Monday, May 27, 2013

भारतीय अस्मिता से परे गूगल का डूडल

 
आज लोगों में यह जुमला आम प्रचलित हो गया है कि कोई भी जानकारी चाहिए तो इंटरनेट पर सर्च कर लो। सब कुछ मिल जाएगा। लगभग सब कुछ मिलता भी है। गूगल की दुनिया ने लोगों को ज्ञान और संवाद का एक सुलभ मंच उपलब्ध कराया है। यही कारण है कि किसी भी जानकारी के लिए लोगों की निर्भरता इंटरनेट पर बढ़ती जा रही है। युवाओं की जमात के लिए तो किसी भी जिज्ञासा का सहज और अंतिम समाधान इंटरनेट ही है। ऐसे में इंटरनेट की दुनिया में जो भी परोसा जाता है लोग उसे जिज्ञासापूर्ण तरीके से लेते हैं। यही गूगल की सफलता का कारण भी है। किसी को भी उपयोग या उपभोग के लिए आकर्षित करने के लिए यह जरूरी है कि उस व्यक्ति में संबंधित वस्तु अथवा सेवा के प्रति जिज्ञासा पैदा की जाए। ऐसी ही जिज्ञासा गूगल भी जगाता है। वैश्वीकरण के टूल की बात की जाए तो गूगल वैश्वीकरण का सबसे बड़ा टूल है। 
वर्तमान वैश्विक ग्राम की अवधारणा को गूगल ने मजबूती प्रदान की है। एक कमरे में बैठा व्यक्ति गूगल के जरिए दुनिया से जुड़ सकता है, संवाद कायम कर सकता है। लेकिन गूगल की दुनिया उसे दुनिया की सैर तो कराती है, पर कहीं कहीं व्यक्ति को उसकी ही संस्कृति से परे भी ले जाने का काम करती है।

