Saturday, February 12, 2011

भ्रष्टाचार का महाकुम्भ

  भारत में इन दिनों भ्रष्टाचार का महाकुम्भ चल रहा है. जिस तरह महाकुम्भ में ज्यादा से ज्यादा लोग पहुँच कर डुबकी लगाते हैं, उसी प्रकार से देश में भ्रष्टाचार का महाकुम्भ चल रहा है. इस कुम्भ में नेता,अभिनेता,न्यायाधीश,नौकरशाह, व्यापारी सभी डुबकी लगा रहे हैं. इसकी वजह यह है कि उन्हें इसका दुबारा मौका मिलेगा या नहीं यह निश्चित नहीं है. इसलिए पीढ़ियों के लिए धन जोड़ने में जल्दी कर रहे हैं. देश में बेरोजगारी बढती जा रही ऐसे में इनके बच्चों को रोजगार के लिए न भटकना पड़े,इसलिए बेचारे उनकी व्यवस्था करे जा रहे हैं. खैर इसमें उनकी कोई गलती भी नहीं है, यह तो माता-पिता का कर्त्तव्य होता है. फिर जनता तो आखिर जनता ही है, वह तो अपना कमा ही लेगी. लेकिन इनकी फाईव स्टार जिंदगी कैसे कटेगी,इसके लिए तो घोटाला परम आवश्यक है. फिर आम जनता के लिए भारतीय संस्कृति में बताया गया संतोषम परम सुखं का मंत्र तो है ही है. अर्थात संतोष ही सबसे बड़ा सुख है. जब संतोष ही सबसे बड़ा सुख है,तो फिर धन-दौलत का क्या करना है. लेकिन उनके लिए तो धन ही सुख का साधन है, इसलिए उनको ही इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है. यह तो अब हमको-आपको समझ ही लेना चाहिए, कि राजसत्ता जाने का दुःख क्या होता है. राम के वनवास जाने का बड़ा दुखमय वर्णन आज भी किया जाता है,फिर ये तो साधारण मनुष्य ही हैं. अपने देश में यह भी कहा जाता है कि जिसके पास खोने को कुछ नहीं होता है, वह सबसे सुखी इन्सान होता है. इस कथन के आधार पर भी हमें शांत ही रहना चाहिए. नाहक क्यों किसी का जलूस निकाले जा रहे हैं. जब संतोष ही सबसे बड़ा सुख है तो फिर संतोष करिए. इससे भी मन नहीं मानता है तो,अख़बार पढ़ते वक्त चिंता व्यक्त कीजिये. क्योंकि यही अब हम लोगों का स्वभाव जो बन गया है. हमें अपने काम से ही समय नहीं है तो फिर हम कुछ कर कैसे सकते हैं.
यह मेरा कहना नहीं है, ऐसा इस देश के वातावरण को देख कर लग रहा है. जीडीपी का ५० प्रतिशत धन स्विस बैंक में जमा है.अब तक करीब चार लाख करोड़ के घोटाले सामने आ चुके हैं, लेकिन आम लोग, हम लोग इस मुद्दे को लेकर कितनी बार सड़क पर उतरे हैं, शायद एक भी बार नहीं. शायद हम लोगों के लिए संतोष ही परम सुख हो गया है. नहीं तो जातिगत आरक्षण के लिए आगजनी करने वाले हम लोग इन घोटालों के ठेकदारों के विरोध में क्यों नहीं सड़क पर आते हैं. सगोत्र विवाह हमें बर्दाश्त नहीं है, प्यार करने वाले हमारे दुश्मन हैं, लेकिन यह भ्रष्ट व्यवस्था हमें कैसे बर्दाश्त है. युवा पीढ़ी के कदम थामने को, दलितों पर अत्याचार को स्वीकृति देने को पंचायतें आये दिन लगती रहती हैं, लेकिन इन राष्ट्रव्यापी मुद्दों पर क्यों जुबान नहीं खुलती है. समाज के आम लोगों के लिए तो देवबंद से भी फतवे आ रहे हैं, लेकिन देश को हुए भ्रष्टाचार रुपी लकवे से कौन बचाएगा. यह हमारी नहीं तो किसकी जिम्मेदारी है, इसकी भी निगरानी अमेरिका तो नहीं करने वाला है. या शायद हमारी मानसिकता इतनी संकीर्ण हो गयी है, कि हमें देश हित सबसे आखिरी में भी नहीं दिखता है. हमारी लड़ाई हमें लड़नी होगी, अपना तहरीर चौक हमें ढूंढना होगा, तभी देश कि लुंज-पुंज व्यवस्था में कुछ सुधार हो सकता है. यदि संतोष ही सबसे बड़ा सुख होता है तो, तो भय बिना प्रीत भी नहीं होती है इसलिए हमें निरंकुश शासन को सुधरने के लिए आगे आना ही होगा. इससे पहले कि यह राष्ट्र मिस्त्र,यमन,जोर्डन, ट्यूनीशिया कि राह पर चला जाये. हमें यहाँ कि मुबारक सत्ता को आईना दिखाना ही होगा. यही भारत में लोकतंत्र कि रक्षा के लिए, अराजकता से देश को बचाने के लिए आवश्यक हो चुका है. किसी भी बुराई का अंत लड़ाई से होता है, तो हो जाइये तैयार इस लड़ाई के लिए, देश को बचाने के लिए. भ्रष्टाचार पर हमारी विजय ही, लोकतंत्र कि विजय होगी.

