Wednesday, September 21, 2011

राष्ट्रीय राजनीति का बदलता परिदृश्य

देश की राजनीति इस समय बदलाव की ओर है. राष्ट्रीय राजनीति में पक्ष और विपक्ष के कई प्रमुख चेहरों के सामने साख का संकट है. जिसके कारण उन चेहरों को निखारने का प्रयास किया जा रहा है, जिनके दम पर वोट बैंक का समीकरण साधा जा सकता है. सन २००४ से सत्ता पर काबिज कांग्रेस पार्टी के प्रमुख चेहरे और ईमानदार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपनी विश्वसनीयता खो चुके हैं. कांग्रेस पार्टी को अगले आम चुनावों में मनमोहन सिंह के नाम पर वोट मिलने की उम्मीद नहीं है. इसी के चलते कांग्रेस पार्टी ने कथित ’युवराज’ राहुल गांधी को आगे कर दिया है. दरअसल कांग्रेस पार्टी इस ग़लतफ़हमी में है कि राहुल गांधी के युवा नेतृत्व के नाम पर देश के आम आदमी का साथ कांग्रेस के हाथ को मिलेगा. जिस देश का युवा कांग्रेसी राज से त्रस्त होकर ७० वर्षीय अन्ना के आन्दोलन में सहभागी है, वह राहुल का वोट बैंक कैसे बन सकता है? इससे पहले भी कांग्रेस पार्टी के करिश्माई चेहरे राहुल गांधी का जादू बिहार जैसे अहम राज्य में नहीं चल पाया था. उत्तर प्रदेश में भी उनकी असली परीक्षा अभी बाकी है जहां की फिजा अन्ना अनशन के बाद से बदल गयी है. महंगाई, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, नक्सलवाद जैसे मुद्दों ने राहुल की राजनीति को पलीता लगाया है.

अब एक सवाल यह भी उठता है कि यदि कांग्रेस अपनी साख गवां चुकी है और राहुल प्रभावी चेहरा नहीं हैं तो उनका विकल्प क्या है? क्या देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी के पास राहुल का कोई विकल्प है? जिसे पार्टी आम चुनावों में अपना चेहरा बना सकती है. वर्तमान समय में अपने विकास मॉडल के लिए अमेरिकी प्रशंसा पाने वाले नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बताने की होड़ चल पड़ी है. जिससे यह समझ में आता है कि देश में नरेन्द्र मोदी का प्रभाव अवश्य है. अभी तक नरेन्द्र मोदी ने अपनी भूमिका को गुजरात तक ही सीमित रखा है. दरअसल देश की प्रमुख विपक्षी पार्टियों कांग्रेस और भाजपा की यह समस्या लगभग एक सी है कि केंद्र में स्थापित उनके प्रमुख नेताओं की विश्वसनीयता दांव पर है. ऐसे में दोनों ही पार्टियों के लिए यह आवश्यक है कि आम चुनावों में नए चेहरे को उतार वोट बैंक का समीकरण साधा जाये. नए नेता का चुनाव करने की स्थिति में भाजपा में कांग्रेस की अपेक्षा अधिक समस्याएं हैं. जहां कांग्रेस पार्टी नेहरु-गांधी परिवार को नेतृत्व सौंपने को लेकर कोई विवाद नहीं रहता है, वहीँ भाजपा में नेतृत्व की लड़ाई जगजाहिर है. ऐसे में नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री का दावेदार बनाये जाने के क्रम में पहला विरोध पार्टी से ही हो सकता है. यदि आडवाणी समर्थक लॉबी नरेन्द्र मोदी की दावेदारी का समर्थन करे तो नरेन्द्र मोदी के रास्ते की पहली बाधा दूर हो सकती है.

हालांकि अन्ना के अनशन के बाद अभी एक सर्वे कंपनी निल्सन ने २८ राज्यों में अपना एक सर्वे कराया और उसमें सभी जाति, धर्म के लोगों को शामिल किया .इस सर्वे से यह बात स्पष्ट रूप से ज्ञात हुआ कि आम आदमी केंद्र सरकार के शासन व्यवस्था से आजिज आ चुकी है . इस सर्वे की रिपोर्ट में भाजपा को ३१ प्रतिशत व कांग्रेस को २० प्रतिशत अंक हासिल हुए हैं अर्थात अगर तत्काल में चुनाव कराये जायें तो यह बात स्पष्ट है कि भाजपा की जीत सुनिश्चित है . लेकिन राष्ट्रीय स्तर की इस पार्टी में वर्तमान में नेतृत्व की भूमिका का अभाव प्रतीत होता है क्योकि भाजपा में नेतृत्वकर्ता के रूप में अब आम आदमी एक ऐसी छवि को देखना चाहता है जो वास्तव में आम आदमी के हित के साथ-साथ देश का भी विकास कर सके और इसका जीता जागता प्रमाण गुजरात में हो रहे विकास के रूप में सबके सामने प्रस्तुत है .

