Sunday, April 15, 2012

हिंदी पत्रकारिता का समाचार-सूर्य ‘उदन्त मार्तण्ड‘


30 मई, 1826 हिंदी पत्रकारिता के इतिहास की महत्वपूर्ण तारीख है। इसी दिन हिंदी के सर्वज्ञात प्रथम समाचार पत्र उदन्त मार्तण्ड का प्रकाशन प्रारंभ हुआ था। उदन्त मार्तण्ड का शाब्दिक अर्थ है समाचार-सूर्य। अपने नाम के अनुरूप ही उदन्त मार्तण्ड हिंदी की समाचार दुनिया के सूर्य के समान ही था। उदन्त मार्तण्ड का प्रकाशन मूलतः कानपुर निवासी पं. युगल किशोर शुक्ल ने किया था। यह पत्र ऐसे समय में प्रकाशित हुआ था जब हिंदी भाषियों को अपनी भाषा के पत्र की आवश्यकता महसूस हो रही थी। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर उदन्त मार्तण्ड का प्रकाशन किया गया था। पत्र के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए युगल किशोर शुक्ल ने लिखा था जो यथावत प्रस्तुत है-

‘‘यह उदन्त मार्तण्ड अब पहले पहल हिंदुस्तानियों के हेत जो, आज तक किसी ने नहीं चलाया पर अंग्रेजी ओ पारसी ओ बंगाली में जो समाचार का कागज छपता है उसका उन बोलियों को जान्ने ओ समझने वालों को ही होता है। और सब लोग पराए सुख सुखी होते हैं। जैसे पराए धन धनी होना और अपनी रहते परायी आंख देखना वैसे ही जिस गुण में जिसकी पैठ न हो उसको उसके रस का मिलना कठिन ही है और हिंदुस्तानियों में बहुतेरे ऐसे हैं‘‘ 


हिंदी के पहले समाचार पत्र उदन्त मार्तण्ड ने समाज के विरोधाभासों पर तीखे कटाक्ष किए थे। जिसका उदाहरण उदन्त मार्तण्ड में प्रकाशित यह गहरा व्यंग्य है- 

‘‘
एक यशी वकील अदालत का काम करते-करते बुड्ढा होकर अपने दामाद को वह सौंप के आप सुचित हुआ। दामाद कई दिन वह काम करके एक दिन आया ओ प्रसन्न होकर बोला हे महाराज आपने जो फलाने का पुराना ओ संगीन मोकद्दमा हमें सौंपा था सो आज फैसला हुआ यह सुनकर वकील पछता करके बोला कि तुमने सत्यानाश किया। उस मोकद्दमे से हमारे बाप बड़े थे तिस पीछे हमारे बाप मरती समय हमें हाथ उठा के दे गए ओ हमने भी उसको बना रखा ओ अब तक भली-भांति अपना दिन काटा ओ वही मोकद्दमा तुमको सौंप करके समझा था कि तुम भी अपने बेटे पाते तक पालोगे पर तुम थोड़े से दिनों में उसको खो बैठे‘‘ 

उदन्त मार्तण्ड ने समाज में चल रहे विरोधाभासों एवं अंग्रेजी राज के विरूद्ध आम जन की आवाज को उठाने का कार्य किया था। कानूनी कारणों एवं ग्राहकों के पर्याप्त सहयोग न देने के कारण 19 दिसंबर, 1827 को युगल किशोर शुक्ल को उदन्त मार्तण्ड का प्रकाशन बंद करना पड़ा। उदन्त मार्तण्ड के अंतिम अंक में एक नोट प्रकाशित हुआ था जिसमें उसके बंद होने की पीड़ा झलकती है। वह इस प्रकार था-

‘‘
आज दिवस लौ उग चुक्यों मार्तण्ड उदन्त।
 
अस्ताचल को जाता है दिनकर दिन अब अंत।।‘‘

उदन्त मार्तण्ड बंद हो गया, लेकिन उससे पहले वह हिंदी पत्रकारिता का प्रस्थान बिंदु तो बन ही चुका था। उदन्त मार्तण्ड के प्रकाशन के बाद हिंदी पत्रकारिता ने लंबा सफर तय किया है। जिसका प्रेरणास्रोत उदन्त मार्तण्ड ही था। 
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Friday, April 13, 2012

