Sunday, July 2, 2017

झगड़ा था सीट का, बताया बीफ का, अपराध किसका?

उन मां-बाप के दुर्भाग्य की सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है, जिन्हें मीठी ईद से पहले अपने जिगर के टुकड़े को अंतिम विदाई देनी पड़ी। वह भी तब, जबकि उनके बेटे को मामूली झगड़े में कुछ लोगों ने पीट-पीटकर मार डाला हो। पलवल-मथुरा शटल में सफर कर रहे जुनैद के साथ जो हुआ, वह बर्बरता की हद है। ऐसी घटना और दोषियों की सभी पूर्वग्रहों, धर्म-पंथ के मतभेदों और राजनीतिक हितों से ऊपर उठकर निंदा की जानी चाहिए। लेकिन, इस मामले से भी शायद कुछ लोग सबक नहीं ले रहे और राजनीतिक तूल देने में जुटे हैं। ट्रेन में सीट को लेकर हुए झगड़े को पहले तो बीफ से जुड़ा मामला करार दे दिया गया, जिसे तमाम बड़े मीडिया घरानों ने धड़ल्ले से चलाया। फिर देश में शांति-सौहार्द्र और गंगा-जमुनी तहजीब के कथित झंडाबरदार हमलावरों की मानसिकता को देश के हिंदू समाज की मानसिकता में बदलाव का परिचायक बताने लगे। क्या ऐसा करना सही है?

यदि किसी धर्म को मानने वाले कुछ युवक ट्रेन में किसी घटना को अंजाम देते हैं तो क्या यह उनके पूरे समाज की मानसिकता को दर्शाता है? एक बड़े विदेशी मीडिया हाउस के स्वनामधन्य पत्रकार ने तो इसे हिंदू समाज के सैन्यीकरण की शुरुआत करार दिया है। तो क्या बीते कुछ सालों में एक वर्ग विशेष के युवाओं के इस्लामिक स्टेट से जुड़ने को पूरी कौम का आतंकी होना कहा जा सकता है? क्या रामपुर में एक समुदाय के कुछ युवकों द्वारा दलित युवतियों से बदसलूकी और उसका विडियो बनाने पर उनके पूरे समाज को शोहदा करार दिया जा सकता है? बिल्कुल नहीं। समाज और देश का संचालन सौहार्द्रपूर्ण सोच से होता है और इसे ही मुख्यधारा में जगह दी जानी चाहिए। जैसे किसी कुकर्मी पिता या भाई के रेपिस्ट होने से पूरे समाज को कटघरे में नहीं खड़ा कर सकते, वैसे ही किसी उपद्रवी की हरकत को पूरे समाज का सैन्यीकरण नहीं कहा जा सकता।

सवाल खड़े करता है अवॉर्ड वापसी गैंग का सक्रिय होना?
सीट के झगड़े को बीफ का विवाद करार देना और फिर अवॉर्ड वापसी गैंग का सक्रिय होना तमाम सवाल खड़े करता है। क्या यह एक युवक की दर्दनाक हत्या पर रोटियां सेंकने का प्रयास नहीं है? ऐसा हो सकता है कि इस तरह की प्रॉपेगैंडेबाजी से मुस्लिम समाज का एक तबका उनके साथ आ जाए, जो लोग इसे हिंदुओं की मानसिकता में बदलाव करार दे रहे हैं। लेकिन, इससे अविश्वास की खाई और बढ़ेगी, घटेगी नहीं।

मेरा पैतृक घर रायबरेली में है। गाजियाबाद से अक्सर ट्रेन में आते-जाते वक्त मुरादाबाद और बरेली में अचानक अधिक सवारियों के आने पर सीट को लेकर कई बार कहा-सुनी होने लगती है। ये दोनों शहर मिली-जुली आबादी के हैं और सीट को लेकर झगड़ने वालों में सभी तबकों के लोग होते हैं। साफ है कि यह सिर्फ सीट पाकर आरामयदायक सफर के लालच में होता है। कई बार दूसरे को हड़काने वाला मुस्लिम होता है तो कभी हिंदू और कभी एक ही समुदाय के लोग सीट को लेकर उलझे दिखते हैं। तो क्या ट्रेन में सीट के इस विवाद को हम मुस्लिमों के ‘आतंकी’ होने और हिंदुओं के ‘सैन्यीकरण’ से जोड़ सकते हैं?

सीट के झगड़े को बीफ से जोड़ने वाले माफी मांगेंगे?
दुखद है कि खुद को पत्रकार और बुद्धिजीवी कहलाने वाले कुछ बौद्धिक विलासी लोग इस जुगत में लगे हैं। इससे उनके एसी दफ्तरों के वातानुकूलन पर तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन सीट के झगड़े को बीफ का विवाद बताने से हजारों साल से बसीं बस्तियों में जरूर आग लग सकती है। मैं जुनैद के पिता की भावना को नमन करता हूं, जिन्होंने दुख की घड़ी में भी आगे बढ़कर कहा कि मेरे बेटे का कत्ल बीफ के चलते नहीं, बल्कि सीट के विवाद में हुआ। क्या सीट के झगड़े को बीफ से जोड़ने वाले लोग समाज से माफी मांगेंगे?