भारतीय जनता पार्टी यदि मोदी को मैदान में उतारती है तो उसे गठबंधन के स्तर पर भी कड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी. फिर भी नरेन्द्र मोदी वह फैक्टर हैं जो इन सभी मुद्दों पर भाजपा को विजय दिला सकते हैं. ऐसे समय में जब पार्टी को व्यापक जनाधार वाले और लोकप्रिय नेता की तलाश हो तो नरेन्द्र मोदी ही सबसे उपयुक्त दिखाई पड़ते हैं. अब बात है नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी के बीच मुकाबले की तो उसका फैसला जनता के हाथों में है कि वह किसे नेता के रूप में स्वीकार करती है. अंततः भाजपा के लिए केंद्र की सत्ता के लिए ही नहीं बल्कि देश की राजनीति में मुख्य लड़ाई में बने रहने के लिए भी नए चेहरे की तलाश है जो नरेन्द्र मोदी के रूप में पूरी हो सकती है.

Tuesday, September 20, 2011

पत्रकारिता के प्रकाशपुंज बाबूराव विष्णु पराड़कर

भारत में पत्रकारिता का उदभव ही राष्ट्रव्यापी पुनर्जागरण और समाज कल्याण के उद्देश्य से हुआ था। महात्मा गांधी, बाबूराव विष्णु पराड़कर, गणेश शंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी, महर्षि अरविंद आदि युगपुरुष पत्रकारिता की इसी परंपरा के वाहक थे। जिन्होंने पत्रकारिता को देशहित में कार्य करने का लक्ष्य और प्रेरणा दी। पत्रकारिता में उनके आदर्श ही पत्रकारों की वर्तमान पीढ़ी के लिए दिशा-निर्देश के समान हैं, जिन पर चलकर पत्रकारों की वर्तमान पीढ़ी अपनी इस अमूल्य विधा के साथ न्याय कर सकती है। पत्रकारिता की अमूल्य विधा वर्तमान समय में अपने संक्रमण काल के दौर से गुजर रही है। दरअसल पत्रकारिता में यह संक्रमण उन आशंकाओं का अवतरण है, जिसकी आशंका पत्रकारिता के युगपुरूषों ने बहुत पहले ही व्यक्त की थीं।

संपादकाचार्य बाबूराव विष्णु पराड़कर ने भविष्य में पत्रकारिता में बाजारवाद, नैतिकता के अभाव और पत्रकारों की स्वतंत्रता के बारे में कहा था-
‘‘पत्र निकालकर सफलतापूर्वक चलाना बड़े-बड़े धनियों अथवा सुसंगठित कंपनियों के लिए ही संभव होगा। पत्र संर्वांग सुंदर होंगे। आकार बड़े होंगे, छपाई अच्छी होगी, मनोहर, मनोरंजक और ज्ञानवर्द्धक चित्रों से सुसज्जित होंगे, लेखों में विविधता होगी, कल्पकता होगी, गंभीर गवेषणा की झलक होगी, ग्राहकों की संख्या लाखों में गिनी जाएगी। यह सब कुछ होगा पर पत्र प्राणहीन होंगे। पत्रों की नीति देशभक्त, धर्मभक्त अथवा मानवता के उपासक महाप्राण संपादकों की नीति न होगी- इन गुणों से संपन्न लेखक विकृत मस्तिष्क समझे जाएंगे, संपादक की कुर्सी तक उनकी पहुंच भी न होगी। वेतनभोगी संपादक मालिक का काम करेंगे और बड़ी खूबी के साथ करेंगे। वे हम लोगों से अच्छे होंगे। पर आज भी हमें जो स्वतंत्रता प्राप्त है वह उन्हें न होगी। वस्तुतः पत्रों के जीवन में यही समय बहुमूल्य है।‘‘(संपादक पराड़कर में उद्धृत)

पराड़कर जी के यह कथन वर्तमान दौर की पत्रकारिता में चरितार्थ होने लगे हैं। जब पत्रकारों की कलम की स्याही हल्का लिखने लगी है और समाजहित जैसी बातें बेमानी होने लगी हैं। इसका कारण पत्रकार नहीं बल्कि वे मीडिया मुगल हैं जो मीडिया के कारोबारी होते हैं। पत्रकारिता पर पूंजीपतियों के दखल और उसके दुष्प्रभावों के बारे में पराड़कर जी ने कहा था-

‘‘पत्र निकालने का व्यय इतना बढ़ गया है कि लेखक केवल अपने ही भरोसे इसमें सेवा प्राप्त नहीं कर सकता। धनियों का सहयोग अनिवार्य हो गया है। दस जगह से धनसंग्रह कर आप कंपनी बनाएं अथवा एक ही पूंजीपति पत्र निकाल दे, संपादक की स्वतंत्रता पर दोनों का परिणाम प्रायः एक सा ही होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि पत्रों की उन्नति के साथ-साथ पत्रों पर धनियों का प्रभाव अधिकाधिक परिणाम में अवश्य पड़ेगा।‘‘(इतिहास निर्माता पत्रकार, डा. अर्जुन तिवारी)