टाइटल सांग बने आइटम सांग


भारतीय सिनेमा की शुरूआत बीसवीं सदी के दूसरे दशक के पूर्वार्ध में हुई थी। बीसवीं सदी के भारतीय सिनेमा ने एक लंबा सफर तय किया। भारत में विभिन्न विधाओं की शुरूआत गुलामी के उस दौर में हुई, जब क्रांतिकारी परिवर्तनों की अधिकतम आवश्यकता थी। सिनेमा भी उस दौर से अछूता नहीं है। भारतीय सिनेमा जनसंचार के नए माध्यम के रूप में उभरकर आया जिसने वक्त की दास्तान को फिल्मों के रूप में प्रस्तुत किया।
सिनेमा को सामाजिक सरोकारों से जोड़ने का काम किया उसके गीतों ने। भारतीय सिनमा के गीतों ने सही मायनों में सामाजिक सरोकारों को आवाज दी। सवाक  सिनेमा  की शुरूआत के साथ ही गीतों का महत्व महसूस किया जाने लगा था। उस दौर में गीत ही फिल्मों की पहचान थे और महत्वपूर्ण भावों की अभिव्यक्ति गीतों के माध्यम से ही की जाती थी। ‘राजा हरिशचन्द्र‘ से शुरू हुआ फिल्मी सफर आज भी विभिन्न बदलावों के साथ सतत जारी है। भारत के हिन्दी सिनेमा के एक सदी के सफर में गीतों में अधिकतम बदलाव देखने को मिलता है।
हिंदी सिनेमा के शुरूआती दौर में धार्मिक फिल्मों का निर्माण हुआ। भारत में पहली सवाक फिल्म का निर्माण आलमआरा के रूप में हुआ। जिसके पश्चात फिल्म निर्माण की गति में और तेजी देखने को मिली। आलमआरा के बाद बनने वाली अधिकतर फिल्में सामाजिक समस्याओं पर आधारित थीं। यहीं से हिंदी सिनेमा में गीतों की विधिवत शुरूआत होती है। हिंदी सिनेमा के पहले लोकप्रिय गायक के. एल सहगल के गीतों ने हिंदी सिनेमा में गीतों का महत्व को समझाया। उनके गाए गीतों ने एक कशिश पैदा की। सहगल के गाए गानों के दर्द ने सिने प्रेमियों को गीतों का मर्म समझाया। सहगल का गाया गीत ‘दिल जलता है तो जलने दे‘ को कालजयी गीत कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। उनके एक गीत ने उस दौर में धूम मचा दी थी। जिसके बोल थे ‘अब जीके क्या करेंगे जब दिल ही टूट गया‘। यह गीत सहगल को भी इतना प्रिय था कि उन्होंने कहा कि मेरी अंतिम यात्रा में भी यह गीत बजना चाहिए।
हिंदी सिनेमा में सहगल और सुरैया से शुरू हुई गीतों की यात्रा को मुकेश, रफी, गीता दत्त, लता मंगेशकर, किशोर कुमार, महेन्द्र कपूर, हेमंत एवं महबूब आदि ने बखूबी बढ़ाया। इन गायकों ने गीत गाये नहीं बल्कि शब्दों को आवाज दी, भावों को आवाज दी। मुकेश के गाए गीतों की बात की जाए तो उनके गीत संदेश लिए होते थे। जो दुनियावी झंझावतों में सकारात्मकता का संदेश देते हैं। मुकेश ने अधिकतर राजकपूर के लिए गीत गाए। यही कारण था कि मुकेश के जाने के बाद राजकपूर ने कहा था कि ‘‘मुकेश इस दुनिया से चले गए तो ऐसा लगता है मेरी आवाज चली गई‘‘। राजकपूर का अभिनय और मुकेश की आवाज यह एक परंपरा बन गई थी। इसका कारण उनकी जोड़ी की अपार सफलता भी थी।
 ‘‘आवारा हूं आवारा हूं‘‘ गीत ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सफलता अर्जित की। ‘‘सब कुछ सीखा हमने न सीखी होशियारी‘‘, ‘‘सजन रे झूठ मत बालो‘‘ जैसे गीत समाज के लिए मनोरंजन और संदेश लिए हुए थे। इसी प्रकार से मो. रफी के गीतों ने भी सिने जगत में अपनी मौजूदगी का जोरदार अहसास कराया। फिल्म ‘‘बैजू बावरा‘‘ ने रफी की लोकप्रियता को नई ऊंचाईयों तक पहुंचाया। ‘‘ओ दुनिया के रखवाले सुन दर्द भरे मेरे नाले‘‘, ‘‘मन तड़पत हरि दर्शन को आज‘‘ जैसे गीतों को रफी ने इतने मनोयोग से गया था कि यह गीत जिसने भी सुने उसके दिल में उतर गए। प्रशंसकों ने यहां तक कहा था कि रफी की आवाज में वह जादू है कि पत्थर को भी पिघला दे।
उस दौर के गीतों में वह कशिश थी कि लोगों ने उन गीतों को सुना भी और समझा भी। उस दौर के गीतों में विशेष पहलू यह था कि गीतों के निर्माण के लिए विशेष तामझाम अथवा अत्यधिक खर्च की आवश्यकता नहीं थी। वक्त बदला तो बदल गया सिनेमा भी। लेकिन यह बदलाव गीतों के लिहाज से बहुत सार्थक साबित नहीं हुआ। वर्तमान दौर के गीतों को समझने की बात तो दूर है कई बार सुनने में भी कर्कश लगता है। पिछले दो तीन वर्षों से तो गीत जैसे बने ही नहीं हैं। बने हैं तो आइटम सांग और वही बन गए हैं टाइटल सांग। फिल्मों के टाइटल सांग के रूप में आइटम सांग को ही जाना जाता है। मुन्नी बदनाम हुई, टिंकू जिया, शीला की जवानी जैसे आइटम सांग फिल्मों के टाइटल सांग बन गए हैं। विशेष बात यह है कि फिल्म में इस प्रकार के गीतों के लिए भी जबरन जगह बनाई जा रही है, जगह है नहीं ऐसा प्रतीत होता है।
गीतों के लिए पटकथा में स्थान ही नहीं दिखता है। पटकथा में पिरोये गीत ही फिल्म के महत्वपूर्ण भावनात्मक दृश्यों को आवाज देते हैं। जिसको फिल्मकारों ने भूलने की कोशिश की है। संगीत को सार्थक बनाए रखने के लिए आवश्यकता है कि शास्त्रीय संगीत पर आधारित गीतों को फिल्माया जाए। तभी हिंदी सिनेमा के गीत जनसरोकारों से जुड़ाव महसूस कर पाएंगे।