Friday, February 11, 2011

पाक में अमेरिका विरोधी लहर

 पाकिस्तान में इन दिनों अमेरिका विरोधी लहर चल रही है. पाकिस्तानी नेताओं पर इस्लामी कट्टरपंथी लोगों का दबाव है की वे अमेरिकी सेनाओं द्वारा की जा रही कार्रवाई को समर्थन देना बंद करें. इसी दबाव के चलते पाक नेताओं ने अमेरिकी राजनयिक डेविस को रिहा नहीं किया है. जिसके फलस्वरूप अमेरिकी संसद में भी पाक को दी जाने वाली मदद में कटौती की मांग उठी है. इस पूरे प्रकरण को यदि भारतीय नजरिये से देखा जाये तो भारत के लिहाज से यह अच्छा ही रहा है. पाक द्वारा अमेरिकी राजनयिक को रिहा न किये जाने की वजह २६\११ मामले में अमेरिका की सक्रियता है. पाक सेना और कट्टरपंथियों को अमेरिकी अदालत द्वारा जनरल शुजा पाशा को समन भेजना बहुत ही नागवार गुजरा है. जिसके जवाब में पाक ने उसके राजनयिक को रिहा नहीं किया. जिससे लम्बे समय से पाक को दी जाने वाली आर्थिक मदद को रोकने की मांग ने जोर पकड़ा है. भारत के लिहाज से यह बहुत ही अच्छा है की पाक और अमेरिका आमने-सामने हैं, अब भारत को केवल यह देखना है की पाक इस स्थिति से कैसे निपटता है. लेकिन इसमें ध्यान देने वाली बात यह है की अमेरिका मुंबई हमलों को लेकर पाक पर शिकंजा नहीं कस रहा, बल्कि इसका कारण उसके राजनयिक की रिहाई नहीं होना है. इससे पहले भी अमेरिकी अदालत ने भारत की शिकायत पर शुजा पाशा को समन नहीं भेजा था. उसने अमेरिकी नागरिकों की याचिका पर शुजा पाशा को समन भेजा था. पाक पर कसता अमेरिकी शिकंजा भारत की शिकायतों का नतीजा नहीं बल्कि अमेरिका के अपने हितों की वजह से है. ध्यान रहे की अमेरिका ने कभी भारत की शिकायतों पर ध्यान नहीं दिया जब तक उसमें उसके हित न हों. इसलिए हमें भी अमेरिका की ओर कभी नहीं देखना चाहिए बल्कि अपने हितों को अधिक महत्व देना चाहिए. अमेरिका से मित्रता हमारी कूटनीति का परिणाम नहीं है, बल्कि इसमें भी अमेरिका के ही हितों की पूर्ति होती है. इसलिए भारत को ध्यान रहना चाहिए की अमेरिका मित्र नहीं बल्कि हित साधक है. जिसके मित्र समय-समय पर बदलते रहते हैं. अमेरिका द्वारा भारतीय राजनयिकों से किया गया व्यवहार, और ताजा प्रकरण जिसमें छात्रों के पैरों में रेडियो टैग बांधने का मामला इसकी ताजा मिसालें हैं. हमें सदा यह ध्यान रखना चाहिए की अमेरिकी हितों के समक्ष हम भी अपने हितों का बलिदान न करें. अपने फैसले अपने हितों को ध्यान में रखते हुए ही लें न की अमेरिकी हस्तक्षेप और मार्गदर्शन से. यही भारत की दीर्घकालिक कूटनीति होनी चाहिए, जिसमे हमारी कूटनीतिक विजय का लक्ष्य छुपा हुआ है.