बाजार के बढ़ते प्रभाव के कारण समाचारपत्र के स्वरूप और समाचारों के प्रस्तुतिकरण में आ रहे बदलावों के बारे में पराड़कर जी ने कहा था-
‘‘पत्र बेचने के लाभ से अश्लील समाचारों को महत्व देकर तथा दुराचरण मूलक अपराधों का चित्ताकर्षण वर्णन कर हम परमात्मा की दृष्टि में अपराधियों से भी बड़े अपराधी ठहर रहे हैं, इस बात को कभी न भूलना चाहिए। अपराधी एकाध पर अत्याचार करके दण्ड पाता है और हम सारे समाज की रूचि बिगाड़ कर आदर पाना चाहते हैं।‘‘(प्रथम संपादक सम्मेलन 1925 के वृंदावन हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्षीय वक्तव्य से)

पराड़कर जी का यह कथन वर्तमान समय में और भी प्रासंगिक लगता है, जब खबर के बाजार में मीडिया मुगल अश्लील खबरों के माध्यम से बाजार पर हावी होने के प्रयास में रहते हैं।
पत्रकार को देश के समसामयिक, राजनैतिक, ऐतिहासिक और विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों के बारे में जानकारी अवश्य होनी चाहिए। तभी वह अपने उद्देश्य में सफल हो सकता है। इसका वर्णन करते हुए पराड़कर जी ने कहा था -
‘‘मेरे मत से संपादक में साहित्य और भाषा ज्ञान के अतिरिक्त भारत के इतिहास का सूक्ष्म और संसार के इतिहास का साधारण ज्ञान तथा समाज शास्त्र, राजनीति शास्त्र और अंतर्राष्ट्रीय विधानों का साधारण ज्ञान होना आवश्यक है। अर्थशास्त्र का वह पण्डित न हो पर कम से कम भारतीय और प्रान्तीय बजट समझने की योग्यता उसमें अवश्य होनी चाहिए।‘‘ (इतिहास निर्माता पत्रकार, अर्जुन तिवारी)

अभी हाल ही में प्रधानमंत्री ने टिप्पणी की थी कि ‘‘मीडिया अब जज की भूमिका अदा करने लगा है‘‘ यह कुछ अर्थों में सही भी है। पत्रकारों पर राजनीति का कलेवर हावी होने लगा है, पत्रकारिता के राजनीतिकरण पर टिप्पणी करते हुए पराड़कर जी ने कहा था-
‘‘आज का पत्रकार राजनीति और राजसत्ता का अनुकूल्य उपलब्ध करने के लिए उनके मुहावरे में बोलने लगा है। उपभोक्ता संस्कृति के अभिशाप को लक्ष्य कर राजनेताओं की तरह आवाज टेरने वाले पत्रकार स्वयं व्यावसायिक चाकचिक्य के प्रति सतृष्ण हो गए हैं और उपभोक्ता संस्कृति ही इनकी संस्कृति बनती जा रही है।‘‘(पत्रकारिता इतिहास और प्रश्न, कृष्णबिहारी मिश्र)

संपादकाचार्य पराड़कर जी की पत्रकारिता का लक्ष्य पूर्णतः स्वतंत्रता प्राप्ति के ध्येय को समर्पित था। पराड़कर जी ने अपने उद्देष्य की घोषणा इन शब्दों में की थी-
षब्दों में सामर्थ्य का भरें नया अंदाज।
बहरे कानों को हुए अब अपनी आवाज।

5 सितंबर, 1920 को ‘आज‘ की संपादकीय टिप्पणी में अपनी नीतियों को स्पष्ट करते हुए उन्होंने लिखा था- ‘‘हमारा उद्देश्य अपने देश के लिए सर्व प्रकार से स्वातंत्र्य उपार्जन है। हम हर बात में स्वतंत्र होना चाहते हैं। हमारा लक्ष्य है कि हम अपने देश के गौरव को बढ़ावें, अपने देशवासियों में स्वाभिमान संचार करें।‘‘

पराड़कर जी की पत्रकारिता पूर्णतः ध्येय समर्पित पत्रकारिता थी, जिसका वर्तमान पत्रकार पीढ़ी में सर्वथा अभाव दिखता है। बाबूराव विष्णु पराड़कर पत्रकारिता जगत के लिए सदैव स्मरणीय आदर्श पत्रकार हैं। पत्रकारिता के सही मूल्यों को चरितार्थ करने वाले बाबूराव विष्णु पराड़कर जी की पत्रकारिता के पदचिन्ह वर्तमान पत्रकार पीढ़ी के लिए पथप्रदर्शक के समान हैं।