टेलीविजन और बाजार के माध्यम से पश्चिमी देशों ने भारत जैसे विकासशील देशों में उनकी सांस्कृतिक जड़ों को कमजोर कर उपभोक्तावाद की ओर ले जाने के प्रयास किए। अब यही काम गूगल की दुनिया के जरिए भी किया जा रहा है। कहा जाता है कि जिस देश के लोग अपने पिछले इतिहास को भूल जाते हैं, वे अपने देश के बारे में बेहतर भविष्य योजना भी नहीं बना पाते हैं। भारत की युवा पीढ़ी के जेहन से उसके इतिहास को विस्मृत करने के काम को गूगल भी अंजाम दे रहा है। जिसका उदाहरण है गूगल का डूडल। इंटरनेट की शब्दावली में डूडल उन चित्रों को कहा जाता है जो किसी विशेष अवसर या व्यक्ति की याद में गूगल के होमपेज पर प्रदर्शित किए जाते हैं। लेकिन बात करें इन डूडल्स की तो भारतीय सरोकारों से यह डूडल लगभग अछूते ही हैं। वर्ष 2012 में प्रदर्शित डूडल्स की बात की जाए तो वर्ष की शुरूआत नववर्ष के बधाई संदेश वाले डूडल से शुरू होती है। इसके बाद 7 जनवरी को अमरीकी कार्टूनिस्ट चाल्र्स एडम की जयंती मनाई जाती है। जिनके नाम से शायद ही भारत के अधिकतर इंटरनेट उपयोगकर्ता वाकिफ होंगे। इसके बाद 11 जनवरी को निकोलस स्टेनो नामक के डेनिश वैज्ञानिक को याद किया जाता है। इसी प्रकार से अनेकों डूडल प्रदर्शित किए जाते हैं जिनका भारत से कोई सरोकार नहीं है। हालांकि 26 जनवरी को भारतीय गणतंत्र दिवस और 15 अगस्त को भारतीय स्वतंत्रता दिवस जरूर गूगल पर मनाया जाता है। लेकिन इसके अलावा वर्ष भर भारतीय इंटरनेट उपयोगकर्ता गूगल के डूडल के जरिए दुनिया की सैर तो करते हैं, लेकिन भारत से अछूते ही रहते हैं। गौरतलब है कि जिन महात्मा गांधी के बारे में पूरी दुनिया जानना चाहती है, उनका स्मरण करने के लिए गूगल के डूडल के पास वक्त नहीं होता है। जबकि बापू के जन्मदिवस को संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस के तौर पर घोषित किया है। 
पूरे विश्व में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की बात की जाए तो भारत इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या के लिहाज से तीसरे स्थान पर आता है। सन् 2011 के आंकड़ों के अनुसार चीन में लगभग 54 करोड़ लोग इंटरनेट की दुनिया में सक्रिय हैं, वहीं अमरीका में लगभग 24 करोड़ दो लाख लोग गूगल की दुनिया में मौजूद हैं। वहीं लगीाग 11 करोड़ दस लाख इंटरनेट यूजर्स के साथ इंटरनेट उपयोगकताओं की संख्या के लिहाज से भारत दुनिया का तीसरा देश है। अब सवाल यह है कि जिस गूगल की दुनिया में सक्रिय लोगों की संख्या के लिहाज से भारत तीसरे स्थान पर है, वहीं गूगल के डूडल ने भारत को एक तरह से अनलाइक ही किया हुआ है। वर्ष भर प्रकाशित डूडल स्वीडन, अमरीका, इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी और इटली आदि की सैर तो कराते हैं, लेकिन भारत की अस्मिता से इंटरनेट यूजर्स का परिचय नहीं कराते। अमरीका के मार्टिन लूथर किंग की अश्वेत क्रांति को तो गूगल बताता है, लेकिन गांधी या अंबेडकर के जीवन परिचय और उनके सामाजिक योगदान से वह परे ही रहता है। आज भारत में जहां इंटरनेट को क्रांति का वाहक कहा जा रहा है, कुछ एक आंदोलनों से ऐसा साबित हुआ भी है। लेकिन यही इंटरनेट बीते समय में हमारी क्रांतिकारी विरासत की जानकारी ही युवा पीढ़ी को नहीं देता। आज डूडल पर भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद नदारद हैं तो इंटरनेट के साथ पली-बढ़ी पीढ़ी किस प्रकार इनके आदर्शों को आत्मसात कर पाएगी। 
सच यह है कि गूगल के होमपेज पर प्रदर्शित होने वाले गूगल को लेकर कोई निश्चित नीति नहीं है और गूगल से जुड़े कुछ एनीमेटर ही इस काम को अंजाम देते हैं। ऐसे में गूगल के डूडल में भारत को भी उपयोगकर्ताओं की संख्या के अनुपात में हिस्सेदारी अवश्य मिलनी चाहिए। या फिर भारत को भी गूगल के विकल्प पर विचार करते हुए स्वदेशी सर्च इंजन के आवष्किार पर विचार करना चाहिए। यह इस दिशा में सोचने का वक्त है कि क्या भारत को स्वदेशी सर्च इंजन की आवश्यकता है, जो हमारी भाषा में हमारी संस्कृति और मूल्यों को प्रोत्साहित करने का कार्य करे। और इंटरनेट की दुनिया में भारतीय क्रांति का वाहक बन सके। यहां कहने का अर्थ यह नहीं कि गूगल का विरोध है, लेकिन हमें गूगल के विकल्प के तौर स्वदेशी सर्च इंजन के बारे में अवश्य विचार करना चाहिए। 

