेवाओं को उपयुक्त ढंग से सम्मानित किया जाए‘‘।

पोद्दार जी ने भारतीय संस्कृति एवं धार्मिक साहित्य की सेवा की। इसका ही सुपरिणाम है कि गीता-प्रेस ने उचित मूल्य एवं सरल भाषा में भारत के सामाजिक धार्मिक साहित्य को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य किया है। उनके योगदान को रेखांकित करते हुए लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने कहा-

‘‘कल्याण के संपादक और गीता-प्रेस के संचालक-प्रकाशक स्वर्गीय श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार ने अपने प्रकाशनों के माध्यम से भारतीय साहित्य की विशेषकर धार्मिक साहित्य की मूल्यवान सेवा की है। आजकल धर्मनिरपेक्षता के नाम पर धर्मग्रंथों की उपेक्षा करने का रिवाज सा अपने देश में चल पड़ा है। इस दृष्टि से यदि देखें तो गीताप्रेस ने अपने धर्म-ग्रंथों को वृहत पैमाने पर प्रचारित और प्रकाशित कर एक महत्वपूर्ण सेवा कार्य किया है और इसका मुख्य श्रेय हनुमान प्रसाद पोद्दार के साधनापूर्ण समर्पित जीवन एवं व्यक्तित्व को है। (हनुमान प्रसाद पोद्दार, डा. ब्रजलाल वर्मा)

लोकनायक जयप्रकाश नारायण की यह बात अक्षरशः सत्य जान पड़ती है कि धर्मनिरपेक्षता के नाम पर विस्मृत कर दिए गए ग्रंथों के पुनरावलोकन के कार्य में पोद्दार जी का महत्वपूर्ण योगदान है। यद्यपि पोद्दार जी हमारे बीच नहीं हैं किंतु, सांस्कृतिक पत्रकार के रूप में दिया गया उनका योगदान पत्रकारिता में उपजी सांस्कृतिक रिक्तता को पूर्ण करने की प्रेरणा देता है।

Monday, March 19, 2012

शतक बनना, राष्ट्रीय समस्या का सुलझना

भारत में क्रिकेट की बात हो और सचिन चर्चा से परे हों ऐसा कम ही देखने को मिलता है। सचिन के नाम को भारत में क्रिकेट प्रेमी क्रिकेट का पर्याय मानते हैं। सचिन की महान उपलब्धियों ने देश को गौरवान्वित होने के ढेरों मौके दिए हैं। कह सकते हैं कि वे अपने लाजवाब खेल की वजह से देश के गौरव हैं। पिछले एक बरस से देश के और क्रिकेट जगत के गौरव सचिन अपने सौवें शतक के इंतजार में थे। संयोग से यह इंतजार उस दिन समाप्त हुआ जब इंतजार के बाद ही देश का आम बजट भी संसद में प्रस्तुत किया जा रहा था।

देश का आम बजट देश के वर्ष भर की आय-व्यय का लेखा-जोखा होता है। जिसका प्रभाव हर खास-ओ-आम पर पड़ता है। ऐसे में यह बजट गणतंत्र के नागरिकों के लिए महत्व का विषय होता है। गणतंत्र के नागरिकों के लिए महत्व के विषय की जानकारी को उन तक पहुंचाने का दायित्व जनसंचार माध्यमों का है। दायित्व होना और उसे समझना दोनों ही अपने आप में अलग विषय हैं। शायद भारतीय मीडिया उस समझ से अभी परे ही है।

देश का बजट और सचिन का शतक। इसमें मीडिया की प्राथमिकता में क्या होना चाहिए यह कोई विचारणीय प्रश्न नहीं। निर्विवाद रूप से मीडिया की पहली प्राथमिकता बजट के समाचार एवं उसके विभिन्न पहलुओं को लोगों तक पहुंचाना होना चाहिए। पर ऐसा हुआ नहीं। मीडिया अपने टीआरपी के झंझावतों के मददेनजर सचिन के महाशतक के विभिन्न बनावटी पहलुओं को लोगों को बताता रहा। वहीं इलैक्ट्रोनिक मीडिया की स्क्रीन और प्रिंट मीडिया के पृष्ठों में खबरों के बजट में आम बजट को सही अनुपात में प्रतिनिधितव न मिल सका।