भाषायी पत्रकारिता के संस्थापक राजा राममोहन राय



राजा राममोहन राय! यह नाम एक प्रखर एवं प्रगतिशील व्यक्तित्व का नाम है, जिन्होंने भारत में भाषायी प्रेस की स्थापना का ऐतिहासिक कार्य किया। राजा राममोहन राय को भारतीय पुनर्जागरण एवं सामाजिक आंदोलनों का प्रणेता भी कहा जाता है। उन्होंने तत्कालीन भारतीय समाज में व्याप्त कुरीतियों के विरूद्ध जनजागरण का कार्य किया, जो तत्कालीन समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता थी। राजा राममोहन राय ने सामाजिक और राष्ट्रव्यापी जनजागरण कार्य पत्रकारिता के माध्यम से ही किया था। उन्होंने पत्रकारिता को जनजागरण के सशक्त माध्यम के रूप में प्रस्तुत किया था। उनके द्वारा चलाए गए सामाजिक आंदोलन और पत्रकारिता एक-दूसरे के पूरक थे। उनकी पत्रकारिता सामाजिक आंदोलन को मजबूती प्रदान करती थी।

राजा राममोहन राय का जन्म राधानगर, बंगाल में 22 मई, 1772 को कुलीन ब्राहमण परिवार में हुआ था। उनका जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ था जो धार्मिक विविधताओं से परिपूर्ण था। उनकी माता शैव मत में विश्वास करती थीं एवं पिता वैष्णव मत में, जिसका उनके जीवन पर व्यापक प्रभाव पड़ा। सामाजिक परिवर्तनों के प्रणेता और आधुनिक भारत के स्वप्नदृष्टा राजा राममोहन राय ने संवाद कौमुदी, ब्रह्मैनिकल मैगजीन, मिरात-उल-अखबार, बंगदूत जैसे सुप्रसिद्ध पत्रों का प्रकाशन किया। राजा राममोहन राय ने सन 1821 में बंगाली पत्र संवाद कौमुदी का कलकत्ता से प्रकाशन प्रारंभ किया। इसके बाद सन 1822 में उन्होंने फारसी भाषा के पत्र
मिरात-उल-अखबार और ब्रह्मैनिकल मैगजीन का प्रकाशन किया। यह पत्र तत्कालीन समय में राष्ट्रवादी एवं जनतांत्रिक विचारों के शुरूआती समाचार पत्रों में से थे। इन समाचार पत्रों का उद्देश्य राष्ट्रीय पुनर्जागरण और सामाजिक चेतना ही था। इन समाचार पत्रों के अलावा राजा राममोहन राय ने अंग्रेजी में बंगला हेराल्ड और बंगदूत का भी प्रकाशन किया।

राजा राममोहन राय ने भारत में उद्देश्यपूर्ण पत्रकारिता की नींव डाली थी। उन्होंने अपने द्वारा प्रकाशित किए गए समाचार पत्रों का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए कहा था कि-
‘‘मेरा उद्देश्य मात्र इतना है कि जनता के सामने ऐसे बौद्धिक निबंध उपस्थित करूं जो उनके अनुभव को बढ़ावें और सामाजिक प्रगति में सहायक सिद्ध हों। मैं अपनी शक्ति भर शासकों को उनकी प्रजा की परिस्थितियों का सही परिचय देना चाहता हूं और प्रजा को उनके शासकों द्वारा स्थापित विधि व्यवस्था से परिचित कराना चाहता हूं, ताकि जनता को शासन अधिकाधिक सुविधा दे सके। जनता उन उपायों से अवगत हो सके जिनके द्वारा शासकों से सुरक्षा पायी जा सके और अपनी उचित मांगें पूरी कराई जा सकें।‘‘

राजा राममोहन राय ने भारत में पत्रकारिता की नींव उस समय डाली थी, जब भारत को पत्रकारिता के महत्वपूर्ण अस्त्र की आवश्यकता थी। वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कोलकाता प्रेस क्लब में अपने संबोधन में कहा था-
‘‘उन्होंने बंगाली और फारसी भाषा में समाचार पत्रों का प्रकाशन किया और हमेशा ही प्रेस की स्वतंत्रता की लड़ाई के अगुआ रहे। राजा राममोहन राय ने बहुत पहले ही सन 1823 में ही प्रेस की स्वतंत्रता के महत्व और उसकी आवश्यकता की व्याख्या कर दी थी।‘‘

प्रधानमंत्री ने प्रेस की स्वतंत्रता के संबंध में राजा राममोहन राय के शब्दों को ही उद्धृत करते हुए कहा- ‘‘प्रेस की आजादी के बिना दुनिया के किसी भी हिस्से में क्रांति नहीं हो सकती है।‘‘