Saturday, April 20, 2013

फेसबुक क्रांति के नौ वर्ष


4 फरवरी को दुनिया की सबसे बड़ी सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक ने अपने जीवन का नौवां वसंत देखा। हार्वर्ड विश्वविद्यालय के छात्र मार्क जुकरबर्ग ने 4 फरवरी, 2004 को फेसबुक की शुरूआत फेसमैश के नाम से   की थी। शुरू में यह हार्वर्ड के छात्रों के लिए ही अंतरजाल का काम कर रही थी, लेकिन शीघ्र ही लोकप्रियता मिलने के साथ इसका विस्तार पूरे यूरोप में हो गया। सन 2005 में इसका नाम परिवर्तित कर फेसबुक कर दिया गया। दुनिया भर में 2.5 अरब उपयोगकर्ताओं वाली फेसबुक में भी वक्त के साथ कई आयाम जुड़ते चले गए। सन 2005 में फेसबुक ने अपने उपयोगकर्ताओं को नई सौगात दी, जब उसने उन्हें फोटो अपलोड करने की भी सुविधा प्रदान की। 
          फेसबुक के सफर का यह सबसे महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी कदम था, जिसने वर्चुअल दुनिया को नए आयाम देने का काम किया। फोटो अपलोड करने की सुविधा इस लिए क्रांतिकारी कदम थी, क्योंकि फोटो के माध्यम से विचारों की अभिव्यक्ति को जीवंतता मिली। बदलते वक्त और बदलते समाज का आईना बनी फेसबुक से देखते ही देखते नौ वर्षों में अरबों लोग जुड़े। सन 2006 के सितंबर माह में फेसबुक ने 13 वर्ष से अधिक आयु के लोगों को फेसबुक से जुड़ने की स्वतंत्रता प्रदान की। इससे इसका दायरा और भी व्यापक हुआ। प्रारंभ में फेसबुक का उपयोग सोशल नेटवर्क स्थापित करने और नए लोगों से जुड़ने के लिए ही होता रहा। लेकिन वक्त की तेजी के साथ ही फेसबुक को भी नए आयाम मिले। संगठित मीडिया की चुनी हुई और प्रायोजित खबरों की घुटन से निकलने के लिए भी सामाजिक तौर पर सक्रिय लोगों ने फेसबुक का प्रयोग किया। दिसंबर 2010 में विश्व ने अरब में क्रांति का अदभुत दौर देखा, अद्भुत इसलिए कि अरब के जिन देशों में कई दशकों से तानाशाही शासन चल रहा था, वहां लोगों ने सड़कों पर उतरकर मुखर प्रदर्शन किया। प्रदर्शन ही नहीं तानाशाहियों को सत्ता से खदेड़ने का काम किया। समस्त विश्व उस समय हतप्रभ रह गया कि यह कैसे हुआ ? 
       जिस अरब में आम लोग सरकार की नीतियों की आलोचना करने से भी डरते थे, वहां सत्ता विरोधी ज्वार अचानक कैसे आया। इसका उत्तर केवल यही था, सोशल मीडिया के कारण। ट्यूनीसिया, मिस्र, यमन, लीबिया, सीरिया, बहरीन, सउदी अरब, कुवैत, जार्डन, सूडान जैसे पूर्व मध्य एशिया और अरब के देशों ने क्रांति की नई सुबह को देखा। इसका कारण यही था कि वहां के सत्ता प्रतिष्ठानों द्वारा संचार माध्यमों पर लागू लौह परदा के सिद्धांत का विकल्प लोगों को सोशल मीडिया के रूप में मिल गया। सरकारी मीडिया आमजन की जिस आवाज और गुस्से को मुखरित होने से रोक देता था, सोशल मीडिया ने उसका विकल्प और जवाब आम जन के सामने रखा।                                 
