Monday, July 25, 2011

सत्ता नहीं ,पाठक करें मीडिया की समीक्षा : महात्मा गांधी



पत्रकारों की वर्तमान पीढ़ी को ऐसा लगता है जैसे पत्रकारिता जगत वर्तमान समय में संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है पत्रकारिता के बारे में उस समय भी कुछ बातों पर पत्रकार चिंतित थे जिस समय को भारतीय पत्रकारिता का उत्कृष्ट समय कहा जाता है। भारतीय पत्रकारिता का आरंभिक दौर राष्ट्रवाद के जनजागरण को समर्पित था। यह समय भारत के स्वाधीनता आन्दोलन का समय था। भारत की स्वाधीनता को प्राप्त करने की दिशा में तत्कालीन पत्रकारिता और पत्रकारों की महती भूमिका रही थी। उस समय में पत्रकारों का एक ऐसा वर्ग तैयार हुआ जिनके लिए राष्ट्र की स्वाधीनता ही परम ध्येय था। लेकिन उस समय में भी पत्रकारिता में विज्ञापन, पत्रकार का कर्तव्य और पत्रकारिता पर सरकारी नियंत्रण आदि ऐसी समस्याएँ थीं। जिनके बारे में महात्मा गाँधी जैसे अग्रणी नेता और पत्रकार ने भी बहुत कुछ लिखा था। महात्मा गाँधी ने तत्कालीन समाचार पत्रों में विज्ञापन के बढ़ते दुष्प्रभाव पर लिखा था-

"मैं समझता हूँ कि समाचारपत्रों में विज्ञापन का प्रकाशन बंद कर देना चाहिए। मेरा विश्वास है कि विज्ञापन उपयोगी अवश्य है लेकिन विज्ञापन के माध्यम से कोई उद्देश्य सफल नहीं हो सकता है। विज्ञापनों का प्रकाशन करवाने वाले वे लोग हैं जिन्हें अमीर बनने की तीव्र इच्छा है। विज्ञापन की दौड़ में हर तरह के विज्ञापन प्रकाशित होने लगे हैं, जिनसे आय भी प्राप्त होती है। आधुनिक नागरिकता का यह सबसे नकारात्मक पहलू है जिससे हमें छुटकारा पाना ही होगा। हमें गैर आर्थिक विज्ञापनों को प्रकाशित करना होगा जिससे सामाजिक उद्देश्यों की पूर्ति हो सके। लेकिन इन विज्ञापनों को भी कुछ राशि लेकर प्रकाशित करना चाहिए। इसके अलावा अन्य विज्ञापनों का प्रकाशन तत्काल बंद कर देना चाहिए"।
(इंडियन ओपिनियन, ४ सितम्बर, १९१२)

महात्मा गाँधी ने पत्रकारिता के सिद्धांत और पत्रकार के कर्तव्यों के बारे में भी लिखा था। महात्मा गाँधी ने पत्रकारिता और पत्रकार के कर्तव्यों के बारे में सविस्तार उल्लेख करते हुए लिखा था कि -
"मैं महसूस करता हूँ कि पत्रकारिता का केवल एक ही ध्येय होता है और वह है सेवा। समाचार पत्र की पत्रकारिता बहुत क्षमतावान है, लेकिन यह उस पानी के समान है जो बाँध के टूटने पर समस्त देश को अपनी चपेट में ले लेता है और समस्त फसल को नष्ट कर देता है"। (सत्य के साथ प्रयोग अथवा आत्मकथा)

समाचारपत्र लोकतंत्र के स्थायीकरण में किस प्रकार से सहायक हो सकते हैं इसकी व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा -
वास्तव में आदर्श लोकतंत्र की आवश्यकता क्या है ? तथ्यों की जानकारी या सही शिक्षा ? निश्चित तौर पर सही शिक्षा। पत्रकारिता का कार्य लोगों को शिक्षित करना है न कि आवश्यक-अनावश्यक तथ्यों अवं समाचारों से उनके विवेक को सीमित कर देना। एक पत्रकार को हमेशा इस बारे में स्वतंत्र रहना चाहिए कि उसे कब और कौन सी रिपोर्ट करनी है। इसी प्रकार से एक पत्रकार को केवल तथ्य जुटाने तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए। बल्कि आगे होने वाली घटनाओं का पूर्वानुमान होना भी पत्रकार के लिए आवश्यक है।
(महात्मा गाँधी- तेंदुलकर: महात्मा १९५३,पेज २४७)