प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर मौजूदा दौर में आवाजें उठती रहती हैं। प्रेस की स्वतंत्रता की लड़ाई का आरंभ राजा राममोहन राय ने ब्रिटिश शासन से टकराव मोल ले लिया था। उनका मानना था कि समाचारपत्रों पर सरकार का नियंत्रण नहीं होना चाहिए, और सच्चाई सिर्फ इसलिए नहीं दबा देनी चाहिए कि वह सरकार को पसंद नहीं है। प्रेस की स्वतंत्रता के मुद्दे पर ही इतिहास पर दृष्टि डालते हुए मनमोहन सिंह ने कहा- ‘‘जब कोलकाता में प्रेस पर नियंत्रण करने का प्रयास किया गया, तब राजा राममोहन राय ने सरकार के निर्णय की आलोचना करते हुए ब्रिटिश सरकार को ज्ञापन सौंपा। उन्होंने पत्रकारिता की स्वतंत्रता की ओर ब्रिटिश सरकार का ध्यान इन शब्दों में आकर्षित किया।‘‘
राजा राममोहन राय ने ब्रिटिश सरकार से कहा- ‘‘कलकत्ता से प्रकाशित होने वाले अधिकतर समाचारपत्र यहां के मूल निवासियों के बीच लोकप्रिय हैं, जो उनमें एक स्वतंत्र चिंतन और ज्ञान की व्याख्या करते हैं। यह समाचार पत्र उनके ज्ञान को बढ़ाने और स्थिति को सुधारने का प्रयत्न कर रहे हैं।‘‘

उन्होंने ब्रिटिश सरकार से कहा- ‘‘इन समाचारपत्रों के प्रकाशन पर रोक लगाया जाना उचित नहीं है।‘‘ राजा राममोहन राय ने हमेशा ही पत्रकारिता की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया था। उन्होंने सन 1815 से 1830 के कम अंतराल में ही तीस पुस्तकें लिखी थीं। सौमेन्द्र नाथ ठाकुर के अनुसार-‘‘बंगाली काव्य जगत ने बंकिम चंद्र चटर्जी और रविन्द्र नाथ टैगोर की कविताओं के माध्यम से जो ऊंचाई प्राप्त की है, उसकी आधारशिला राजा राममोहन राय ने ही रखी थी।‘‘

राजा राममोहन राय को आधुनिक भारत का जनक माना जाता है। महान क्रांतिकारी सुभाष चंद्र बोस ने राजा राममोहन के बारे में कहा कि- ‘‘राजा राममोहन राय भारतीय पुनर्जागरण के अगुआ थे जिन्होंने भारत में एक मसीहा के रूप में नए युग का सूत्रपात किया।‘‘

राजा राममोहन राय की अंग्रेजी शासन और अंग्रेजी भाषा के प्रशंसक होने के कारण आलोचना की जाती रही है। उनकी तमाम आलोचनाओं के बाद
भी भारत में भाषायी प्रेस की स्थापना और स्वतंत्रता के लिए किए गए उनके योगदान को भाषायी पत्रकारिता के इतिहास में भुलाया नहीं जा सकता है। राजा राममोहन राय अपनी मृत्यु से कुछ वर्ष पूर्व ब्रिटेन में जा बसे थे जहां 27 सितंबर, 1833 को ब्रिस्टल (इंग्लैण्ड) में उनका निधन हो गया।

Friday, August 19, 2011

वैचारिक पत्रकारिता के स्तंभ महर्षि अरविन्द



महर्शि अरविंद महान योगी, क्रान्तिकारी, राश्ट्रवाद के अग्रदूत, प्रखर वक्ता एवं पत्रकार के रूप में जाने जाते हैं। महर्शि अरविंद की पत्रकारिता के बारे में देषवासियों को बहुत अधिक जानकारी नहीं रही है। जिसके बारे में जानना नवोदित पत्रकार पीढ़ी के लिए आवष्यक है। महर्शि अरविंद उन पत्रकारों में से एक थे, जिन्होंने समाचार पत्रों के माध्यम से तत्कालीन जनमानस को स्वाधीनता संग्राम के लिए तैयार करने में प्रमुख भूमिका निभाई थी। उनका जन्म 15 अगस्त, 1872 में कलकत्ता के एक बंगाली परिवार में हुआ था। उनके पिता कृश्णधन घोश कलकत्ता के ख्यातिप्राप्त वकील थे, जो पूरी तरह से पष्चिमी सभ्यता के प्रभाव में थे। महर्शि अरविंद की माता का नाम स्वर्णलता देवी था, पिता के दबाव में माता को भी पष्चिम की सभ्यता के अनुसार ही रहना पड़ता था।

महर्शि अरविंद की षिक्षा-दीक्षा भी अंग्रेजी वातावरण में ही हुई थी। उनके पिता ने उन्हें पांच वर्श की अवस्था में दार्जिलिंग के लोरेटो कॉन्वेंट स्कूल में दाखिल करवा दिया, जिसका प्रबंध यूरोपीय लोग करते थे। अरविंद अपने बाल्यकाल के सात वर्शों तक ही भारत में रहे, जिसके पष्चात उनके पिताजी ने उन्हें उनके भाइयों के साथ इंग्लैण्ड भेज दिया। जहां मैनचेस्टर के एक अंग्रेज परिवार में उनका पालन-पोशण हुआ।