               सरकारी बंदिशों, संपादकीय नीति और समाचार माध्यमों पर बने बाजारू दबावों से मुक्त सोशल मीडिया ने आमजन की आवाज को मंच प्रदान कर मुखरित करने का कार्य किया। सोशल मीडिया द्वारा उभरी इस क्रांति का सबसे लोकप्रिय वाहक बना फेसबुक। एक समय पर अनेकों लोगों के संवाद करने की सुविधा, विचारों को आदान-प्रदान करने का मंच, जिसमें शब्दों की सीमा में बंधे बिना अपने विचारों को अभिव्यक्त किया जा सकता है। फेसबुक की इसी विशेषता ने आमजन के बीच चल रहे विचारों के प्रवाह को दिशा प्रदान की। अपनी व्यस्त जिंदगी में लोगों ने फेसबुक के माध्यम से अपने विचारों को एक-दूसरे को सहज ढंग से पहुंचाया और राजनीतिक-सामाजिक समस्याओं के प्रति जनांदोलनों की नींव रखी जाने लगी। सोशल मीडिया जनित यह आंदोलन अरब देशों तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि अमरीका के वाल स्ट्रीट होते हुए, यह दुनिया के सबसे बड़े  लोकतंत्र के जंतर-मंतर तक पहुंच गए। अमरीका में वाल स्ट्रीट घेरो आंदोलन हुआ, जिसमें अमीर देश का तमगा धारण किए अमरीका के नागरिकों ने आंदोलन किया और देश के संसाधनों का 1 प्रतिशत लोगों के हाथों में सिमटना चिंताजनक बताया। अमरीका में हुए इस आंदोलन ने दुनिया भर का ध्यान खींचा। इस आंदोलन ने बताया कि दुनिया का शीर्ष देश कहलाने वाले अमरीका में भी किस पर गैरबराबरी व्याप्त है। आंदोलनों की इस बयार से भारत भी अछूता नहीं रहा और यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार और नीतिगत असफलताओं को लेकर जंतर-मंतर से सड़कों तक सत्ता विरोधी आंदोलन के स्वर मुखरित हुए। यह आंदोलन सोशल मीडिया और उसके प्रमुख घटक फेसबुक की ही देन थे। 
            फेसबुक के नौवें जन्मदिन से कुछ दिन पूर्व ही एक आंदोलन और हुआ। दिल्ली में हुए गैंगरेप के विरोध में आंदोलन। यह आंदोलन तो पूरी तरह उसी जमात का था, जिसे फेसबुकिया या सोशल मीडिया के क्रांतिकारी कहा जाता रहा है। यह कहना ठीक ही होगा कि अपने नौंवा वर्षों के संक्षिप्त समय में फेसबुक ने नई उंचाईयों को छुआ है और मुख्यधारा की मीडिया से अलग भी वैयक्तिक राय की स्वतंत्रता प्रदान करते हुए विभिन्न आंदोलनों को मूर्त रूप दिया है। उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में भी फेसबुक नए पायदान चढ़ता जाएगा और वर्चुअल दुनिया की यह क्रांतिकारी बुक आने वाले वक्त में भी आमजन की आवाज को मुखरता प्रदान करती रहेगी।  