Tuesday, February 8, 2011

राश्ट्रवाद पर भारी सांप्रदायिक राजनीति


‘‘भारतभूमि विभिन्न धर्मों के लोगों को सहोदर के रूप में मानती है और उसी रूप में उनका लालन-पालन करती है‘‘
  आचार्य चाणक्य का यह वाक्य नैतिकता और विष्वबंधुत्वता की दृश्टि से बिल्कुल सत्य है। परंतु राजसत्ता को बचाने की चुनौती और उसके फलस्वरूप की जाने वाली सांप्रदायिक राजनीति विभिन्न मतों एवं धर्मों के बीच भेद का और राश्ट्र के विखण्डन का कारण बनती है। सांप्रदायिकता की इस राजनीति का इतिहास पुराना है, जिस पर दृश्टि डालना हमारे लिए आवष्यक है।
सांप्रदायिक राजनीति का प्रारंभ-
दो ध्रुवों को साधने की कला को ही सांप्रदायिक राजनीति भी कहा जा सकता है। चाणक्य के समय में जब भारत में नंद वंष का षासन चल रहा था, तभी से इस प्रकार की राजनीति का प्रारंभ माना जाता है। नंद वंष के षासक घनानंद ने जब अपनी सत्ता को खतरे में देखा तो उन्होंने उस समय में नवीन दर्षन और मान्यताओं वाले महावीर और तथागत के संप्रदायों का तुश्टिकरण प्रारंभ कर दिया। जिसके कारण व्यक्ति-व्यक्ति में भेद उत्पन्न हो गया और वैदिक संस्कृति को मानने वाले तथा राजसत्ता के संरक्षण में रहने वाले महावीर और तथागत के संप्रदाय आमने-सामने आ गए। यही वह समय था जब भारत में धार्मिक एवं सांप्रदायिक सौहार्द में कमी आनी प्रारंभ हो गई। जो आज तक अनवरत जारी है।
सर्वधर्म समभाव की परंपरा पर आघात
जिस भारत में ‘‘सर्वधर्म समभाव‘‘ और ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम‘‘ की भावना प्राचीन समय से ही विद्यमान थी। उसी राश्ट्र में चाणक्य के समय से इस विचार का संस्कृति का लोप होना षुरू हो गया। या कहें की भारतीय संस्कृति पर हमले इतने हुए की, यह आदर्ष विचार उसी में धूमिल हो गया। भारत की सर्वधर्म परंपरा पर सबसे बड़ा आघात इस भूमि पर हुए बाहरी आक्रमण और उनका षासन रहा। मुगल षासन में सत्ता के कारण समाज प्रभावित हुआ। मुगल काल में कुछ आततायी षासकों ने हिंदू मंदिरों को तोड़ा और गोहत्या को भी मौन स्वीकृति दी। जिससे समाज बुरी तरह प्रभावित हुआ और समाज में षासन का दखल बहुत बढ़ गया। मुगलों के द्वारा ही तोड़ा गया राममंदिर का विवाद आज भी कायम है। जो समय-समय पर संघर्श का कारण बनता रहता है। मुगलों के काल से चली आ रही इस राजनीति का और भी वीभत्स रूप ब्रिटिष काल में समाज के सामने आता है।
अंग्रेजों का मुस्लिमों को संरक्षण
ईस्ट इंडिया कंपनी के रूप में व्यापार के लिए आए अंग्रेजों ने षासन को प्रभावित करना आरंभ किया। कुछ समय बाद ही उन्होंने षासन पर कब्जा भी जमा लिया। अंग्रेजों को भी अपनी सत्ता बचाने के लिए यह आवष्यक था की भारतीय एक न होने पाएं। इसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने मुस्लिमों को वरीयता देते हुए सत्ता को बचाए रखने का प्रयास किया। अंग्रेजों की इस नीति को खाद-पानी द्विराश्ट्रवाद के जनक सर सैयद अहमद खां ने दिया। उन्होंने कहा की -
  ‘‘बेषक हिंदू और मुस्लिम एक ही षहर में रहते हैं और एक ही हवा और पानी का उपभोग करते हैं परंतु यह दोनों ही आपस में साथ रहते हुए भी अपने आप में अलग-अलग राश्ट्र के समान हैं।‘‘
उन्होंने ही समाज में विभाजन को बढ़ावा देने की अंग्रेजी साजिष का प्रतिपादन किया जिसका उदाहरण उनका यह कथन है-
 ‘‘ईसाई और मुस्लिम दोनों ही किताबी मजहब हैं लेकिन हिंदू बुत परस्त मजहब है, इसलिए ईसाई और मुस्लिम तो एक हो सकते हैं लेकिन हिंदू और मुस्लिम कभी एक नहीं हो सकते हैं।‘‘