महर्शि अरविंद ने ब्रिटेन में अपनी षिक्षा सैंट पॉल स्कूल और कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के किंग्स कॉलेज में प्राप्त की। पष्चिमी सभ्यता में पले-बढ़े महर्शि अरविंद एक दिन भारतीय संस्कृति के व्याख्याता होंगे, ऐसा षायद किसी ने सोचा भी नहीं होगा। फरवरी 1893 में महर्शि अरविंद भारत लौटे, ब्रिटेन से लौटने के पष्चात उन्होंने बड़ौदा कॉलेज में अध्यापन कार्य किया। यही वह समय था, जब बंगाल विभाजन के परिणाम स्वरूप देष में 1857 के पष्चात क्रांति की ज्वाला एक बार फिर से प्रखर हो रही थी। जिसका केन्द्र कलकत्ता ही था। महर्शि अरविंद बड़ौदा से कलकत्ता भी आते-जाते रहते थे। जहां वे क्रांतिकारी गतिविधियों में सहयोग करने लगे।

सन 1907 में अरविन्द ने कांग्रेस के क्रांतिकारी संगठन नेषलिस्ट पार्टी के राश्ट्रीय अधिवेषन की अध्यक्षता की। इसी वर्श अरविंद घोश ने विपिनचंद्र पाल के अंग्रेजी दैनिक वन्दे मातरम में काम करना षुरू कर दिया। महर्शि अरविंद का पत्रकारिता के क्षेत्र में इससे पूर्व ही पदार्पण हो चुका था। उन्होंने अपनी पत्रकारिता की षुरूआत सन 1893 में मराठी साप्ताहिक ‘‘इन्दु प्रकाष‘‘ से की थी। जिसमें उनके नौ लेख प्रकाषित हुए थे, इनमें षुरूआती दो लेख उन्होंने ‘‘भारत और ब्रिटिष संसद‘‘ षीर्शक के साथ लिखे थे। इसके बाद 16 जुलाई से 27 अगस्त, 1894 के दौरान उनकी सात लेखों की एक श्रृंखला प्रकाषित हुई थी। वे लेख उन्होंने ‘‘वन्दे मातरम‘‘ के रचयिता एवं बांग्ला के महान साहित्यकार बंकिम चंद्र चटर्जी को श्रद्धांजलि देते हुए लिखे थे। इसके बाद अरविंद की लेखन प्रतिभा के दर्षन बंगाली दैनिक ‘‘युगांतर‘‘ हुए। जिसकी षुरूआत मार्च, 1906 में उनके भाई बरिन्द्र और अन्य साथियों ने की, इस पत्र के प्रकाषन पर मई, 1908 में ब्रिटिष सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया।

इसके बाद महर्शि अरविंद ने अंग्रेजी दैनिक वन्दे मातरम में कार्य किया। इस पत्र में प्रकाषित उनके लेखों ने क्रांति के ज्वार में एक नया तूफान ला दिया। वन्दे मातरम में उनके लेखों के बारे में कहा जाता है कि भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में इतने प्रखर राश्टवादी लेख कभी नहीं लिखे गए। ब्रिटिष सरकार की नीतियों के विरोध में लिखने पर वन्दे मातरम पर राजद्रोह का मुकदमा दायर कर दिया गया। अरविंद को संपादक के रूप में अभियुक्त बनाया गया। इस अवसर पर विपिन चंद्र पाल

ने उनका बहुत सहयेग किया, उन्होंने अरविंद को पत्र का संपादक मानने से ही इंकार कर दिया। जिसके लिए उन्हें छह माह का कारावास भुगतना पड़ा, परंतु सरकार अरविंद को दोशी नहीं सिद्ध कर पाई। अदालत के द्वारा अरविंद को दोशमुक्त करार दिए जाने पर देष भर में जष्न मनाया गया एवं स्थान-स्थान पर संगोश्ठियां आयोजित हुईं। उनके पक्ष में संपादकीय लिखे गए तथा उन्हें सम्मानित किया गया। अरविंद की पत्रकारिता की लोकप्रियता का ही कारण था कि कलकत्ता के लालबाजार की पुलिस अदालत के बाहर हजारों युवा एकत्र होकर वन्दे मातरम के नारे लगाते थे। जहां अरविंद के मामले की सुनवाई चल रही थी। सितंबर 1908 में वन्दे मातरम का प्रकाषन बंद हो गया। जिसके बाद उन्होंने 15 जून, 1909 को कलकत्ता से ही अंग्रेजी साप्ताहिक कर्मयोगी और 23 अगस्त, 1909 को बंगााली साप्ताहिक धर्म की षुरूआत की, जिनका मूल स्वर राश्ट्रवाद ही था। महर्शि अरविंद ने इन दोनों पत्रों में राश्ट्रवाद के अलावा सामाजिक समस्याओं पर भी लिखा। उनके इन पत्रों से विचलित होकर तत्कालीन वायसराय के सचिव ने लिखा था- ‘‘सारी क्रांतिकारी हलचल का दिल और दिमाग यही व्यक्ति है, जो ऊपर से कोई गैर कानूनी कार्य नहीं करता और किसी तरह कानून की पकड़ में नहीं आता।‘‘