महात्मा गाँधी ने समाचार में प्रकाशित समस्त जानकारियों को पूर्णतः सच मानने से भी इनकार किया है। वे समाचार पत्रों के माध्यम से राय बनाने के भी सख्त विरोधी थे। उन्होंने कहा "समाचारपत्रों को केवल तथ्यों की जानकारी के लिए पढ़ा जाना चाहिए। लेकिन समाचारपत्रों को यह आज्ञा नहीं दी जा सकती है कि वे स्वतंत्र चिंतन को समाप्त कर दें"।

उन्होंने समाचारपत्रों को पूर्णतः विश्वसनीय न मानते हुए कहा- "पश्चिमी देशों की तरह पूरब में भी समाचार पत्र को गीता,बाईबल और कुरान की तरह से माना जा रहा है। ऐसा माना जा रहा जैसे समाचार पत्रों में ईश्वरीय सत्य ही लिखा हो। मैं समाचारपत्र के माध्यम से राय बनाने का विरोधी हूँ। समाचारपत्रों को केवल तथ्यों की जानकारी के लिए ही पढ़ा जाना चाहिए। लेकिन समाचारपत्रों को यह आज्ञा नहीं दी जा सकती है कि वे स्वतंत्र चिंतन को समाप्त कर दें। मैं पत्रकार मित्रों से केवल यही कहूँगा कि वे समाचारपत्रों में केवल सत्य ही प्रकाशित करें कुछ और नहीं"।

जनसंचार माध्यमों की स्वायत्ता और सरकारी नियंत्रण एक ऐसा मुद्दा है जो हमेशा ही जीवंत रहा है। यह उस समय में भी था, जब भारत में पत्रकारिता अपने शैशव काल में थी। महात्मा गाँधी ने ब्रिटिश लोगों पर समाचारपत्रों के व्यापक प्रभाव का अध्धयन किया। उन्होंने यह भी अनुभव किया कि ब्रिटिश सरकार किस प्रकार से समाचार पत्रों को अपने पक्ष में माहौल तैयार करने के लिए अपने प्रभाव में लेती थी। ब्रिटिश लोगों को ध्यान में रखते हुए महात्मा गाँधी ने भारतीय पत्रकारिता जगत को चेताया कि-

"ब्रिटिश जनता के लिए उनका समाचार पत्र ही उनका बाईबल होता है। वे अपनी धारणा समाचारपत्रों के माध्यम से ही बनाते हैं। एक ही तथ्य को विभिन्न समाचार पत्रों में विभिन्न तरीकों से दिया जाता है। समाचार पत्र उस पार्टी के मुताबिक लिखते हैं जिस पार्टी का वे समर्थन करते हैं। हमें ब्रिटिश पाठकों को आदर्श मानते हुए यह देखना चाहिए कि समाचारपत्रों के अनुसार ही इनकी विचारधारा में किस प्रकार से बदलाव आता है। ऐसे लोगों के विचारों में बहुत जल्दी-जल्दी परिवर्तन होते रहते हैं। ब्रिटेन में कहा जाता है कि प्रत्येक सात वर्ष के पश्चात पाठकों की राय में परिवर्तन होता रहता है। इस प्रकार से लोग उनके शिकंजे में आ जाते हैं जो एक अच्छे वक्ता अथवा नेतृत्वकर्ता होते हैं। इसको संसद भी कह सकते हैं। यह लोग अपनी सत्ता को जाते हुए नहीं देख सकते हैं। यदि कोई व्यक्ति उनके और सत्ता के बीच में आता है तो वे उसकी आँख भी निकाल सकते हैं। "