Friday, March 30, 2012

परमाणु सुरक्षा के वैश्विक इंतजाम

परमाणु ऊर्जा एवं सुरक्षा दोनों पहलू आपस में संबद्ध हैं। ऊर्जा के लिए परमाणु संयंत्रों के प्रयास शुरू होते ही परमाणु सुरक्षा को लेकर चिंता भी परवान चढ़ जाती है। फुकुशिमा की दुर्घटना ने भी इस चिंता को वाजिब ठहराने का काम किया है। जिसका असर था कि विश्व की प्रमुख परमाणु शक्तियों जर्मनी, जापान, फ्रांस आदि ने इसके विकल्प तलाशने शुरू कर दिए। हाल ही में दक्षिण कोरिया में संपन्न हुए परमाणु सुरक्षा सम्मेलन में महाशक्तियों ने भी इस मसले पर चिंता जताई। अमेरिकी राष्ट्रपति ने तो परमाणु जखीरे में कटौती करने का ऐलान किया है।

 प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने परमाणु ऊर्जा की जरूरतों को महत्वपूर्ण बताते हुए सुरक्षा इंतजामों पर चिंता जताते हुए कहा- ‘‘परमाणु ऊर्जा पर लोगों के विश्वास को बनाए रखने के लिए बचाव एवं सुरक्षा के बेहतर मानक तय करने की आवश्यकता है‘‘। विश्व के प्रमुख 53 देशों के परमाणु सुरक्षा सम्मेलन में फुकुशिमा की दुर्घटना का खौफ दिखाई दे रहा था। इस चिंता को बढ़ाने का इंतजाम पाक के परमाणु हथियारों की असुरक्षा की आशंका, ईरान एवं उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम ने भी किया।