महर्शि अरविंद का लेखन उनके अंतिम समय तक अनवरत चलता रहा। सन 1910 में वे कर्मयोगी और धर्म को भगिनी निवेदिता को सौंप कर चन्द्रनगर चले गए। इसके बाद वे अन्तः प्रेरणा से पांडिचेरी पहुंचे। वहां भी उन्होंने ‘‘आर्य‘‘ अंग्रेजी मासिक की षुरूआत की, जिसमें उन्होंने प्रमुख रूप से धार्मिक और आध्यात्मिक विशयों पर लिखा। ‘‘आर्य‘‘ मासिक में उनकी अमर रचनाएं प्रकाषित हुईं। जिनमें प्रमुख हैं लाइफ डिवाइन, सीक्रेट ऑफ योग एवं गीता पर उनके निबंध। महर्शि अरविंद का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समय की पत्रकारिता में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। पत्रकारिता में राश्ट्रवादी स्वर को स्थान देने वालों में अरविंद का नाम सदैव उल्लेखनीय रहेगा। 5 दिसंबर 1950 को महर्शि अरविंद देह त्याग कर अनंत में विलीन हो गए।

पूंजीपतियों के चरणों में अर्पित पत्रकारिता- माखनलाल चतुर्वेदी


वर्तमान समय में पत्रकारिता के कर्तव्य, दायित्व और उसकी भूमिका को लोग संदेह से परे नहीं मान रहे हैं। इस संदेह को वैष्विक पत्रकारिता जगत में न्यूज ऑफ द वर्ल्ड और राश्ट्रीय स्तर पर राडिया प्रकरण ने बल प्रदान किया है। पत्रकारिता जगत में यह घटनाएं उन आषंकाओं का प्रादुर्भाव हैं जो पत्रकारिता के पुरोधाओं ने बहुत पहले ही जताई थीं। पत्रकारिता में पूंजीपतियों के बढ़ते प्रभाव के बारे में पत्रकारिता के महान आदर्ष माखनलाल चतुर्वेदी ने कहा था-

‘‘दुख है कि सारे प्रगतिवाद, क्रांतिवाद के न जाने किन-किन वादों के रहते हुए हमने अपनी इस महान कला को पूंजीपतियों के चरणों में अर्पित कर दिया है।‘‘ (पत्रकारिताः इतिहास और प्रष्न- कृश्ण बिहारी मिश्र)

भारत की पत्रकारिता की कल्पना हिंदी से अलग हटकर नहीं की जा सकती है, परंतु हिंदी पत्रकारिता जगत में भी अंग्रेजी षब्दों का प्रयोग बढ़ता जा रहा है। भाशा के मानकीकरण की दृश्टि से यह उचित नहीं कहा जा सकता है माखनलाल चतुर्वेदी भाशा के इस संक्रमण से बिल्कुल भी संतुश्ट नहीं थे। उन्होंने कहा कि-

‘‘राश्ट्रभाशा हिंदी और तरूणाई से भरी हुई कलमों का सम्मान ही मेरा सम्मान है।‘‘(राजकीय सम्मान के अवसर पर)

राश्ट्रभाशा हिंदी के विशय में माखनलाल जी ने कहा था-

‘‘जो लोग देष में एक राश्ट्रभाशा चाहते हैं। वे प्रांतों की भाशाओं का नाष नहीं चाहते। केवल विचार समझने और समझाने के लिए राश्ट्रभाशा का अध्ययन होगा, बाकि सब काम मातृभाशाओं में होंगे। ऐसे दुरात्माओं की देष को जरूरत नहीं, जो मातृभाशाओं को छोड़ दें।‘‘(पत्रकारिता के युग निर्माता- माखनलाल चतुर्वेदी, षिवकुमार अवस्थी)

पत्रकारिता पर सरकारी नियंत्रण एक ऐसा मुददा है, जो हमेषा जीवंत रहा है। सरकारी नियंत्रण के बारे में भी माखनलाल चतुर्वेदी ने अपने विचारों को स्पश्ट करते हुए अपने जीवनी लेखक से कहा था-

‘‘जिला मजिस्ट्रेट मिओ मिथाइस से मिलने पर जब मुझसे पूछा गया की एक अंग्रेजी वीकली के होते हुए भी मैं एक हिंदी साप्ताहिक क्यों निकालना चाहता हूं तब मैंने उनसे निवेदन किया कि आपका अंग्रेजी साप्ताहिक तो दब्बू है। मैं वैसा समाचार पत्र नहीं निकालना चाहता हूं। मैं एक ऐसा पत्र निकालना चाहूंगा कि ब्रिटिष षासन चलता-चलता रूक जाए।‘‘ (पत्रकारिताः इतिहास और प्रष्न- कृश्ण बिहारी मिश्र)

माखनलाल चतुर्वेदी ने पत्रकारिता के ऊंचे मानदंड स्थापित किए थे, उनकी पत्रकारिता में राश्ट्र विरोधी किसी भी बात को स्थान नहीं दिया जाता था। यहां तक कि माखनलाल जी महात्मा गांधी के उन वक्तव्यों को भी स्थान नहीं देते थे, जो क्रांतिकारी गतिविधियों के विरूद्ध होते थे। सरकारी दबाव में कार्य करने वाली पत्रकारिता के विशय में उन्होंने अपनी नाराजगी इन षब्दों में व्यक्त की थी-