इससे भी आगे बढ़कर उन्होंने तो अंग्रेजों को खिलाफतुल्लाह घोशित कर दिया। जिसका अर्थ होता है धरती पर अल्लाह का प्रतिनिधि। सर सैयद के इन कुत्सित प्रयासों का ईनाम ब्रिटिष सरकार ने उन्हें ‘‘सितारे-हिंद की उपाधि देकर दिया।
सर सैयद की प्रेरणा का ही यह परिणाम था कि षुरू में राश्ट्रवादी मुसलमान कहलाने में गर्व करने वाले जिन्ना ने राश्ट्र के विखण्डन का स्वप्न देखना प्रारंभ कर दिया। इसी विचारधारा से प्रेरित होकर  राम को ‘‘इमामे हिंद‘‘ की उपाधि देने वाले भारत भक्त इकबाल मोहम्मद ने पाकिस्तान की अवधारणा प्रस्तुत की। जिन्ना और इकबाल के इन कटटर विचारों का कारण भी केवल राजसत्ता प्राप्ति की महत्वकांक्षा ही थी। इसी पाकिस्तानी विचार के कारण ही डायरेक्ट एक्षन में हुई हिंसा में लाखों हिंदू और मुस्लिमों की हत्याएं हुई। जिसके फलस्वरूप भारत भूमि के आजाद होने से पहले ही उसके विभाजन की पटकथा लिख दी गई। परंतु इस राजनीति का अंत फिर भी नहीं हुआ और इसके खतरे आज भी हमारे समक्ष मौजूद हैं।
स्वतंत्रता के पष्चात तुश्टिकरण की राजनीति
भारत भूमि विभाजित रूप में स्वतंत्र हो गई, लेकिन विभाजन के लिए जिम्मेदार सांप्रदायिक तत्व नहीं समाप्त हुए। इसी का परिणाम था कि लाखों हत्याएं और देष का विभाजन होने के बाद भी कष्मीर की नई समस्या विकसित कर दी गई। कष्मीर मामले का अंतर्राश्ट्रीयकरण कर दिया गया। इससे समस्या का समाधान तो नहीं हुआ, लेकिन भारत को और टुकड़ों में विभाजित करने की रणनीति अवष्य बनने लगी। केवल इस तुश्टिकरण की राजनीति का ही परिणाम था की 555 रियासतों का पटेल ने आसानी से विलय भारतीय संघ में करवा लिया। लेकिन पंडित नेहरू की कुटिल नीतियों के कारण कष्मीर की समस्या विकसित हो गई। इसके बाद भी यह सिलसिला समाप्त नहीं होता है, और षाहबानो प्रकरण के रूप में हमारे सामने आता है। अर्थात जब-जब राजसत्ता पर खतरा महसूस हुआ है, ऐसी राजनीति का पासा फेंका गया है चाहे वह राजतंत्र का दौर रहा हो या फिर लोकतंत्र का। भारत के संविधान में धार्मिक आरक्षण का प्रावधान न होते हुए भी विभिन्न राज्यों में आरक्षण दिया गया। जैसे- केरल, आंध्र प्रदेष, कर्नाटक, एवं पष्चिम बंगाल में 10 प्रतिषत आरक्षण का ऐलान। यह आरक्षण केवल तब दिया गया जब कुर्सी को हिलता हुआ देखा गया, इसलिए समाज में एक वर्ग को विषेश संरक्षण देने की रणनीति पर काम किया गया। लेकिन कष्मीर से पलायन करने को मजबूर हुए कष्मीरी पंडितों का ध्यान नहीं किया गया क्योंकि वे वोटों के समीकरण पर खरा नहीं उतर पाते। आजादी के पष्चात इस प्रकार की राजनीति का सबसे वीभत्स रूप सन 1984 में देखने को मिला। जब राजधानी की सड़कों पर 5,000 सिखों का कत्ल कर दिया गया। इसके भी आगे जाते हुए वर्तमान यूपीए सरकार ने कष्मीर के आतंकी को पदम श्री से पुरस्कृत किया। देष के प्रधानमंत्री ने लालकिले की प्राचीर से देष के संसाधनों पर अल्पसंख्यकों का पहला हक बताया। वहीं आतंकियों से जूझते हुए षहीद होने वाले मोहन चंद षर्मा की षहादत पर सवाल उठाया गया। उनके परिवार वालों से मिलने तो कोई नहीं गया लेकिन उन आतंकियों के यहां सभा अवष्य आयोजित की गई। जब इतने से भी मंसूबे पूरे नहीं हुए तो राममंदिर के अदालती फैसले पर प्रष्न चिन्ह लगाने का प्रयास किया गया। हिंदू आतंकवाद रूपी हौव्वा खड़ा किया गया और अल्पसंख्यक वोटों को लामबंद करने का प्रयास किया गया।
वास्तविक धर्मनिरपेक्ष लोग आगे आएं