महात्मा गाँधी ने लोकतंत्र के स्थायित्व के लिए लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ पत्रकारिता को व्यापक अधिकार देने की भी पैरोकारी की। महात्मा गाँधी ने कहा-"प्रेस की आजादी ऐसा बहुमूल्य विशेषाधिकार है जिसे कोई भी राष्ट्र भूल नहीं सकता है।"

महात्मा गाँधी ने कहा कि "ऐसी परिस्थिति में जब संपादक ने समाचार पत्र में कुछ ऐसी सामग्री प्रकाशित कर दी हो उसे क्या करना चाहिए ? क्या उसे सरकार से माफ़ी मांगनी चाहिए? नहीं, बिलकुल नहीं। यह सत्य है कि संपादक ऐसी सामग्री प्रकाशित करने के लिए बाध्य नहीं है, लेकिन एक बार प्रकाशन के पश्चात वापस लेना भी उचित नहीं है।"

किसी भी समाचारपत्र की सफलता मुख्यत संपादक की कार्यशैली और योग्यता पर ही निर्भर करती है। महात्मा गाँधी ने संपादकों के कार्य के विषय में अपने विचार स्पष्ट करते हुए लिखा-
"पत्रकारिता को चौथा स्तम्भ माना जाता है। यह एक प्रकार की शक्ति है, लेकिन इसका गलत प्रयोग एक अपराध है। मैं एक पत्रकार के नाते अपने पत्रकार मित्रों से अपील करता हूँ कि वे अपनी जिम्मेदारी को महसूस करें और बिना किसी अन्य विचार के केवल सत्य को ही प्रस्तुत करें।"

"समाचारपत्रों में लोगों को शक्तिशाली तरीके से प्रभावित करने की क्षमता है। इसलिए संपादकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि कोई गलत रिपोर्ट न चली जाए जो लोगों को उत्तेजित करती हो।"
"संपादक और उसके सहायकों को इस बारे में हमेशा जागरूक रहना चाहिए, कि वे किस समाचार को किस तरह से प्रस्तुत करते हैं।"
"किसी स्वतंत्र राष्ट्र में सरकार के लिए प्रेस पर नियंत्रण रख पाना असंभव है। ऐसे में पाठकों का यह उत्तरदायित्व है कि वे प्रेस की समीक्षा करें और उन्हें सही रास्ता दिखाएँ। समाज का प्रबुद्ध वर्ग भड़काऊ समाचारपत्रों को नकार देगा।"