जहां बजट को उसके अनुपात में महत्व मिला वहां सर्वाधिक प्रयास आम बजट को धूमिल करने के ही थे। अर्थात सचिन के शतक के मुकाबले देश के बजट को बौना साबित करने का सुनियोजित प्रयास। उदाहरण के तौर पर दैनिक जागरण की बैनर खबर को ही लें, जिसका शीर्षक था ‘‘सरकार जीरो-सचिन हीरो‘‘। यह बजट को नकारने जैसा शीर्षक था। लगभग इसी तरह का प्रयास करते हुए अमर उजाला का शीर्षक था ‘‘दिल लिया-दर्द दिया‘‘। इनसे बड़ी लकीर खींचते हुए नई दुनिया ने सचिन तेंडुलकर की आदमकद तस्वीर प्रस्तुत करने का प्रयास किया। उस तस्वीर के नीचे एक कोने में देश के बजट को भी जगह मिली थी।

कह सकते हैं कि दादा के बजट की दादागिरी खबरों में नहीं चली। वहीं खबरिया चैनलों में भी क्रिकेट विशेषज्ञ आंकड़ों के माध्यम से बता रहे थे कि सचिन का महाशतक देशवासियों के लिए कितनी राहत का विषय हो सकता है। लेकिन आम बजट आम आदमी के लिए क्या सहूलियतें और दुश्वारियां लेकर आया है, इसकी जानकारी देने वाले उपलब्ध नहीं थे।

खबरों के बजटीकरण में देश के आम बजट के पिछड़ने पर यह पंक्तियां सटीक जान पड़ती हैं-

देश इस समय कई समस्याओं से गुजरा है,

सचिन का शतक समस्या बन उभरा है।

बात सही है कि सचिन के शतक को मीडिया ने राष्ट्रव्यापी समस्या के सुलझने जैसा बताया। उल्लेखनीय है कि जिस मैच में सचिन ने महाशतक बनाया उसी मैच में किरकिरी कराते हुए भारतीय टीम औसत दर्जे की टीम बांग्लादेश से पराजित हो गई। भारतीय टीम की यह हार भी खबरों का हिस्सा नहीं बनी। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या भारतीय टीम की जीत से महत्वपूर्ण सचिन का शतक है।

उल्लेखनीय है कि आम बजट से अधिक महत्व देते हुए जिस क्रिकेट को अधिक महत्व दिया गया उसमें भी भारत की हार की अपेक्षा सचिन का शतक चर्चा का विषय रहा। यह विचारणीय है कि राष्ट्रीय मीडिया के लिए राष्ट्रीय महत्व का विषय सचिन का शतक है, या आम बजट। हालांकि आम बजट को लेकर मीडिया की यह उदासीनता कई मामलों में घिरी सरकार के लिए राहत भरी हो सकती है। किंतु, भारत का आम जनमानस बजट की समुचित जानकारी से वंचित रह गया इसका जिम्मेदार किसे ठहराया जाएगा। मीडिया की बेरूखी को या सचिन के शतक को।

Sunday, March 11, 2012

एनजीओ के ‘रंगे हाथ’

‘‘तमिलनाडु में कूडनकुलम परियोजना के विरोध के पीछे विदेशी मदद से संचालित एनजीओ का हाथ है।” पिछले दिनों प्रधानमंत्री ने जैसे ही यह बयान दिया, भारत की खुफिया एजेंसियां तथा गृह मंत्रालय छानबीन एवं कार्रवाई में व्यस्त दिखे। आनन-फानन में कूडनकुलम परियोजना के विरोध के पीछे सक्रिय दस एनजीओ पर विदेशी सहायता नियमन के उल्लंघन का मामला दर्ज किया गया, जिनकी जांच सीबीआई को सौंप दी गई। गृहमंत्रालय के अनुसार इन एनजीओ पर आरोप है कि वे धर्मार्थ कार्यों हेतु प्राप्त धन को परमाणु परियोजनाओं के विरोध में खर्च कर रहे थे।