साहित्यिक पत्रकारिता के ‘अमृत‘ विद्यानिवास मिश्र

हिंदी पत्रकारिता को शिखर तक पहुंचाने में हिंदी साहित्य और साहित्यकारों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। भारतीयता, भारतीय संस्कृति और सनातन संस्कृति के प्रवाह को जीवंत बनाए रखने में हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता ने अपना अथक योगदान दिया है। आज के दौर में हिंदी पत्रकारिता जिस प्रकार साहित्य से विलग दिखाई पड़ती है, ऐसी पहले न थी बल्कि एक वक्त तो ऐसा भी था, जब साहित्य और पत्रकारिता एक-दूसरे का सहारा बन आगे बढ़ रहे थे। हिंदी पत्रकारिता को उसका ध्येय पथ दिखलाने का कार्य समय-समय पर ऐसे पत्रकारों ने किया, जो साहित्य की विधा में भी सिद्धहस्त थे। भारतेंदु हरीशचंद्र, माखनलाल चतुर्वेदी, हनुमान प्रसाद पोद्दार, महावीर प्रसाद, हजारी प्रसाद द्विवेदी आदि इसी कड़ी के नाम हैं, जिन्होंने हिंदी की लड़ाई लड़ी। साहित्य और पत्रकारिता की इस विरासत को बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में प्रवाहमय बनाए रखने का कार्य किया विद्यानिवास मिश्र ने। मिश्र जी हिंदी साहित्य, परंपरा, संस्कृति के मर्मज्ञ थे। 
हिंदी पत्रकारिता और साहित्य के बेहतरीन और कारगर सम्मिश्रण की मिसाल पेश करने वाले विद्यानिवास मिश्र ने पत्रकारिता के माध्यम से भारतीयता को मुखरता प्रदान की। सन 1926 में गोरखपुर के पकड़डीहा गांव में जन्मे विद्यानिवास मिश्र अपनी बोली और संस्कृति के प्रति सदैव आग्रही रहे। सन 1945 में प्रयाग विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर एवं डाक्टरेट की उपाधि लेने के बाद उन्होंने अनेकों वर्षों तक आगरा, गोरखपुर, कैलिफोर्निया और वाशिंगटन विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य किया। विद्यानिवास मिश्र देश के प्रतिष्ठित संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय एवं काशी विद्यापीठ के कुलपति भी रहे। इसके बाद अनेकों वर्षों तक वे आकाशवाणी और उत्तर प्रदेश के सूचना विभाग में कार्यरत रहे। हिंदी साहित्य के सर्जक विद्यानिवास मिश्र ने साहित्य की ललित निबंध की विधा को नए आयाम दिए। हिंदी में ललित निबंध की विधा की शुरूआत प्रतापनारायण मिश्र और बालकष्ण भटट ने की थी, किंतु इसे ललित निबंधों का पूर्वाभास कहना ही उचित होगा। ललित निबंध की विधा के लोकप्रिय नामों की बात करें तो हजारी प्रसाद द्विवेदी, विद्यानिवास मिश्र एवं कुबेरनाथ राय आदि चर्चित नाम रहे हैं। लेकिन यदि लालित्य और शैली की प्रभाविता और परिमाण की विपुलता की बात की जाए तो विद्यानिवास मिश्र इन सभी से कहीं अग्रणी रहे हैं। विद्यानिवास मिश्र के साहित्य का सर्वाधिक महत्वपूर्ण हिस्सा ललित निबंध ही हैं। उनके ललित निबंधों के संग्रहों की संख्या भी 25 से अधिक होगी। 
        
 लोक संस्कृति और लोक मानस उनके ललित निबंधों के अभिन्न अंग थे, उस पर भी पौराणिक कथाओं और उपदेशों की फुहार उनके ललित निबंधों को और अधिक प्रवाहमय बना देते थे। उनके प्रमुख ललित निबंध संग्रह हैं- राधा माधव रंग रंगी, मेरे राम का मुकुट भीग रहा है, शैफाली झर रही है, चितवन की छांह, बंजारा मन, तुम चंदन हम पानी, महाभारत का काव्यार्थ, भ्रमरानंद के पत्र, वसंत आ गया पर कोई उत्कंठा नहीं और साहित्य का खुला आकाश आदि आदि। वसंत ऋतु से विद्यानिवास मिश्र को विशेष लगाव था, उनके ललित निबंधों में ऋतुचर्य का वर्णन उनके निबंधों को जीवंतता प्रदान करता था। वसंत ऋतु पर लिखे अपने निबंध संकलन फागुन दुइ रे दिना में वसंत के पर्वों को व्याख्यायित करते हुए, अपना अहंकार इसमें डाल दो शीर्षक से लिखे निबंध में वे शिवरात्रि पर लिखते हैं-

‘‘शिव हमारी गाथाओं में बड़े यायावर हैं। बस जब मन में आया, बैल पर बोझा लादा और पार्वती संग निकल पड़े, बौराह वेश में। लोग ऐसे शिव को पहचान नहीं पाते। ऐसे यायावर विरूपिए को कौन शिव मानेगा ? वह भी कभी-कभी हाथ में खप्पर लिए। ऐसा भिखमंगा क्या शिव है ?"