यदि हमें इस विखण्डनकारी राजनीति में बदलाव लाना है तो वास्तविक धर्मनिरपेक्ष लोगों को आगे आना होगा। तभी धर्मनिरपेक्षता का लबादा ओढ़े सांप्रदायिक तत्वों से देष का विखण्डन होने से रोका जा सकेगा। तभी महान संत स्वामी दादूदयाल की यह पंक्तियां चरितार्थ हो पाएंगी-ः
        दोनों भाई हाथ-पग, दोनों भाई कान।
        दोनों भाई नैन हैं, हिन्दू मुसलमान।।
वास्तव में भारत में यदि सर्वधर्म समभाव की भावना को कायम रखना है तो हमें इन तत्वों से सावधान रहना होगा। तभी भारत मां के आंचल में एक ही षरीर के विभिन्न अंगों की तरह एक साथ रह पाएंगे। अन्यथा वह देव भूमि जिसके लिए कहा गया है कि-
     उत्तरं यत् समुद्रस्य, हिमाद्रेष्चैव दक्षिणम।
     वर्श तद भारतं, नाम भारती यत्र संतति।।
सुरक्षित नहीं रह पाएगी, और न ही उसमें रहने वाली संतति ही सुरक्षित रह पाएगी। यदि हम वास्तव में देषभक्त हैं, भारतभक्त हैं तो हमें इन सांप्रदायिक खतरों से सावधान रहना होगा। साथ ही यह ध्यान भी रखना होगा कि कहीं हम इनके बहकावे में न आ जाएं। हमें ऐसे ही संयम एवं सद्भावना का परिचय देना होगा, जैसे राममंदिर फैसले के वक्त दिया था। यही इन सांप्रदायिक तत्वों से देष के बचाव का सबसे अच्छा तरीका होगा।  

yuva bharat aage kaise badhe

युवा भारत आगे कैसे बढे |
भारत एक युवा राष्ट्र है. यहाँ की ७० प्रतिशत आबादी युवा है . इतनी भारी-भरकम युवा आबादी के देश भारत में सबसे अधिक उत्पादक क्षमता मौजूद है . हमारे पास उत्पादन की क्षमता तो मौजूद है पर उसके लिए पर्याप्त अवसर नहीं हैं . जहाँ अवसर हैं भी सीमित हैं और कई जगह हमारे युवाओं में वह कुशलता नहीं है की अपनी जगह वह बना सकें . जहाँ ४१७ सफाई कर्मचारियों की आवश्यकता है, वहां ४२००० लोग आवेदन करतें हैं. जिनमें से कई तो परास्नातक डिग्री धारक हैं. जिस जगह ४०० जवानों की भर्ती है, वहां ३ लाख युवाओं का हुजूम उमड़ता है. उनको अपेक्षित रोजगार तो नहीं मिलता है, लेकिन कइओं को मौत की सौगात अवश्य मिल जाती है. जिस देश में रोजगार की स्थिति यह है, वहां के नीति-निर्माता घोटालों का ठेका लेने लगे हैं. अब इन घोटालों के ठेकेदारों और सरदारों के इस देश में युवाओं को दिशा क्या और कैसे मिले. क्या युवा भी भ्रष्ट और आचारहीन लोगों को अपना आदर्श मानकर आगे बढें. यदि ऐसी स्थिति हो गई तो, हमारे देश की स्थिति क्या होगी हम सोच भी नहीं सकते हैं. यदि हम अपने ढांचें में आमूल-चूल परिवर्तन करें. युवाओं को कुशल श्रमिक एवं अधिकारी बनाने के लिए बजट बढाएं और उन्हें उचित प्रशिक्षण दें. तभी यह संभव है की उन्हें उनका अपेक्षित रोजगार मिल सके. उनको प्रशिक्षित करना जितना आवश्यक है, उससे कहीं अधिक आवश्यक है रोजगार के अवसरों का सृजन करना. तब हम उनको सही अवसर दे पाएंगे और उनकी क्षमताओं होकर देश को नै गति मिल पायेगी. यहाँ युवाओं का कोई लक्ष्य नहीं है, लक्ष्य तो अवसर नहीं है, तो वे अपना योगदान कैसे दे पाएंगे. यदि इसी तरह चलता रहा तो हमारा यह युवा भारत एक दिन बुजुर्ग भारत हो जायेगा. और समय हमारे हाथ से मुट्ठी की तरह फिसल जायेगा. जब युवाओं को हम एक लक्ष्य देंगें तो देश की समस्त समस्याएं अपने आप समाप्त हो जायेंगी. इस युवा भारत का भविष्य युवाओं के ही हाथों में है और वे देश की दशा और दिशा को तय करेंगे. इसलिए यह आवश्यक है की हम उन्हें मनरेगा जैसी योजनायें नहीं बल्कि उचित अवसर देकर मुख्यधारा में लाने का प्रयास करें. जिससे वे स्वयं को और देश के विकास को गति दे सकें. यही भारत की असली तस्वीर और बढती विकास दर का आईना होगा. 