वैश्विक स्तर पर परमाणु सुरक्षा के इंतजामों की जरूरत बताते हुए कुछ उपायों पर सहमति नजर आई, जिनमें प्रमुख उपाय हैं-

 - परमाणु आतंकवाद से सुरक्षा के मसले पर परस्पर सहयोग के लिए एक मसौदे की आवश्यकता।

 - संपन्न देश अंतर्राष्ट्रीय परमाणु सुरक्षा एजेंसी के अनुदान में बढ़ोत्तरी करें, ताकि विकासशील देशों को आपदा के समय सहायता दी जा सके।

 - असैन्य परमाणु कार्यक्रमों के लिए यूरेनियम के प्रयोग को न्यूनतम स्तर पर लाया जाए।

 - रेडियो ऐक्टिव स्रोतों की सुरक्षा का इंतजाम करना।

 - परमाणु बचाव एवं सुरक्षा के इंतजामों के मानकों को और बेहतर किया जाए।

 - सभी देशों को परमाणु कचरे के निपटान के लिए उचित प्रयास करने की आवश्यकता है।

 - अंतर्राष्ट्रीय परमाणु सुरक्षा एजेंसी एवं इटरपोल को विभिन्न देशों के परमाणु सुरक्षा इंतजामों की जानकारी देने का इंतजाम करना।

 - देशों को परमाणु सुरक्षा के मसले पर न्यायिक सहयोग करने की आवश्यकता।

 - सभी देशों को सुरक्षित परमाणु संस्कृति विकसित करने के प्रयासों को प्रोत्साहन देना चाहिए।

 - परमाणु जखीरे को आतंकवादी शक्तियों से बचाने के लिए सूचना के आदान-प्रदान के पुख्ता इंतजाम करने की आवश्यकता। परमाणु सुरक्षा सम्मेलन में इंटरपोल को विभिन्न देशों के परमाणु कार्यक्रम की सूचना देने का प्रस्ताव राष्ट्रीय संप्रभुता एवं गोपनीयता का उल्लंघन करता प्रतीत होता है। वहीं परमाणु सुरक्षा के मसले पर परस्पर न्यायिक सहयोग करने का प्रस्ताव भी विभिन्न देशों में दखलंदाजी करने का जरिया हो सकता है। जिसके लिए विकासशील देशों को लामबंदी करने की आवश्यकता है।

 परमाणु ऊर्जा की सुरक्षा को लकर सम्मेलन में व्यक्त की गई चिंता यह संकेत करती है कि अब परमाणु ऊर्जा के विकल्पों की तलाश तेज करनी चाहिए। साथ ही मौजूद विकल्पों में निवेश को प्रोत्साहित करना चाहिए। यूरेनियम के कम प्रयोग करने का ऐलान भी यही साबित करता है कि परमाणु ऊर्जा पर आने वाले समय में निर्भरता कम करने के प्रयासों में तेजी आए ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों के भविष्य की दृष्टि से ग्रीनपीस की रिपोर्ट उम्मीदें जगाती है।

जिसमें देशभर में ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों के माध्यम से कई गांवों एवं पंचायतों में चल रही सफल परियोजनाओं का ब्यौरा प्रकाशित किया गया है। भारत में केन्द्र सरकार ने भी अक्षय ऊर्जा स्रोतों पर सब्सिडी दी है। हालांकि यह सब्सिडी केवल व्यक्तिगत स्तर ही अक्षय ऊर्जा के प्रयोग को प्रोत्साहित करेगी। आवश्यकता है कि ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों के प्रोत्साहन हेतु संस्थागत प्रयास किए जाएं। जिससे आम आदमी को भी उचित दरों पर अक्षय ऊर्जा का लाभ मिल सके।