इसके बाद इन पंक्तियों को विवेचित करते हुए विद्यानिवास मिश्र लिखते हैं-

‘‘हां, यह जो भीख मांग रहा है, वह अहंकार की भीख है। लाओ, अपना अहंकार इसमें डाल दो। उसे सब जगह भीख नहीं मिलती। कभी-कभी वह बहुत ऐश्वर्य देता है और पार्वती बिगड़ती हैं। क्या आप अपात्र को देते हैं ? शिव हंसते हैं, कहते हैं, इस ऐश्वर्य की गति जानती हो, क्या है ? मद है। और मद की गति तो कागभुसुंडि से पूछो, रावण से पूछो, बाणासुर से पूछो।"

इन पंक्तियों का औचित्य समझाते हुए मिश्र जी लिखते हैं-

‘‘पार्वती छेड़ती हैं कि देवताओं को सताने वालों को आप इतना प्रतापी क्यों बनाते हैं ? शिव अट्टाहास कर उठते हैं, उन्हें प्रतापी न बनाएं तो देवता आलसी हो जाएं, उन्हें झकझोरने के लिए कुछ कौतुक करना पड़ता है।"

यह मिश्र जी की अपनी उद्भावना है, प्रसंग पौराणिक हैं, किंतु वर्तमान पर लागू होते हैं। पुराण कथाओं का संदर्भ देते हुए विद्यानिवास मिश्र ने साहित्य के पाठकों को भारतीय संस्कति का मर्म समझाने का प्रयास किया है। उनके ललित निबंधों में जीवन दर्शन, संस्कृति, परंपरा और प्रकति के अनुपम सौंदर्य का तालमेल मिलता है। इस सबके बीच वसंत ऋतु का वर्णन उनके ललित निबंधों को और अधिक रसमय बना देता है। ललित निबंधों के माध्यम से साहित्य को अपना योगदान देने वाले विद्यानिवास हिंदी की प्रतिष्ठा हेतु सदैव संघर्षरत रहे, मारीशस से सूरीनाम तक अनेकों हिंदी सम्मेलनों में मिश्र जी की उपस्थिति ने हिंदी के संघर्ष को मजबूती प्रदान की। हिंदी की शब्द संपदा, हिंदी और हम, हिंदीमय जीवन और प्रौढ़ों का शब्द संसार जैसी उनकी पुस्तकों ने हिंदी की सम्प्रेषणीयता  के दायरे को विस्तृत किया। तुलसी और सूर समेत भारतेंदु, अज्ञेय, कबीर, रसखान, रैदास, रहीम और राहुल सांकृत्यायन की रचनाओं को संपादित कर उन्होंने हिंदी के साहित्य को विपुलता प्रदान की।

         विद्यानिवास जी कला एवं भारतीय संस्कृति के मर्मज्ञ थे। खजुराहो की चित्रकला का सूक्ष्मता और तार्किकता से अध्ययन कर उसकी नई अवधारणा प्रस्तुत करने वाले विद्यानिवास मिश्र ही थे। अकसर भारतीय चिंतक विदेशी विद्वानों से बात करते हुए खजुराहो की कलाकृतियों को लेकर कोई ठोस तार्किक जवाब नहीं दे पाते थे। विद्यानिवास जी ने अपने विवेचन के माध्यम से खजुराहो की कलाकृतियों की अवधारणा स्पष्ट करते हुए लिखा है-
‘‘यहां के मिथुन अंकन साधन हैं, साध्य नहीं। साधक की अर्चना का केंद्रबिंदु तो अकेली प्रतिमा के गर्भग्रह में है। यहां अभिव्यक्ति कला रस से भरपूर है। जिसकी अंतिम परिणति ब्रहम रूप है। हमारे दर्शन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की जो मान्यताएं हैं, उनमें मोक्ष प्राप्ति से पूर्व का अंतिम सोपान है काम।"
 उन्होंने कहा कि यह हमारी नैतिक दुर्बलता ही है कि खजुराहो की कलाकृतियों में हम विकृत कामुकता की छवि पाते हैं। स्त्री पुरूष अनादि हैं, जिनके सहयोग से ही सृष्टि जनमती है।

                            सन 1990 के दशक में मिश्र जी ने नवभारत टाइम्स के संपादक के रूप में जिम्मेदारी संभाली। उदारीकरण के दौर में खांटी हिंदी पत्रकारिता को आगे बढ़ाने वाले महत्वपूर्ण पत्रकारों में से एक मिश्र जी ने नवभारत टाइम्स को हिंदी के प्रतिष्ठित समाचार पत्र के रूप में नई पहचान दिलाई। पत्रकारीय धर्म और उसकी सीमाओं को लेकर वे सदैव सचेत रहते थे। वे अकसर कहा करते थे कि-