Monday, July 18, 2011

कफ़न को झंडा बनाते दिग्विजय सिंह

भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई आतंकी हमलों के मामले में कराची और काबुल की कतार में आ खड़ी हुई है. काबुल और कराची के बाद मुंबई का स्थान आता हैजहाँ आतंकी हमलों में पिछले वर्षों के दौरान सबसे ज्यादा मौतें हुई हैं. इसका कारण भारत की सुरक्षा एजेंसियों की नाकामी और केंद्र सरकार का ढुलमुल रवैया रहा है. देश की सुरक्षा एजेंसियां वर्ष भर हिन्दू आतंकवाद के शगूफे को येन-केन प्रकारेण सिद्ध करने में लगी रहीं. भारत की सत्ता  ने सुरक्षा एजेंसियों को हिन्दू आतंकवाद के शगूफे को साबित करने की जिम्मेदारी सौंपी थी. जिसके कारण जिहादी आतंकियों को एक बार फिर से मुंबई को दहलाने का अवसर हाथ लग लगा. हमने इस हमले से भी कोई सबक नहीं लियामुंबईवासियों की रोजी-रोटी कमाने की मजबूरी को हमने उनका जीवट बताना शुरू कर दिया है. समस्त विश्व यह जानता और मानता हैकि जिहादी आतंकवाद मानव सभ्यता के लिए खतरा है. जिहादी आतंक का खतरा विश्व के सबसे अशांत और आतंकी मुल्क के नजदीक भारत पर सबसे अधिक है. जिहादी आतंकी का हमला भी हमने ही सबसे अधिक झेला हैजिससे हमें स्वाभाविक ही अपनी आतंरिक सुरक्षा को मजबूत करने का सबक सीख लेना चाहिए था. दुर्भाग्य से भारत सरकार यह सबक नहीं सीख पाईइसका कारण वोट बैंक की कुटिल राजनीति है. 
दुनिया के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक मुल्क की सत्ता ने वोट बैंक की खातिर इन खतरों को नजर अंदाज कर दिया. इसके उलट दिग्विजय सिंह जैसे शिखंडियों के माध्यम से भारत की सत्ता ने देश के बहुसंख्यक सहिष्णु समाज के लोगों को ही आतंकी घोषित करना शुरू कर दिया. कांग्रेस के "युवराज" ने अमेरिकी राजदूत तक को यह बताया की भारत को हिन्दू आतंकवाद से खतरा है. कैसी विडम्बना है कि समस्त विश्व को जिहादी आतंकवाद से खतरा हैऔर भारत को हिन्दू आतंकवाद से खतरा है वास्तव में देश को ऐसी नस्ल के नेताओं से खतरा हैजो आतंकी हमलों में मारे गए लोगों के कफ़न को भी अपनी पार्टी का झंडा बनाकर ऊंचा उठाने का जघन्य प्रयास करते हैं. इन नेताओं कि श्रेणी में देश के कथित "युवराज" भी शामिल हैं. मुंबई में हुए बम धमाकों में मारे गए लोगों के प्रति इन नेताओं ने संवेदना तो नहीं प्रकट की बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इन हमलों में शामिल होने का बेसुरा राग और बजा दिया. गौरतलब है कि मुंबई हमलों के अपराधियों का सुराग पाने के लिए जांच एजेंसियां अभी सीसीटीवी कैमरे ही खंगाल रही हैंलेकिन कांग्रेस ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका तय कर दी है. यह लाशों पर राजनीति करने के अलावा और क्या है ? आतंकी हमले पर इस प्रकार की कुटिल और राष्ट्रद्रोही राजनीति यह दर्शाती है कि भारत की सत्ता अपने नागरिकों के प्रति कितना संवेदनशील है.
 जिस देश की सत्ता अपने नागरिकों के प्रति संवेदनशील नहीं हैउसे सत्ता में बने रहने का नैतिक अधिकार नहीं है. जो सरकार संसद पर हमला करने वाले और १८३ लोगों को मौत देने वाले को पोषण दे रही है. वह सत्ता देश की सुरक्षा किस प्रकार से सुनिश्चित कर सकती है. यदि देश की सुरक्षा सुनिश्चित करनी हैतो उसका केवल एक ही उपाय है जिहादी आतंकवाद को सबक सिखाया जाये. इसके लिए कफ़न को भी झंडा बनाने वाली संवेदनाहीन राजनीति की नहीं राष्ट्रनीति और समाजनीति की आवश्यकता है. जिस राष्ट्र की राजनीति राष्ट्रीय हितों की उपेक्षा करती हैवह राष्ट्र कैसे सुरक्षित रह सकता है ? इसलिए यह आवश्यक है की राजनेता अपने क्षुद्र स्वार्थों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित की राजनीति करें. इस राजनीति का पहला कर्तव्य यही होगा की देश के बहुसंख्यक समाज की भावनाओं का सम्मान किया जाये और और वोट बैंक की खातिर उसके हितों से खिलवाड़ न किया जाये. 