कर्नाटक सरकार ने हाल ही में अक्षय ऊर्जा कोष स्थापित करने का ऐलान किया है। ऐसे ही प्रयास अन्य राज्य सरकारों द्वारा एवं केन्द्र सरकार के द्वारा किया जाने चाहिए। राजीव गांधी ग्राम विद्युतीकरण परियोजना जैसी फ्लैगशिप योजनाओं में परमाणु ऊर्जा के विकल्पों को प्रोत्साहन देने के प्रयास करना भी एक बेहतर कदम हो सकता है। परमाणु सुरक्षा को लेकर दक्षिण कोरिया में हुए इस वैश्विक सम्मेलन ने परमाणु ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों की ओर आगे बढ़ने का संकेत दिया है। ऐसे में परमाणु ऊर्जा के सहारे विकास को गति देने में लगे देशों के लिए यह विचारणीय है कि वे विकास के लिए परमाणु ऊर्जा की ओर बढ़ें अथवा विकल्पों की तलाश करें। उम्मीद है आने वाला समय परमाणु ऊर्जा के रास्ते से वापस लौटने का होगा।

Wednesday, March 28, 2012

बजट का वादा, कृषि ऋण मिलेगा ज्यादा

रोजगार और पलायन आपस में उत्प्रेरक के समान हैं। यदि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार की उपलब्धता होती है तो पलायन कम होता है। इसके उलट यदि रोजगार की उपलब्धता नहीं होती है तो बड़ी आबादी शहरों की ओर पलायन करती है। ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार के कम अवसर होने के कारण ग्रामीण भारत शहरों का रूख करने लगा है।

 भारत में बड़ी आबादी के शहरों में पहुंचने के कारण शहर विस्तार की ओर हैं। वहीं ग्रामीण भारत संकुचन की ओर है। पिछले कुछ आम बजट में गांवों को सशक्त बनाने के लिए पर्याप्त धन मुहैया कराया गया है। साथ ही विश्व बैंक ने भी भारत के गांवों को संवारने के लिए कर्ज की राशि में राज्यवार बढ़ोत्तरी की है।

गांवों के सशक्तिकरण के लिए जो रकम दी जाती है वह मुख्यतः सड़क निर्माण, शौचालय एवं जलापूर्ति के लिए दी जाती है। इन सुविधाओं की पूर्ति से जीवन सरल होता है, परंतु इनसे पहले भी कुछ आवश्यकताएं होती हैं। जिनकी पूर्ति प्राथमिकता के आधार पर पहले होनी चाहिए। यह आवश्यकता है गांवों में रोजगार की एवं उसके अनुसार प्रशिक्षण की। वर्ष 2012-13 के आम बजट में वित्त मंत्री ने 99,000 करोड़ रू. शौचालय, पेयजल एवं सामाजिक कल्याण की परियोजनाओं के लिए दिया है। यह राशि पिछले बजट की तुलना में 8,000 अधिक है, जिसकी आवश्यकता भी थी। वहीं ग्रामीण क्षेत्र में सड़क परियोजनाओं हेतु 20 प्रतिशत की वृद्धि करते हुए 24,000 हजार करोड़ रू. दिए जाने का ऐलान वित्त मंत्री ने किया है। इसके अलावा मनरेगा को प्रोत्साहन जारी रखते हुए 33,000 करोड़ रू. दिए जाने का ऐलान किया गया है।

 वित्त मंत्री ने आम बजट में ग्रामीण क्षेत्र की आवश्यकताओं एवं ढांचागत सुधार के लिए राशि आवंटित करने में कोई कोताही नहीं बरती है। प्रणव दा ने किसानों को ऋण देने में उदारता दिखाते हुए पिछले बजट के 1,00,000 करोड़ रू. के मुकाबले 5,75,000 करोड़ रू. का ऐलान किया है। बजट में गांवों के लिए राशि के आवंटन में कोई कमी नहीं की गई है, परंतु नीतिगत खामियां नजर आती हैं। बजट में गांवों में रोजगार उपलब्ध कराने के उचित प्रयासों का अभाव दिखता है। मनरेगा एवं महिला स्व-सहायता समूह जैसी योजनाएं अकुशल एवं अर्द्धकुशल श्रमिकों के लिए वैकल्पिक रोजगार की भांति हैं।