प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री वी. नारायणसामी ने कहा कि ‘‘ऐसा पता चला है कि एनजीओ कूडनकुलम में परमाणु संयंत्र विरोधी अभियान में विदेशी धन का इस्तेमाल कर रहे हैं।” इसी मामले में अंग्रेजी दैनिक ‘द पायनियर‘ ने अपनी रिपोर्ट में एनजीओ को प्राप्त विदेशी मदद का विस्तृत ब्यौरा दिया है। ‘द पायनियर‘ की रिपोर्ट के अनुसार वनवासी बाहुल्य क्षेत्रों जैसे उड़ीसा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड में 2,325 पंजीकृत एनजीओ हैं, जिन्हें 2009-10 में 600 करोड़ रूपये की विदेशी मदद प्राप्त हुई। वहीं पूर्वोत्तर राज्यों में 816 पंजीकृत एनजीओ को 2009-10 में ही 251 करोड़ रू. की विदेशी मदद प्राप्त हुई।

एनजीओ को मिलने वाली मदद पर एक नजर

राज्य एनजीओ की संख्या मिलने वाली राशि

उड़ीसा 1240 214.32 करोड़

झारखंड 465 159.65 करोड़

मध्य प्रदेश 419 142.62 करोड़

छत्तीसगढ़ 231 64.99 करोड़

असम 253 93.10 करोड़

मेघालय 123 63.91 करोड़

मणिपुर 265 36.81 करोड़

नागालैण्ड 78 29.03 करोड़

अरूणाचल 23 9.04 करोड़

मिजोरम 34 8.38 करोड़

त्रिपुरा 32 7.24 करोड़

सिक्किम 8 3.11 करोड

इन सभी राज्यों में उड़ीसा पहले स्थान पर है, जहां के एनजीओ को सबसे अधिक विदेशी मदद मिलती है। गौरतलब है कि मतांतरण के विरोध को लेकर सांप्रदायिक दंगे भी सबसे अधिक उड़ीसा में ही होते रहे हैं। ऐसे में विदेशी मदद से संचालित यह एनजीओ किस सामाजिक कार्य पर अपने धन को खर्च कर रहे हैं, यह जगजाहिर होता है। उड़ीसा, छत्तीसगढ़, झारखंड एवं मध्य प्रदेश वह राज्य हैं जहां वनवासी लोगों की बड़ी आबादी निवास करती है। लंबे समय से सेवा एवं शिक्षा के बहाने मिशनरियां भी इन क्षेत्रों में कार्यरत रही हैं, जिनपर सेवा कार्यों के बदले मतांतरण करवाने के आरोप लगते रहे हैं। कमोबेश यही स्थिति देश के सर्वाधिक संवेदनशील क्षेत्र पूर्वोत्तर की भी है।

एनजीओ के हाथ कहीं देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त तो नहीं हैं, इसकी पड़ताल करने में भारत सरकार ने देर कर दी है। यह पड़ताल अब भी शुरू नहीं होती यदि प्रधानमंत्री एनजीओ की भूमिका पर संदेह न जताते। उल्लेखनीय पहलू यह है कि एनजीओ धर्मार्थ कार्यों के बहाने अपने एजेंडे को बढ़ाने में लगे हुए हैं। जांच एजेंसियों को यह पड़ताल करनी चाहिए कि एनजीओ के आवरण में कहीं मिशनरियां तो अपने काम को अंजाम देने में नहीं लगी हैं। गौरतलब है कि सेवा कार्यों के बहाने मिशनरियां मतांतरण के एजेंडे को साकार करने में संलग्न हैं, ऐसे में यह जांच का विषय है कि पंजीकृत एनजीओ के नाम से आने वाला धन इन मिशनरियों के हवाले तो नहीं हो रहा है।