                                                          
 surya

Thursday, July 14, 2011

“न्यूज़ ऑफ़ द वर्ल्ड” के बंद होने का सबक



पत्रकारिता का कर्तव्य होता है राष्ट्रीय और सामजिक महत्व की सूचनाओं का संकलन कर लोगों तक पहुँचाना. पत्रकारिता का कार्य समाज और राष्ट्र को हानि पहुँचाने वाले तत्वों की स्पष्ट जानकारी देकर समाज को जागृत करना भी है. इसके लिए खोजी पत्रकारिता भी करनी पड़ती है, जिसमें पत्रकार को जासूस जैसा काम भी करना पड़ता है. खोजी पत्रकारिता ने विभिन्न देशों में महत्वपूर्ण मामलों का पर्दाफाश कर जनता को वास्तविक सच्चाई से रूबरू कराया है. खोजी पत्रकारिता, पत्रकारिता की ऐसी विधा है. जिसका उपयोग समाज हित के लिए किया ही जाना चाहिए. लेकिन खोजी पत्रकारिता उस समय अपने उद्देश्य से भटक जाती है, जब पत्रकार किसी व्यक्ति के निजी जीवन से भी एक्सक्लूसिव स्टोरी निकलने का प्रयास करने लगता है. इसका ही एक समसामयिक उदहारण है “न्यूज़ ऑफ़ द वर्ल्ड” साप्ताहिक पत्र का बंद होना.
“न्यूज़ ऑफ़ द वर्ल्ड” ब्रिटेन का १६८ वर्ष पुराना साप्ताहिक टैबलायड है. यह टैबलायड मीडिया के बड़े कारोबारी रूपर्ट मर्डोक का है. अकेले ब्रिटेन में ही उनके “द टाइम्स” और “द सन” जैसे चार प्रतिष्ठित अखबार हैं जबकि यूरोप, अमेरिका और एशिया में उनके कई टीवी चैनल और अखबार हैं. “न्यूज ऑफ द वर्ल्ड” की प्रसार संख्या २७ लाख है और इसका मुनाफा भी मोटा है. इस पत्र की पहचान ब्रिटिश लोगों के बीच अनूठी और सनसनी वाली ख़बरों को दिखाने की रही है. इस पत्र के पत्रकार सेलिब्रिटी एवं अन्य लोकप्रिय लोगों के निजी जीवन को भी एक्सक्लूसिव स्टोरी की तरह से दिखाते थे. इन पत्रकारों से तो सेलिब्रिटी बचने के लिए भागते थे. इसी तरह से भागने के चक्कर में ब्रिटेन की राजकुमारी डायना अपने प्रेमी डोडी-अल फयाद के साथ एक कार दुर्घटना में मारी गयी थी.
रूपर्ट मर्डोक के अख़बार ने सनसनीखेज ख़बरों को दिखाने के लिए ख़बरें नहीं अश्लील मनोरंजन परोसना शुरू कर दिया. मीडिया के बाजार में टैबलायड का धंधा एक्सक्लूसिव ख़बरों और अश्लील चित्रों के बल पर चलता है. बाजार में पकड़ बनाने के इस जूनून में रूपर्ट मर्डोक ने पत्रकारिता के नैतिक कर्तव्य और उद्देश्य को ही ताक पर रख दिया. अखबार की बढ़ती प्रसार संख्या ने मर्डोक को इस कदर उत्साहित कर दिया कि वे एक्सक्लूसिव ख़बरें देने के लिए लोगों के फ़ोन भी टेप करवाने लगे. रूपर्ट मर्डोक ने इस काम को करने के लिए पत्रकार ही नहीं जासूसों की भी सहायता ली.