 अकुशल श्रमिक को गांवों में रोजगार मिलना एक सुखद संकेत है लेकिन आदर्श स्थिति वह होगी जब कुशल श्रमिक अथवा सुप्रशिक्षित लोगों को भी गांवों में उचित रोजगार मिल सके। आम बजट में ऐसी योजना का अभाव दिखता है। ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को रोजगार के लिए प्रशिक्षित एवं उनको रोजगार देने की किसी भी ठोस योजना का ऐलान बजट में नहीं है। जिसकी सर्वाधिक जरूरत थी। ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन का प्रमुख कारण है अवसरों की कमी एवं कृषि की बढ़ती लागत। जिसके समाधान के लिए दादा ने कोई खाका प्रस्तुत नहीं किया है। गौरतलब है कि कर्ज की राशि में बढ़ोत्तरी करने से कृषि की लागत कम होने वाली नहीं है, बल्कि कर्ज की राशि बढ़ने से किसानों की समस्याओं में इजाफा हो सकता है। जरूरत थी कृषि की लागत को कम करने की तो दादा ने किसानों के लिए कर्ज लेकर घी पीने का इंतजाम कर दिया।

साफ है कि किसानों को अभी राहत के लिए इंतजार करना पड़ेगा। इसके अलावा रोजगार प्रशिक्षण के लिए भी किसी कारगर योजना शुरू करने का साहस वित्त मंत्री ने नहीं दिखाया है। कृषि की लागत को कम करना एवं ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के प्रशिक्षण की व्यवस्था। यह ऐसे पहलू हैं जिनपर प्रयास करने से बेराजगारी एवं पलायन की समस्या को समान रूप से नियंत्रित किया जा सकता है। जिसके लिए बजट में कोई प्रावधान नहीं है। शायद यह प्राथमिक समस्याएं भारत के अर्थशास्त्री बहुल मंत्रिमंडल की प्राथमिकताओं की वरीयता सूची में निचले पायदान पर हैं। जिसका परिणाम है कि बजट में राशि का आवंटन तो भरपूर है परंतु ग्रामीण भारत के सशक्तिकरण के लिए किसी दूरगामी योजना का नितांत अभाव है।

Thursday, March 22, 2012

मार्केटिंग कंपनी का आमरण अनशन

दिल्ली का जंतर-मंतर। एक ऐसा स्थान जिसे देश भर में धरना-प्रदर्शनों के आयोजन स्थल के रूप में जाना जाता है। जंतर-मंतर प्रतिदिन कई धरना प्रदर्शनों का गवाह बनता है। इन प्रदर्शनों में विभिन्न सामाजिक एवं राजनैतिक संगठनों की सक्रियता रहती है, जो अपनी मांगों को लेकर अनशन अथवा धरने पर बैठते हैं। अनशन और धरना लोकतंत्र में विरोध का एवं अपनी मांगों को मनवाने का प्रमुख हथियार रहा है। जिसके इस्तेमाल में लगी हैं मार्केटिंग कंपनियां।

जंतर-मंतर पर पिछले दो दिनों में अलग ही नजारा देखने को मिला है। यहां करीब 500 लोग अन्ना शैली की टोपी लगाए बैठे हैं। इस टोपी पर लिखा है, बेरोजगार बनाम सरकार। बेरोजगार के रूप में जो लोग अनशन पर बैठे हैं, वे हैं मल्टी लेवल मार्केटिंग कंपनी में कार्यरत लोग। दरअसल, राजस्थान के भीलवाड़ा में वित्तीय अनियमित्ताओं के आरोपों के कारण पुलिस ने कंपनी के स्टोरों पर छापेमारी की थी। वित्तीय अनियमित्ताओं के आरोपों की जांच कर रही पुलिस ने आरसीएम कंपनी के प्रबंधकों के जांच पूरी होने तक देश छोड़ने पर भी रोक लगा दी है।

ऐसे में पुलिसिया कार्रवाई एवं सरकार के कसते शिकंजे से घबराए कंपनी के संचालकों ने अनशन को अपना हथियार बनाया है। विडंबना यह है कि अनशन पर बैठने वाले वे ही लोग हैं जिन्हें कंपनी बडे़ सपने दिखाकर अपने व्यापार में इस्तेमाल करती है। कंपनी उनसे सदस्यता शुल्क लेकर अपना सदस्य बनाती हैं। सदस्यता के बाद उसको सामान बेचने एवं नए लोगों को जोड़ने काम दिया जाता है। जितने लोगों को जोड़ें उतनी ही कमाई। यही इन कंपनियों के धंधे का फंडा है।