‘‘मैंने तो जर्नलिज्म में साहित्य को स्थान दिया था। बुद्धि के ऐरावत पर म्यूनिसिपल का कूड़ा ढोने का जो अभ्यास किया जा रहा है अथवा ऐसे प्रयोग से जो सफलता प्राप्त की जा रही है उसे मैं पत्रकारिता नहीं मानता।‘‘ (पत्रकारिताः इतिहास और प्रष्न- कृश्ण बिहारी मिश्र)

वर्तमान समय में हिंदी समाचारपत्रों को पत्र का मूल्य कम रखने के लिए और अपनी आय प्राप्त करने के लिए विज्ञापनों पर निर्भर रहना पड़ता है, क्योंकि पाठक न्यनतम मूल्य में ही पत्र को लेना चाहते हैं। हिंदी पाठकों की इस प्रवृत्ति से क्षुब्ध होकर माखनलाल जी ने कहा-

‘‘मुफ्त में पढ़ने की पद्धति हिंदी से अधिक किसी भाशा में नहीं। रोटी, कपड़ा, षराब और षौक की चीजों का मूल्य तो वह देता है पर ज्ञान और ज्ञान प्रसाधन का मूल्य चुकाने को वह तैयार नहीं। हिंदी का सबसे बड़ा षत्रु यही है।‘‘(पत्रकारिता के युग निर्माता- माखनलाल चतुर्वेदी, षिवकुमार अवस्थी)

माखनलाल चतुर्वेदी पत्र-पत्रिकाओं की बढ़ती संख्या और गिरते स्तर से भी चिंतित थे। पत्र-पत्रिकाओं के गिरते स्तर के लिए उन्होंने पत्रों की कोई नीति और आदर्ष न होने को कारण बताया। उन्होंने लिखा था-

‘‘हिंदी भाशा का मासिक साहित्य एक बेढंगे और गए बीते जमाने की चाल चल रहा है। यहां बरसाती कीड़ों की तरह पत्र पैदा होते हैं। फिर यह आष्चर्य नहीं कि वे षीघ्र ही क्यों मर जाते हैं। यूरोप में हर एक पत्र अपनी एक निष्चित नीति रखता है। हिंदी वालों को इस मार्ग में नीति की गंध नहीं लगी। यहां वाले जी में आते ही, हमारे समान, चार पन्ने निकाल बैठने वाले हुआ करते हैं। उनका न कोई आदर्ष और उददेष्य होता है, न दायित्व।‘‘

(इतिहास-निर्माता पत्रकार, डा. अर्जुन तिवारी)

पत्रकारिता को किसी भी राश्ट्र या समाज का आईना माना गया है, जो उसकी समसामयिक परिस्थिति का निश्पक्ष विष्लेशण करता है। पत्रकारिता की उपादेयता और महत्ता के बारे में माखनलाल चतुर्वेदी जी ने कर्मवीर के संपादकीय में लिखा था-

‘‘किसी भी देष या समाज की दषा का वर्तमान इतिहास जानना हो, तो वहां के किसी सामयिक पत्र को उठाकर पढ़ लीजिए, वह आपसे स्पश्ट कर देगा। राश्ट्र के संगठन में पत्र जो कार्य करते हैं। वह अन्य किसी उपकरण से होना कठिन है।‘‘(माखनलाल चतुर्वेदी, ऋशि जैमिनी बरूआ)

किसी भी समाचार पत्र की सफलता उसके संपादक और उसके सहयोगियों पर निर्भर करती है। जिसमें पाठकों का सहयोग प्रतिक्रिया की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। समाचारपत्रों की घटती लोकप्रियता के लिए माखनलाल जी ने संपादकों और पाठकों को जिम्मेदार ठहराते हुए लिखा था-

‘‘इनके दोशी वे लोग ही नहीं हैं जो पत्र खरीदकर नहीं पढ़ते। अधिक अंषों में वे लोग भी हैं जो पत्र संपादित और प्रकाषित करते हैं। उनमें अपने लोकमत की आत्मा में पहुंचने का सामर्थ्य नहीं। वे अपनी परिस्थिति को इतनी गंदी और निकम्मी बनाए रखते हैं, जिससे उनके आदर करने वालों का समूह नहीं बढ़ता है।‘‘(पत्रकारिता के युग निर्माता- माखनलाल चतुर्वेदी, षिवकुमार अवस्थी)

भारतीय पत्रकारिता अपने प्रवर्तक काल से ही राश्ट्र और समाज चेतना के नैतिक उददेष्य को लेकर ही यहां तक पहुंची है। वर्तमान समय में जब पत्रकार को पत्रकारिता के नैतिक कर्तव्यों से हटकर व्यावसायिक हितों के लिए कार्य करने में ही कैरियर दिखने लगा है। ऐसे समय में पत्रकारिता के प्रकाषपुंज माखनलाल चतुर्वेदी के आदर्षों से प्रेरणा ले अपने कर्तव्य पथ पर बढ़ने की आवष्यकता है।