एनजीओ को विदेशों से मिलने वाली भारी मदद ध्यान आकर्षित करती है कि आखिर ऐसे कौन से उद्देश्य अथवा कार्य हैं जिनके लिए विदेशों से बड़ी मदद मिल रही है। क्या कारण है कि जिन एनजीओ को भारत में ही प्रशंसा नहीं मिल पा रही है, उनको अमेरिका एवं अन्य पश्चिमी देशों से मदद एवं पुरस्कार प्राप्त हो रहे हैं ? इन पुरस्कारों और फंडिंग के पीछे का खेल ही है, विभिन्न परियोजनाओं का सुनियोजित विरोध एवं मतांतरण।

अब यदि भारत की खुफिया एजेंसियों की इस मामले में नींद खुल ही गई है तो उसे इन एनजीओ को विदेशों से मिलने वाली मदद पर नजर रखनी चाहिए। इसके अलावा यह भी एक कारगर उपाय हो सकता है कि यह एनजीओ अपने कार्यों की रिपोर्ट एवं उन पर खर्च राशि के बारे में संबंधित प्रदेश एवं केन्द्र सरकार को अवगत कराएं। यही देशहित में होगा, क्योंकि एनजीओ के माध्यम से विदेशी हितों को भारत में संचालित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।

Saturday, February 25, 2012

मतवाला पत्रकार सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला हिंदी साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता में अमिट हस्ताक्षर के समान हैं। अपने नाम के अनुरूप वे निराले ही थे। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला मूलतः छायावादी कवि थे, उनका जीवन भी कविता के समान ही था। उनके कवि जीवन के आगे कई बार उनके पत्रकार होने का परिचय सामने नहीं आ पाता है। जिसका अवलोकन करने का हमने प्रयास किया है।

महाकवि और महामानव जैसे उपनामों से सम्मानित निराला का जन्म बंगाल के मेदिनीपुर में हुआ था। निराला जी की जन्मतिथि के विषय में मतैक्य नहीं है, परंतु वे अपना जन्मदिन बसंत पंचमी को ही मनाते थे। निराला का साहित्य ही नहीं साहित्यिक पत्रकारिता में भी महत्वपूर्ण योगदान था। भारतेंदु हरिशचंद्र के माध्यम से शुरू की गई साहित्यिक पत्रकारिता की विरासत महावीर प्रसाद द्विवेदी के बाद निराला जी को ही मिली थी। निराला ने साहित्यिक पत्रकारिता की शुरूआत ऐसे समय में की थी जब राजनीतिक पत्रकारिता के समकक्ष साहित्यिक पत्रकारिता ने भी अपना स्थान बना लिया था।

महामानव निराला का संबंध प्रमुख रूप से प्रभा, सरस्वती, माधुरी, आदर्ष, शिक्षा और मतवाला जैसे प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं से रहा। मतवाला से उनका विशेष लगाव रहा था। 23 अगस्त, 1923 को जब मतवाला निकला, तो उसपर छपा मोटो निराला ने ही तैयार किया था। वह मोटो इस प्रकार था-

अमिय-गरल, शशि-शीकर, रवि-कर, राग-विराग भरा प्याला
पीते हैं जो साधक उनका प्यारा है यह मतवाला।

मतवाला के पहले अंक में ही रक्षाबंधन पर उनकी कविता छपी थी। इसके बाद तो निराला जी की कविता तो मतवाला की पहचान ही बन गई थी। वे मतवाला में गर्जन सिंह वर्मा, मतवाले, जनाबआलि, शौहर आदि नामों से लिखते थे। निराला भी उनका छद्म नाम ही था। जो आगे चलकर उनका उपनापम ही बन गया। इसका कारण यह था कि पत्र-पत्रिकाओं के छपने जाने से पूर्व कई बार लेखकों की रचनाएं नहीं मिल पाती थीं और संपादक ही अपनी रचनाओं को छद्म नाम प्रकाशित किया करते थे। उनकी रचनाओं में तत्कालीन समाज में व्याप्त कुरीतियों के प्रति चेतना का भाव हुआ करता था।