Monday, February 7, 2011

ram janm bhumi andolan


  श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन
अयोध्या का ऐतिहासिक महत्व-
    भगवान राम का समय 17,50,000 वर्श पूर्व का माना जाता है। पुरातत्व विभाग द्वारा की गई खुदाई से भी यह पूर्णतया सिद्ध हो चुका है। भगवान राम को मनु का वंषज माना जाता है, मनु के बाद महाराजा रघु हुए जिनके नाम से ही आगे चलकर इस वंष का नाम रघुवंष पड़ा था। जिसके बाद इसी वंष में राजा इक्ष्वाकु हुए, जिसके बाद महाराजा दषरथ हुए जिनके पु़त्र भगवान श्रीराम हुए। अयोध्या की ऐतिहासिकता और बाबरी ढांचे के नीचे बने श्रीराम मंदिर की प्रमाणिकता को कार्बन डेटिंग के माध्यम से स्पश्ट किया जा चुका है।
राममंदिर पर इस्लाम का बर्बर आक्रमण-
   सन 1526 ई में इस्लामी आक्रांता बाबर 5,000 सैनिकों को लेकर भारत की पुण्यभूमि पर आक्रमणकारी के रूप में आया था। सर्वप्रथम बाबर ने दिल्ली और आगरा को लूटा था। सन 1528 ई में बाबर की सेना अयोध्या पहुंच चुकी थी। बाबर के सेनापति मीरबाकी ने मूषाआसिकान नामक फकीर की सलाह से राम जन्मभूमि मंदिर पर आक्रमण कर ध्वस्त कर दिया था। मंदिर को ध्वस्त करने के बाद सेनापति मीर बाकी ने मंदिर के ही अवषेशों से बाबरी ढांचे का निर्माण कर दिया था। मीरबाकी द्वारा मंदिर ध्वस्त किए जाने का अयोध्या वासियों ने प्रबल विरोध किया था, जिसमें 1,60,000 लोग मारे गए थे। जिसके बाद ही बाबर के सेनापति को मंदिर ध्वस्त करने में सफलता मिल पाई थी। मंदिर गिराने की घटना के बाद भी मंदिर-मस्जिद ढांचे का संघर्श 1528 से लेकर 1856 ई तक अनवरत जारी रहा। 328 वर्शों के इस कालखण्ड के दौरान मंदिर और बाबरी ढांचे को लेकर 73 बार संघर्श हुआ। अंततः हिंदुओं को उस स्थान पर मंदिर को पुनः स्थापित करने में सफलता मिल गई थी। सन 1856 में फैजाबाद का नवाब वाजिद अली षाह था, जिसके पास मुस्लिम समुदाय मस्जिद के निर्माण के लिए पहुंचा था। नवाब ने इस मसले पर ध्यान न देते हुए कहा की-
       हम हुस्न के बंदे हैं, मजहब से नहीं वाकीफ़,
       काबा हुआ तो क्या, बुतखाना हुआ तो क्या।।
जिसके बाद सन 1857 में मौलवी मीर अली और हनुमान गढ़ी के संत आपस में मिले। इस दौरान अयोध्या के मुस्लिम और मौलवी मीर अली राममंदिर की इस भूमि को अयोध्या के हिंदुओं को देने को राजी हो गए थे। लेकिन तत्कालीन ब्रिटिष षासन को यह बर्दाष्त नहीं हुआ।
अंग्रजों की फूट डालो और राज करो की राजनीति
  राममंदिर और मस्जिद विवाद में हिंदू-मुस्लिम समुदाय में बनी आपसी सहमति अंग्रेजों को रास नहीं आई। तत्कालीन ब्रिटिष अधिकारी कनिंगम को जैसे ही यह खबर लगी की इस विवादित मसले में दोनों समुदायों के बीच आपसी सहमति बन गई है तो वह बहुत ही आष्चर्यचकित हुआ। अंग्रेजों ने अयोध्या को जीतने के पष्चात हनुमान गढ़ी के महंत और मौलवी मीर अली दोनों को ही फंासी पर लटका दिया। जिसके बाद इस विवाद ने सन 1880 में एक बार फिर संघर्श का रूप ले लिया। इस संघर्श को देखते हुए तत्कालीन ब्रिटिष अदालत ने इस विशय के अध्ययन के लिए एक समिति का गठन किया। इस समिति की रिपोर्ट के आधार पर ही कोर्ट ने यह माना की विवादित भूमि पर ही श्रीराम का मंदिर था। लेकिन कोर्ट ने कहा चूंकी यह विवाद पुराना हो चुका है इसलिए अब मस्जिद को गिराकर मंदिर नहीं बनाया जा सकता है।
गुंबद के नीचे भगवान राम की मूर्तियां
23 दिसंबर सन 1949 की रात को मस्जिद के बीच वाले गुंबद के नीचे किसी रामभक्त ने भगवान राम की मूर्तियों को स्थापित कर दिया था। मूर्तियों को स्थापित करने के बाद से ही हिंदुओं ने उस स्थान पर कीर्तन करना प्रारंभ कर दिया जो लगातार चलता है और आज भी जारी है। इस घटना की रिपोर्ट होने के पष्चात तत्कालीन जिलाधिकारी ने ताला लगवा दिया और किसी के भी प्रवेष करने पर रोक लगा दी गई। सन 1950 गोंडा निवासी हिंदू महासभा के तत्कालीन अध्यक्ष गोपाल सिंह विषारद ने फैजाबाद न्यायालय में याचिका दायर की। इस याचिका में उन्होंने कोर्ट से श्रीराम की पूजा करने की अनुमति मांगी। इसके कुछ ही समय बाद स्वामी रामचंद्र परमहंस नामक व्यक्ति ने भी अदालत में एक याचिका दायर की। कोर्ट ने इन याचिकाओं पर सुनवाई करने के बाद एक अधिकारी को उस विवादित परिसर में षांति व्यवस्था पर निगरानी रखने का आदेष दिया और उस अधिकारी की निगरानी में ही पूजा करने की इजाजत दी। सन 1961 में निर्मोही अखाड़े ने भी अदालत में याचिका दायर कर विवादित भूमि पर अपना हक जताया। इसके बाद सुन्नी वक्फ़ बोर्ड ने भी कोर्ट में याचिका दायर की और वक्फ़ बोर्ड ने इस भूमि को मस्जिद की भूमि बताया और बगल में स्थित भूमि को भी कब्रिस्तान की भूमि बताते हुए उस पर अपना हक जताया।