मर्डोक ने निजी जासूसों के माध्यम से ४,००० से अधिक लोगों के फोन टेप करवाए और उन्हें दर्ज कर ख़बरों के रूप में बाजार में बेच दिया. “न्यूज़ ऑफ़ थे वर्ल्ड” लोगों के दुखों को एक्सक्लूसिव खबर के रूप में मीडिया बाजार में बेचता रहा. इन ख़बरों कि प्रमाणिकता सिद्ध करने के लिए अख़बार ने फोन टेपिंग और वायस मेल हैक करना शुरू कर दिया. इस समाचारपत्र ने सेलिब्रिटी से लेकर आम लोगों तक के फोन टेप करवाए. जिन लोगों के फोन टेप किये गए उनमें लन्दन आतंकी हमले के पीड़ितों से लेकर १३ वर्षीय बालिका मिली दादलर भी शामिल थी. इसमें गौरतलब यह है कि ख़बरों के इस अनैतिक बाजार में सरकार कि भूमिका भी सन्देहास्पद रही है.
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री के पूर्व मीडिया सलाहकार एंडी कालसन इस समाचार पत्र के संपादक रहे हैं. जिन्हें इस मामले के तूल पकड़ने के बाद पत्र से इस्तीफा देना पड़ा. फोन टेपिंग के इस मामले में प्रधानमंत्री की भूमिका भी सवालों से परे नहीं है. प्रधानमंत्री को इसी दबाव के कारण शुक्रवार को विस्तृत न्यायिक जांच कि घोषणा करनी पड़ी. डेविड कैमरन ने बयान जारी कर कहा कि ” जो कुछ भी हुआ उसकी जांच होगी, गवाहों को एक जज के साथ शपथ लेकर बयान देना होगा. कोई कसर बाकि नहीं रखी जाएगी”. इसके साथ ही ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने यह भी स्वीकार किया है कि मीडिया के लोगों कि ओर से होने वाली गलत हरकतों को नेताओं ने नजरंदाज किया है.
डेविड कैमरन की इस स्वीकारोक्ति में सच्चाई है. दरअसल रूपर्ट मर्डोक मीडिया के वैश्विक स्तर के व्यवसायी हैं, जिनसे नेता उलझना नहीं चाहते हैं. मर्डोक भी अपनी ख़बरों की दुकान चलाने के लिए नेताओं से सांठ-गाँठ कर लेते हैं. इस प्रकार के नापाक गठबंधन में सत्तापक्ष की बात को मीडिया अपने स्वर में कहता है. इसके बदले में नेता मीडिया हाउस के वैध-अवैध धंधों को संरक्षण देते हैं. राजनीति और मीडिया के गठजोड़ की यह संस्कृति ब्रिटेन और पश्चिमी देशों लम्बे समय से चली आ रही है. इसे ध्यान में रखते हुए भारतीय मीडिया के शुभचिंतकों को इस संस्कृति से बचाव का रास्ता तैयार कर लेना चाहिए.
भारत में भी हाल ही में राजनीति और मीडिया का गठजोड़ देखने को मिलता रहा है. चाहे वह बाबा रामदेव और समर्थकों पर हमला हो या “युवराज” के दौरों की रिपोर्टिंग. इन सभी में कहीं न कहीं मीडिया पर सरकारी प्रभाव देखने को मिलता है. “न्यूज़ ऑफ़ द वर्ल्ड” के मामले से भारतीय मीडिया कारोबारियों को भी यह समझ लेना चाहिए कि दर्शक वह नहीं देखना चाहते जो मीडिया उन्हें दिखा रहा है. बल्कि दर्शक  सच्चाई से रूबरू होना चाहते हैं. जिसका विकल्प सरकार प्रायोजित और मनोरंजन प्रधान समाचार माध्यम नहीं हो सकते हैं. यह एक सच्चाई है, जिससे भारत के मीडिया को सबक लेकर आगे बढ़ना चाहिए.