‘‘मीडिया का काम नायकों का बखान करना अवश्य है, लेकिन नायक बनाना मीडिया का काम नहीं है।" 

अपने पत्रकारीय जीवन में भी विद्यानिवास मिश्र हिंदी के प्रति आग्रही बने रहे। वे अंग्रेजी के विद्वान थे, लेकिन हिंदी लिखते समय अंग्रेजी के शब्दों का घालमेल उन्हें पसंद नहीं था। उन्होंने नवभारत टाइम्स के संपादक की जिम्मेदारी ऐसे वक्त में संभाली, जब हिंदी पत्रों के मालिक उदारीकरण के बाद बाजारू दबाव में हिंदी में अंग्रेजी के घालमेल का प्रयास कर रहे थे। अखबार मालिकों की मान्यता थी कि युवा पाठकों को यदि लंबे समय तक पत्र से जोड़े रखना है, तो हिंदी में अंग्रेजी शब्दों को जबरदस्ती ही सही घुसाना ही होगा। नवभारत टाइम्स के मालिक समीर जैन की भी यही मान्यता थी कि हिंदी समाचार पत्रों में अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग होना वक्त की जरूरत है।  इन्हीं वाद-विवादों के बीच उन्होंने नवभारत टाइम्स के संपादक की जिम्मेदारी से स्वयं को मुक्त कर लिया, किंतु हिंदी में घालमेल को लेकर वे  कभी राजी नहीं हुए। हालांकि विद्यानिवास जी के नवभारत टाइम्स छोड़ने के बाद यह पत्र उसी राह पर आगे बढ़ा, जिस पर इसके मालिक समीर जैन ले जाना चाहते थे। विद्यानिवास जी ने नवभारत टाइम्स से अलग होने के बाद साहित्य अमृत पत्रिका का संपादन किया। व्यावसायिकता के बाजारू दौर में साहित्य अमृत पत्रिका ने विद्यानिवास जी के संपादकत्व में बतौर साहित्यिक पत्रिका नए मानक स्थापित किए। साहित्य अमृत का सौवां अंक भी विद्यानिवास जी के समय ही निकला था। पत्रिका के सौवें अंक के संपादकीय में संकल्पपूर्ण शब्दों में लिखा था- 
‘‘हमें इतना परितोष है कि हम साहित्य अमृत पत्रिका को साहित्य की निरंतरता का मानदंड बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं।" 

साहित्य अमृत पत्रिका ऐसे वक्त में जब पत्रकारीय मूल्य अन्य स्तंभों की भांति ही ढलान पर हों, बाजार के दबाव में आए बिना भारतीय संस्कृति के महत्व को उद्घाटित करती रही है। सौवें अंक के संपादकीय में भारतीयता का उद्घोष करते हुए विद्यानिवास मिश्र ने जयशंकर प्रसाद की पंक्तियों को उद्धृत करते हुए लिखा-

‘‘किसी का हमने छीना नहीं, प्रकति का रहा पालना यही, हमारी जन्मभूमि थी यही, कहीं से हम आए थे नहीं।"

मिश्र जी साहित्य अमृत पत्रिका का संपादन अंतिम समय तक करते रहे। साहित्य अकादमी पुरस्कार, कालिदास पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार, पद्म विभूषण, पद्मश्री और अनेकों उपाधियों से सम्मानित विद्यानिवास मिश्र का 14 फरवरी, 2005 का सड़क दुर्घटना में देहांत हो गया। उस वर्ष उनका प्रिय पर्व वसंत पंचमी 13 फरवरी को था। वसंत ऋतु में ही वे अपना शरीर त्यागकर इहलोक की यात्रा पर निकल पड़े। पं. विद्यानिवास मिश्र के इस दुनिया से जाने के बाद भी उनकी पत्रकारिता और साहित्य की सौरभ इस रचनाशील जगत को महकाती रहेगी।