मौजूदा समय में बरोजगारी की बढ़ती समस्या एवं लोगों के धन कमाने के लालच ने मल्टी लेवल मार्केटिंग कंपनियों को अवसर प्रदान किया है। यद्यपि भारत में इन कंपनियों का कोई बहुत अधिक विस्तार नहीं है, लेकिन ऐसा शहरी वर्ग इनके शिकंजे में अधिक आया है। जो कामयाबी की आसान राह पकड़ने के लिए लालायित है।

भारत में अभी तक यह कंपनियां अपने विस्तार को तरस रही हैं। इसका कारण यह है कि यह कंपनियां एक ऐसा धंधा करने की बात कहती हैं। जिसमें अपने भरोसेमंद व्यक्ति को अपने नेटवर्क में जोड़कर उससे कमीशन लेने की बात की जाती है। यह कार्य कानूनी तो है परंतु भारत में इसे नैतिक स्वीकार्यता नहीं है। मल्टी लेवल मार्केटिंग कंपनियों पर वर्तमान समय में धोखाधड़ी एवं हेराफेरी के आरोप लगे हैं। जिनमें आरसीएम, कनकधारा, स्टाक गुरू, प्रमुख हैं। केरल सरकार ने तो इन कंपनियों पर कार्रवाई करते हुए इन कंपनियों के लिए दिशानिर्देश जारी कर दिए हैं। जिससे इन कंपनियों के लिए झूठे वादे कर लोगों को ठगना आसान नहीं होगा। राजस्थान सरकार भी ऐसा ही कदम उठा सकती है। जिसके विरोध में आरसीएम ने आमरण अनशन को अपना हथियार बनाया है।

भारत में मल्टी लेवल मार्केटिंग का अस्तित्व सन 1998 में एमवे के आगमन से हुआ था। यह कंपनी मूलतः अमेरिका की है। सच यह है कि मल्टी लेवल मार्केटिंग की विधा की शुरूआत ही अमेरिका के कैलिफोर्निया से हुई है। मल्टी लेवल मार्केटिंग उपभोक्तावादी दुनिया का वह फंडा है, जो उपभोक्ता के करीबी व्यक्ति को ही विक्रेता के रूप में उसके पास भेजती है। मल्अी लेवल मार्केटिंग के धंधे में बाजार का प्रतिनिधि उपभोक्ता के परस उसका मित्र अथवा रिश्तेदार बनकर जाता है और उसको वस्तु के उपभोग अथवा उपयोग के लिए आकर्षित करता है। इस विधा की आवश्यकता उस वक्त पड़ती है, जब बाजार आम तरकीबों से उपभोक्ताओं को आकर्षित नहीं कर पाता है।

मल्टी लेवल मार्केटिंग कंपनियों का यह अनशन भारत में उनके विस्तार न होने की चिंता का परिणाम है। जिसको लेकर इन कंपनियों ने अनशन जैसे उपक्रम का सहारा लिया है। दरअसल, मल्टी लेवल मार्केटिंग कंपनियों को उनके मूल स्थान अमेरिका में ही कामयाबी नहीं मिल पाई है। जैसे-

अमेरिका के फेडरल ट्रेड कमीशन ने 1979 में एमवे को मूल्य निर्धारण एवं आय के अतिरंजित दावे करने का दोषी पाया था। जिसके बाद कमीशन ने इन कंपनियों पर निगरानी रखे जाने की बात कही थी, जो उत्पाद की बिक्री से ज्यादा लोगों की भर्ती पर विश्वास रखती हैं।

वहीं वाल्टर जे कार्ल ने अपने लेख में कहा है- ‘‘यह कंपनियां उपभोक्ताओं के करीबी लोगों का इसी प्रकार इस्तेमाल करती हैं, जैसे किसी व्यापारिक संगठन द्वारा बाइबल का अनैतिक इस्तेमाल करना।‘‘

स्पष्ट है कि मल्टी लेवल मार्केटिंग का फंडा उस पूंजीवादी व्यवस्था में ही खारिज हो गया है, जहां उसकी शुरूआत हुई थी। ऐसे में भारत में पूंजीवाद के इस उपक्रम को कामयाबी मिलना असंभव प्रतीत होता है। जंतर-मंतर पर धरने पर बैठी इन कंपनियों की यह हालत बयां करती है कि भारत में निहायती पूंजीवादी यह उपक्रम अपना कारोबार समेटने के कगार पर हैं।