निराला गांधीवादी युग के साहित्यिक पत्रकार थे। वे गांधी जी के स्वदेशी आंदोलन और चरखा नीति के समर्थक थे। निराला अपनी बात को निराले ही ढंग से रखते थे। एक बार उन्होंने महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपादन में निकलने वाली सरस्वती पत्रिका की आलोचना की, तो द्विवेदी जी ने मतवाला को पूर्णतया संशोधित करके निराला के पास भेज दिया। निराला ने अपने समय के प्रतिष्ठित पत्र समन्वय में भी अपना योगदान दिया। समन्वय में उनके द्वारा अनूदित रामकृष्ण परमहंस की बांग्ला जीवनी का हिंदी अनुवाद छपा करता था। इसमें निराला अपना नाम एक दार्शनिक देते थे।

महामानव निराला की ने अपनी कविताओं के माध्यम से आर्थिक विपन्नता को बड़े ही मार्मिक ढंग से चित्रित किया था। जिसका उदाहरण है उनकी यह कविता-
साथ दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फैलाये,
बायें से वे मलते हुए पेट को चलते,
और दाहिना दया दृष्टि पाने की ओर बढ़ाये।
भूख से सूख ओठ जब जाते
छाता-भाग्य विधाता से क्या पाते?

निराला जी की रचनाओं में उनके जीवन का दर्द सुनाई देता था। अपनी पुत्री की मृत्यु ने निराला को झकझोर दिया था। उस महामानव ने बेटी की विकलता में निम्न पंक्तियों को लिखा था, जिसे विभिन्न लेखकों ने सर्वश्रेष्ठ शोक गीत की संज्ञा दी है-
मुझ भाग्यहीन की तू संबल
युग वर्ष बाद जब हुई विकल,
छुख ही जीवन की कथा रही
क्या कहूं आज जो नहीं कही!
हो इसी कर्म पर वज्रपात
यदि धर्म, रहे नत सदा माथ
इस पथ पर, मेरे कार्य सकल
हो भ्रष्ट शीत के-से शतदल!
कन्ये, गत कर्मों का अर्पण
कर, करता मैं तेरा तर्पण!

निराला ने सदा ही फक्कड़ जीवन जिया, कष्टों को वे निराले ही ढंग से सह लिया करते थे। अपने से ज्यादा औरों के कष्टों से उनको पीड़ा हुआ करती थी। यही उनका स्वभाव था। उनका संपूर्ण जीवन दुखों और कष्टों में ही बीता। यही कारण था कि अपने अंतिम समय में वे आध्यात्मिक हो गए थे। वे तुलसीदास के प्रशंसक थे, शायद रामचरितमानस से ही उनको कष्टों को गले लगाने की प्रेरणा मिलती थी।

निराला जीवन पर्यंत हिंदी की सेवा में संलग्न रहे। महामानव निराला ने 15 अक्टूबर, 1961 को अपना पार्थिव शरीर त्याग दिया। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने निराला की मृत्यु के पश्चात् उनके संघर्षमय जीवन के बारे में ‘हिंदी टाइम्स‘ में लिखा था-
‘‘राष्ट्रपिता बापू की मृत्यु के बाद मौलाना आजाद ने अपने एक भाषण में कहा था कि कहीं बापू के खून के छींटे हमारे ही हाथों पर तो नहीं! यही प्रश्न निराला जी के संबंध में हम लोगों के मन में भी उत्पन्न होता है।

राष्ट्रकवि दिनकर की यह पंक्तियां निराला जैसे महामानव के संघर्षपूर्ण साहित्यिक जीवन को बयां करती हैं। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का साहित्यिक और पत्रकार जीवन वर्तमान समय के पत्रकारों को पत्रकारिता के क्षेत्र में एक साधक के रूप में कार्य करने की प्रेरणा देता है।