राम-जन्मभूमि आंदोलन-ः
भगवान राम की इस भूमि को मुक्त कराने के लिए अनेकों आंदोलन हुए, विभिन्न संघर्श हुए लेकिन हिंदुओं की यह आस्था की भूमि, पुण्यभूमि मुक्त न हो सकी। अंततः हिन्दू राश्ट्र के आराध्य देव भगवान श्रीराम के भक्तों को रामजन्मभूमि की मुक्ति के लिए आंदोलन चलाना ही पड़ा। सन 1983 में हिन्दू जागरण मंच के तत्कालीन सचिव विजय कौषल जी महाराज ने उत्तर प्रदेष के मुजफ्फरनगर में हिन्दू सम्मेलन का आयोजन किया। इस सम्मेलन में वरिश्ठ कांग्रेसी नेता दादू दयाल खन्ना भी उपस्थित थे। उस सम्मेलन में ही दादू दयाल खन्ना ने आम समाज और तत्कालीन नेताओं से इस आंदोलन में हिस्सा लेने की अपील की थी। इस सम्मेलन के बाद ही विभिन्न राजनीतिक पार्टियों और विष्व हिन्दू परिशद का भी ध्यान इस ओर आकृश्ट हुआ। इस के बाद दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित हुई पहली ही धर्मसंसद में श्रीरामजन्म भूमि मुक्ति समिति का गठन हुआ। अक्टूबर 1984 में इस समिति ने अयोध्या से लेकर दिल्ली तक के लिए रथयात्रा निकाली। जिसमें रामजानकी की ताले में बंद मूर्तियां प्रतीक स्वरूप रखीं गई थी। 31 अक्टूबर 1984 को यह रथयात्रा गाजियाबाद पहुंच चुकी थी, और इसके बाद 1 नवंबर को इस रथयात्रा को दिल्ली पहुंचना था। लेकिन 31 अक्टूबर को ही भारतीय राजनीति में भूचाल लाने वाली घटना घट गई। भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके ही सुरक्षा कर्मियों ने हत्या कर दी। जिसके बाद रथयात्रा को अनिष्चित समय तक के लिए रदद कर दिया गया। यह विशय एक बार फिर से आलोक में आया जब सन 1986 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने राम जन्मभूमि मंदिर परिसर का ताला खुलवाया। सन 1989 में इस मामले में विष्व हिन्दू परिशद ने ऐतिहासिक कदम उठाते हुए विवादित भूमि के बगल में ही 67 एकड़ भूमि को खरीद लिया। इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह है की विष्व हिन्दू परिशद ने इस भूमि का षिलान्यास दलित व्यक्ति रामेष्वर चौपाल के द्वारा करवाया था। हिन्दू समाज में समरसता और बंधुत्वता लाने की दृश्टि से विष्व हिन्दू परिशद द्वारा दलित व्यक्ति से षिलान्यास करवाना उल्लेखनीय कार्य था। 30 अक्टूबर 1990 को विहिप ने कारसेवा करने की योजना बनाई लेकिन राज्य के मुख्यमंत्री ने इस कारसेवा पर सवाल उठाया। षासन के अवरोधों के बावजूद राम भक्तों ने अपने निर्णय को नहीं टाला और 30 अक्टूबर को 50,000 कारसेवक अयोध्या पहुंच चुके थे। कारसेवा के दौरान ही प्रदेष षासन के कारण पुलिस ने रामभक्त कारसेवकों पर फायरिंग कर दी, जिसमें दो रामभक्त बंधु षरद कोठारी और राम कोठारी षहीद हो गए। विष्व हिन्दू परिशद ने कारसेवा के दौरान षहीद हुए 80 रामभक्तों की अस्थियों के कलषों को लेकर पूरे भारत में यात्रा की और जनता तक इस विशय को ले जाने का प्रयास किया। राम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन की इसी कड़ी में विभिन्न हिन्दुवादी संगठनों ने दिल्ली में रैली का आयोजन किया जो दिल्ली के इतिहास की सबसे बड़ी रैली थी। सन 1990 में ही मुस्लिमों ने भी बाबरी मस्जिद एक्षन कमेटी का गठन किया और इस कमेटी को मुस्लिमों का पक्ष रखने के लिए अधिकृत किया गया। इसी दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रषेखर ने भी इस विवाद का हल निकालने की कोषिष की, लेकिन वे किसी समाधान तक पहुंचने में असफल रहे। राम जन्म भूमि विवाद को लेकर कोर्ट के बार-बार फैसले टालने से लोगों की उत्तेजना बढ़ती जा रही थी जो किसी भी क्षण विध्वंस का रूप ले सकती थी।