समाज कल्याण में लगे वक्फ बोर्ड की संपत्ति


केरल का प्रसिद्ध पद्मनाभ स्वामी मंदिर भारत के सबसे अमीर मंदिर होने का गौरव प्राप्त कर चुका है. मंदिर के तहखानों से अब तक मिले दुर्लभ मूर्तियों, जवाहरातों और सिक्कों आदि की कीमत १ लाख करोड़ रुपये आंकी गयी है.मंदिर में मिले इस अपार खजाने के संरक्षण और इसके सदुपयोग को लेकर भी बहस चल पड़ी है. कोई इस धन को समाज कल्याण में खर्च करने की बात कह रहा है, तो कोई इस धन को संग्रहालय में रखने की बात कर रहा है. यह सही है कि देश कि बहुत बड़ी आबादी आज भी भुखमरी और बेरोजगारी जैसी समस्याओं से त्रस्त है. यदि देश को आगे बढ़ना है, तो गरीब वर्गों का कल्याण भी आवश्यक है. लेकिन क्या केवल मंदिरों के खजाने से देश कि समस्याओं का हल हो जायेगा. वर्तमान समय में देश को मंदिर से प्राप्त खजाने कि अपेक्षा स्विस बैंकों में जमा काले धन की आवश्यकता है.
भारत भर में मंदिर ही नहीं वक्फ बोर्ड के पास भी अथाह संपत्ति है. विभिन्न राज्यों में करीब 4 लाख एकड़ जमीन वक्फ बोर्डों के पास है। भारतीय रेलवे और रक्षा मंत्रालय की भू-संपत्ति के बाद वक्फ बोर्ड के पास ही सर्वाधिक जमीन है। इसी तरह वक्फ बोर्ड के तहत बनी हुई कब्रगाहों के क्षेत्र निर्धारित हैं। “वक्फ” का इतिहास गरीबों के कल्याण से जुड़ा रहा है। अल्लाह के नाम पर किसी व्यक्ति या संस्था द्वारा गरीबों के लिए दान की गई संपत्ति “वक्फ” मानी गई है। भारत में लगभग 800 वर्षों से “वक्फ” का प्रावधान रहा है। देश में करीब 3 लाख अचल संपत्तियाँ वक्फ संपत्ति की तरह अब भी पंजीकृत हैं। क्या वक्फ बोर्ड की संपत्ति को भी समाज कल्याण के लिए खर्च कर देना चाहिए.
भारत की सत्ता ने सम्प्रदाय विशेष को हमेशा अपनी सत्ता बचाने के लिए कवच की तरह से इस्तेमाल किया है. वोट बैंक की यह राजनीति जहाँ अमरनाथ यात्रियों की सुविधा के लिए सौ एकड़ जमीन नहीं दे सकती है. लेकिन हज यात्रियों को पासपोर्ट की अनिवार्य जांच प्रक्रिया भी नहीं करने का निर्णय किया जाता है. भारत की केंद्र और राज्य सरकारों की वोट बैंक की राजनीति ने देश के धर्मनिरपेक्ष ढाँचे को चोट पहुँचाने का कार्य किया है. यदि पद्मनाभम स्वामी मंदिर की संपत्ति को समाज कल्याण में खर्च किया जा सकता है, तो वक्फ बोर्ड की संपत्ति को क्यों नहीं.
एक धर्मनिरपेक्ष चरित्र वाले राष्ट्र में विभिन्न धर्मों एवं सम्प्रदायों के बीच यह दोहरा मापदंड वोट बैंक को साधने का कुटिल प्रयास है. वक्फ बोर्ड की संपत्ति रेलवे और रक्षा मंत्रालय के पश्चात् देश में सबसे अधिक है. क्या इस संपत्ति का सामाजिक कल्याण के कार्यों में उपयोग नहीं किया जाना चाहिए. यदि पद्मनाभम स्वामी मंदिर का खजाना समाज कल्याण के कार्य में लग सकता है, तो वक्फ बोर्ड की अथाह संपत्ति का भी समाज कार्यों में उपयोग हो सकता है. इसलिए पद्मनाभम स्वामी मंदिर, तिरुपति बालाजी मंदिर, साईं शिर्डी मंदिर और अन्य प्रमुख तीर्थ स्थलों, प्रमुख मंदिरों एवं वक्फ बोर्ड को मिलने वाले चढ़ावे और दान के निश्चित अंश को समाज कल्याण के कार्यों में खर्च किया ही जाना चाहिए.