पत्रकारिता पवित्र सेवा कार्य है- दशरथ प्रसाद द्विवेदी

हिंदी पत्रकारिता ने अपने प्रारंभिक काल से ही विभिन्न परिवर्तनों और आंदोलनों में उल्लेखनीय भूमिका का निर्वाह किया है। राष्ट्रवाद को यदि पत्रकारिता का प्राणतत्व भी कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। समाज के हर व्यक्ति के ह्दय को स्वदेश प्रेम के भाव से परिपूर्ण करने का कार्य हिंदी पत्रकारिता ने अपने उद्भव काल से ही किया है। इसी प्रखर राष्ट्र भाव को जन-जन में जागृत करने का कार्य दशरथ प्रसाद द्विवेदी जी ने साप्ताहिक पत्र स्वदेश के माध्यम से किया था। द्विवेदी जी ने अपने पत्र ‘स्वदेश‘ के माध्यम से लोगों का जागरण किया। उनके पत्र ‘स्वदेश‘ के प्रथम पृष्ठ पर ही स्वराष्ट्र धर्म की भावना को जागृत करने वाली निम्नलिखित पंक्तियां लिखी रहती थीं-

‘‘जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं।
वह ह्दय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।।‘‘

‘स्वदेश‘ में संपादकीय टिप्पणी के ऊपर कलात्मक ढंग से लिखा रहता था-

‘‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसि‘‘

दशरथ जी थानेदारी की नौकरी छोड़कर पत्रकारिता के क्षेत्र में आए थे। गणेश शंकर विद्यार्थी के ‘प्रताप‘ में उनके सहायक भी रहे थे, दशरथ जी। वहीं उन्होंने ‘स्वदेशी' भाव का पाठ पढ़ा था, जिसके लिए वे जीवन-पर्यंत समर्पण भाव से कार्य करते रहे।
दशरथ प्रसाद द्विवेदी की पत्रकारिता का मूल स्वर राष्ट्रवाद ही था, शायद गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे प्रखर पत्रकार के सहयोगी होने का भी यह प्रभाव रहा हो।

पं दशरथ प्रसाद द्विवेदी ने पत्रकारिता के कार्य को एक सेवाकार्य मानते हुए अपना कार्य किया और आने वाली पत्रकार पीढ़ी को भी यही संदेश दिया। पत्रकारिता के क्षेत्र को समाज सेवा का माध्यम बताते हुए उन्होंने लिखा था-

‘‘अखबारनवीसी अथवा पत्रकार जीवन भला है या बुरा ? इस प्रश्न का का कोई दो टूक उत्तर नहीं दिया जा सकता। किंतु किसी को अपना जीवन दिव्य और उपयोगी बनाना है तो यह एक पवित्र सेवा है, इसमें जरा भी संदेह नहीं।‘‘ (स्वतंत्रता संग्राम की पत्रकारिता और दशरथ प्रसाद द्विवेदी- डा. अर्जुन तिवारी)

ऐसे समय में जब पत्रकारिता के क्षेत्र में आने वाले लोग ग्लैमर जानकर पत्रकारिता के क्षेत्र में आते हैं, तब दशरथ जी की निम्न पंक्तियां समीचीन जान पड़ती हैं-

‘‘हिंदी पत्रकारिता की नींव ही कुछ ऐसी पड़ी है कि अपना उल्लू सीधा करने वालों की इसमें गुंजाइश ही बहुत कम है। शुद्ध सेवा-भाव को लेकर त्याग एवं तप का जीवन बिताने वाले लोग ही अब तक हिंदी अखबारनवीसी में पनपे हैं।‘‘(स्वतंत्रता संग्राम की पत्रकारिता और दशरथ प्रसाद द्विवेदी- डा. अर्जुन तिवारी)

दशरथ प्रसाद द्विवेदी ने पत्रकारिता को एक मिशन मानते हुए कार्य किया। पत्र चलाने के लिए विभिन्न आर्थिक आवश्यकताओं की अधिक परवाह न करते हुए उन्होंने विज्ञापनों के बिना ही ‘स्वदेश‘ को लंबे समय तक सफलतापूर्वक चलाया। यद्यपि वे हिंदी समाचार पत्रों के प्रति सदैव चिंतित भी रहे। हिंदी पत्रों के दर्द को बयां करते हुए उन्होंने लिखा था-