6 दिसंबर 1992- बाबरी ढांचा विध्वंस
   राम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन में 6 दिसंबर सन 1992 का दिन अविस्मरणीय दिन था। भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में सोमनाथ से लेकर अयोध्या तक की यात्रा के अयोध्या पहुंचने के बाद 6 दिसंबर को रामभक्तों का कारसेवा का कार्यक्रम था। लेकिन केन्द्र सरकार ने कारसेवा के दौरान हिंसा और बाबरी ढांचे को खतरा होने की आष्ंाका जतायी। केन्द्र ने प्रदेष सरकार से किसी भी प्रकार की हिंसा न होने देने के लिए सुप्रीम कोर्ट में षपथ पत्र दाखिल करने को कहा। प्रदेष सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में षपथ पत्र दाखिल किया और कानून-व्यवस्था बनाए रखने पर प्रतिबद्धता जताई। 6 दिसंबर को एक घंटे के कारसेवा के कार्यक्रम के बाद रामभक्तों का एक जत्था विवादित ढांचे की ओर बढ़ने लगा, नेताओं द्वारा मना करने के बाद भी उत्साहित रामभक्त नहीं रूके। रामभक्तों ने विवादित बाबरी ढांचे को ढहाना षुरू कर दिया, 1130 बजे से 530 बजे तक ढांचे को ढहाकर मंदिर का निर्माण कार्य प्रारंभ कर दिया। लेकिन तब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई, यहां तक की सुरक्षा बल भी दो दिन बाद यानि 8 दिसंबर को विवादित स्थल पर पहुंचे। लेकिन तब तक वहां पर उनके करने के लिए कुछ रह नहीं गया था। इस घटना के बाद केन्द्र सरकार ने विहिप द्वारा विवादित स्थल के नजदीक ही खरीदी गई भूमि को अपने कब्जे में ले लिया। बाबरी मस्जिद एक्षन कमेटी ने संयुक्त राश्ट्र संघ से हस्तक्षेप की मांग की।
पुरातत्व विभाग को मिले साक्ष्य
  सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व विभाग को यह आदेष दिया की विवादित स्थान की खुदाई करे जिससे की मंदिर होने की मान्यता की प्रमाणिकता का पता चल सके। पुरातत्व विभाग द्वारा की गई खुदाई से यह प्रमाणित हुआ की विवादित स्थल ही भगवान राम का जन्म स्थान है और यहीं भगवान राम का भव्य मंदिर भी था। इस खुदाई के दौरान मिले एक षिलालेख में यह लिखित प्रमाण मिला की इस मंदिर को किसने और कब बनवाया था। इसी खुदाई के दौरान 67 अन्य साक्ष्य भी मिले जिनसे वहां मंदिर होने की पुश्टि होती है। कार्बन डेटिंग के माध्यम से भी उस स्थान पर राम मंदिर होने के दावे को प्रमाणिक आधार प्राप्त हुआ है।
30 सितंबर 2010- इलाहाबाद हाईकोर्ट का निर्णय
  राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद पर लंबे इंतजार के बाद हाईकोर्ट का निर्णय आया जिससे इस विवाद के समाधान की उम्मीद जगने लगी थी। 30 सितंबर 2010 सायं 330 बजे इलाहाबाद हाईकोर्ट का निर्णय आया, जिसमें कोर्ट ने हिंदुओं की उस स्थान पर मंदिर होने की मान्यता को प्रमाणित किया। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रामलला विराजमान के स्थान को हिंदुओं को सौंपने की बात कही, और विवादित भूमि को तीन हिस्सों में विभाजित करते हुए, दो हिस्सा हिंदुओं को और एक हिस्सा मुस्लिमों को सौंपने का निर्णय सुनाया। हाईकोर्ट के इस निर्णय में महत्वपूर्ण बात यह रही की कोर्ट ने पूर्व में वहां मंदिर होने के दावे को सही ठहराया। लेकिन  कोर्ट का यह निर्णय उन लोगों को रास नहीं आया जो वोटों की राजनीति करना चाहते थे। उन्होंने विभिन्न कुतर्कों का सहारा लेकर इस फैसले को ही गलत ठहराना षुरू कर दिया और समाज में वैमनस्यता फैलाने का प्रयास किया। कोर्ट के निर्णय के बाद महंत ज्ञानदास और हाषिम अंसारी ने समझौते के माध्यम से कोई सर्व मान्य हल निकालने का प्रयास आरंभ किया। लेकिन कटटरपंथी मुस्लिमों के दबाव में हाषिम अंसारी को पीछे हटना पड़ा और यह मुकदमा एक बार फिर अधर में लटक गया। सुन्नी वक्फ बोर्ड ने कोर्ट के इस निर्णय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी, फिर अन्य प्रतिवादियों को भी कोर्ट तक पहुंचना ही था। लेकिन इस मुकदमे बाजी ने देष में सांप्रदायिक सौहार्द की ओर बढ़ते हुए कदमों को ठिठकने पर मजबूर कर दिया। अब इसके बाद देखना यह है की मुकदमे बाजी की इस लंबी यात्रा का अंत कब होता है।