Monday, June 13, 2011

कांग्रेस का साम्प्रदायिक कार्ड


सरकार प्रायोजित भ्रष्टाचार के विरुद्ध कांग्रेस के ''आम आदमी'' ने बिगुल फूँक दिया है. भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई का नेतृत्व कर रहे हैं योग गुरु बाबा रामदेव और अन्ना हजारे. यह लड़ाई  बाबा रामदेव और अन्ना हजारे की  ही नहीं भ्रष्टाचार से त्रस्त समस्त भारतीयों की लड़ाई है. बाबा रामदेव के सत्याग्रह और अन्ना की मुहीम से उजागर हुए भ्रष्टाचारी चेहरे को बचाने के लिए सरकार ने बचकानी राजनीति करनी शुरू कर दी है. केंद्र की सत्ता पर काबिज कांग्रेस पार्टी ने अब कोई रास्ता न देख रामदेव और अन्ना के आन्दोलन को संघ की साजिश बताया है. कांग्रेस पार्टी हमेशा ही अपने को घिरता देख साम्प्रदायिक कार्ड खेलती रही है. कांग्रेस पार्टी के महासचिव दिग्विजय सिंह साम्प्रदायिक राजनीति के बड़े खिलाडी माने जाते हैं. जिनकी नजर में बाबा रामदेव महाठग हैं लेकिन लादेन एक सम्मानित व्यक्ति है. दिग्गी राजा जैसे चेहरों को आगे कर कांग्रेस पार्टी अपने साम्प्रदायिक एजेंडे को आगे बढाती रही है. कांग्रेस पार्टी अपने को घिरता देख किसी भी मुद्दे को साम्प्रदायिक रंग देने का प्रयास करती है.
                                               भ्रष्टाचार के मुद्दे पर घिरी कांग्रेस पार्टी ने एक बार फिर से साम्प्रदायिक एजेंडे को बढ़ाने का विफल प्रयास किया है. कांग्रेस ने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों को संघ की साजिश बताया है. कांग्रेस पार्टी को यह बताना ही चाहिए की भ्रष्टाचार के मुद्दे के बीच में साम्प्रदायिकता ने कैसे अपनी टांग अड़ा दी है? राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जिसे कांग्रेस पार्टी अल्पसंख्यकों के लिए खतरा बताती है, उसको इस बात का जवाब देना चाहिए की देश में हुए भ्रष्टाचार से क्या केवल हिन्दुओं का ही अहित है? सरकार प्रायोजित भ्रष्टाचार को साम्प्रदायिक एजेंडे से नहीं छिपाया जा सकता है. जनहितकारी आंदोलनों को यदि संघ का समर्थन प्राप्त होता है तो किसी को क्या आपत्ति हो सकती है. लेकिन कांग्रेस पार्टी को आपत्ति है, क्योंकि कांग्रेस पार्टी का भ्रष्टाचार जो उजागर हो रहा है. ध्यान रहना चाहिए की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने जेपी आन्दोलन को भी अपना पूर्ण समर्थन दिया था. इस आन्दोलन की सफलता ने भारत में लोकतंत्र को पुनर्जीवित किया था. ऐसा ही माहौल एक बार फिर तैयार हो रहा है, जिसे संघ का भी समर्थन प्राप्त है. रामदेव और अन्ना के आन्दोलन को संघ के समर्थन ने सरकार की नींद उड़ा दी है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अल्पसंख्यकों के लिए खतरा बता कर सरकार अपने को बचा नहीं  सकती है. देशहित के मुद्दों पर आन्दोलन करने और समर्थन करने का हक सभी को है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भी है.
                                        कांग्रेस पार्टी की भ्रष्टाचारी सरकार संघ को ढाल बनाकर अपनी साख नहीं बचा सकती है. जनहित के मुद्दे संघ उठाये या समाज का कोई अन्य वर्ग सरकार को जवाब देना ही होगा.भ्रष्टाचार किसी एक सम्प्रदाय विशेष की समस्या नहीं है, यह समस्त भारतीयों की समस्या है. स्विस बैंकों में जमा काला धन भी किसी सम्प्रदाय विशेष का धन नहीं राष्ट्र की संपत्ति है.कांग्रेस पार्टी को यदि इसमें भी साम्प्रदायिकता दिखाई देती है, तो यह उसके मानसिक दीवालिएपन का परिचायक है. भ्रष्टाचार के मुद्दे को साम्प्रदायिकता का नाम नहीं दिया जा सकता है. कांग्रेस पार्टी को इस प्रकार के कुत्सित प्रयासों का खामियाजा भुगतना पड़ेगा. केंद्र सरकार का सिंहासन हिलने लगा है,सरकार के प्रति आम जनता का आक्रोश सतह पर आ गया है. भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन अब यूपीए-२ के पटाक्षेप के बाद ही समाप्त होगा, जिसे अब और नहीं टाला जा सकता है.