‘‘हिंदी समाचार पत्रों का कोई पुरसाहाल (हाल पूछने वाला) नहीं (हाल पूछने वाला) हम जानते हैं अंग्रेजी पत्र अखबारी संसार में बढ़े-चढ़े हैं, उनकी बहुत कुछ प्रतिष्ठा है, अपने क्षेत्र में उनकी अच्छी पैठ है, वे काम भी अच्छा करते हैं, किंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि देशी भाषाओं में निकलने वाले अपने अन्य सहयोगियों को इस प्रकार उपेक्षा की दृष्टि से देखें।‘‘ (स्वदेश, 23/06/1919)

वर्तमान समय में पत्रकारिता पर भी निगरानी की बात जोरों पर है। ऐसे समय में दशरथ जी की निम्न पंक्तियां दृष्ट्व्य हैं-
‘‘हमारी समझ से तो हिंदी प्रेस एसोसिएशन को अभी दो काम हाथ में लेना चाहिए। एक तो यह कि हिंदी के प्रत्येक पत्र पर अपना नियंत्रण रखे और इस बात का प्रयत्न हो कि कोई भी पत्र-पत्रिका बहकी हुई बातें न लिखे।‘‘ (स्वदेश, 30/06/1919)

पत्रकारिता के क्षेत्र में बढ़ते व्यावसायिक दबावों के कारण अक्सर समाचारपत्रों को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता है। यह पत्रकारिता के लिए शुभ संकेत नहीं कहा जा सकता है। पं दशरथ प्रसाद द्विवेदी ने समाचार पत्रों की आर्थिक समस्याओं के निराकरण के संबंध में लिखा था-

‘‘प्रेस एसोसिएशन को खास तौर पर यह कार्य करना चाहिए कि वह हिंदी पत्रों और प्रेसों का अधिकांश भार अपने ऊपर ले। समय कुसमय वह उनकी मदद करे। हिंदी जनाता को अखबारों के पढ़ने की ओर झुकाकर वह अपना कोष भरे।‘‘ (स्वदेश, 30/06/1919)
दशरथ जी ने पत्रकारिता में अपना योगदान अपने लेखन के माध्यम से ही नहीं बल्कि पत्रकारिता के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़कर भी दिया। ब्रिटिश सरकार द्वारा सन 1910 लागू किए गए प्रेस एक्ट का मुखर विरोध करने वालों में दशरथ जी का प्रमुखता से नाम लिया जा सकता है। प्रेस एक्ट का विरोध करने के लिए उन्होंने तत्कालीन समाचार पत्रों से एकजुट होने का आह्वान किया और प्रेस एसोसिएशन के गठन में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी।

दशरथ जी ने विपरीत परिस्थितियों में हिंदी प्रेस एसोसिएशन के गठन के माध्यम से समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं को बल प्रदान किया। इस संदर्भ में उन्होंने लिखा था-

‘‘हिंदी प्रेस एसोसिएशन के संगठन में इस बात का ध्यान देना चाहिए कि आगे चलकर, वह भी अपने अधीनस्थ प्रेसों व पत्रों को जोरदार बना सके।‘‘

दशरथ जी ने ‘स्वदेश‘ के माध्यम से जन-जन तक तिलक और गांधी के विचारों को प्रसारित किया। स्वदेश की लोकप्रियता का ही परिणाम था कि प्रेमचन्द, सोहनलाल द्विवेदी, अयोध्या सिंह हरिऔध और मैथीलीशरण गुप्त जैसे विभिन्न महान साहित्यकारों ने स्वदेश को अपना सहयोग दिया।

ऐसे समय में जब साहित्यिक पत्रों एवं पत्रिकाओं की संख्या में कमी आई है तथा साहित्य और पत्रकारिता के बीच दूरी बढ़ी है। तब दशरथ प्रसाद द्विवेदी जैसे योद्धा पत्रकार के प्रेरक विचार वर्तमान पत्रकार पीढ़ी के लिए अनुकरणीय जान पड़ते हैं।