(नवभारत टाइम्स डॉट कॉम में प्रकाशित ब्लॉग)

नाम 'पंडित' था तो मार डाला, होते तो क्या करते?

श्रीनगर की जामिया मस्जिद के बाहर राज्य पुलिस के डीएसपी मोहम्मद अयूब पंडित को उन्मादी भीड़ ने सिर्फ इसलिए पीट-पीटकर मार डाला क्योंकि उनके नाम में ‘पंडित’ शब्द शामिल था। वह अपना नाम एम.ए. पंडित लिखते थे। मस्जिद के बाहर सुरक्षा में तैनात पंडित किसी से फोन पर बात कर रहे थे, इस पर उन्मादियों को संदेह हुआ कि वह रिकॉर्डिंग कर रहे हैं। उन पर हमला करने वाली भीड़ ने जब उनके नेमप्लेट पर पंडित लिखा देखा तो वह जानलेवा हो गई और अयूब को वहीं पीटकर मार डाला। ‘पंडित’ शब्द पढ़कर किसी का बेरहमी से कत्ल कर देना बताता है कि कश्मीर घाटी का अलगाववादी तबका किस कदर कट्टर इस्लामिक है। समझा जा सकता है कि जिन लोगों ने सिर्फ एक पंडित शब्द पर अपनी ही सुरक्षा में तैनात अधिकारी को बेदम कर दिया हो, उन्होंने कश्मीरी पंडितों का क्या हाल किया होगा।

यही वजह है कि आज भी देश भर में भटक रहे कश्मीरी पंडित अपने ऊपर हुए अत्याचारों को याद कर सिहर उठते हैं। यह घटना बताती है कि अलगाववादी और उनका अनुसरण करने वाले लोग कथित आजादी के नाम पर इस्लामी निजाम की स्थापना के लिए लड़ रहे हैं, जिसमें किसी कश्मीरी पंडित या सिख के लिए जगह नहीं होगी। यदि उनके नाम का कोई मिल भी जाए तो उसका कत्ल कर दिया जाएगा।

बीते साल हिज्बुल के खूंखार आतंकी बुरहान वानी की मौत के बाद खुद उसकी मां ने स्पष्ट तौर पर कहा था कि उसके बेटे ने आजादी के लिए नहीं, बल्कि इस्लामी निजाम की स्थापना के लिए शहादत दी है। इसके अलावा गाहे-बगाहे इस्लामिक स्टेट के झंडे फहराए जाने और पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगना यह साबित करता है कि कश्मीर में अलगाववादी कौन सी आजादी चाहते हैं।

शब-ए-कद्र की रात हुआ इंसानियत का कत्ल
इंसानियत को रौंदने वाली यह घटना रमजान की 27वीं रात को हुई, जिसे शब-ए-कद्र की मुबारक रात कहा जाता है। इस मौके पर मस्जिदों के साथ खानकाहों और दरगाहों में नमाज व इबादत होती है। लोग अपने-अपने गुनाहों से तौबा करते हैं। माना जाता है कि इस दिन कुरान को आकार मिला था। लेकिन, मस्जिद से नमाज अता करने के बाद निकली उन्मादियों की ‘भीड़’ ने जिस तरह से अयूब का कत्ल कर दिया, वह यह बताने के लिए काफी है कि कश्मीर घाटी की मस्जिदों पर अलगाववादी किस तरह से पैठ बना चुके हैं और वहां से क्या संदेश देने की कोशिश की जा रही है।

कहां हैं गंगा-जमुनी तहजीब की वकालत करने वाले?
इस देश की साझा हिंदू-मुस्लिम संस्कृति को गंगा-जमुनी तहजीब कहने वाले अक्सर देश में सेक्युलरिज्म की बात करते हैं। लेकिन, इस घटना पर ऐसे लोगों की चुप्पी बताती है कि वे गंगा-जमुनी तहजीब के किस स्वरूप को लागू करना चाहते हैं। क्या वह ऐसा सेक्युलरिज्म चाहते हैं जिसमें अयूब के नाम के साथ पंडित जुड़ा हो तो उन्हें कुचलकर मार दिया जाए। उल्लेखनीय है कि पूरे देश की तरह जम्मू-कश्मीर की बड़ी मुस्लिम आबादी पीढ़ियों पहले हिंदू धर्म से ही मतांतरित हुई है।

लेकिन, इस विरासत पर गर्व करने वाले बहुत से ऐसे लोग हैं, जो अब भी अपने पूर्वजों के नाम से जुड़े हैं। अयूब पंडित भी उनमें से एक थे, तो मौजूदा मुस्लिम पहचान के साथ ही खुद को पूर्वजों के नाम से भी जोड़े हुए थे। लेकिन, इस्लामी निजाम की स्थापना का सपना देखने वाले उन्मादियों को भला यह कहां मंजूर था। उससे भी दु:खद है देश भर में सेक्युलरिज्म की वकालत करने वाले राजनीतिक दलों, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों की चुप्पी। यह चुप्पी उनके राजनीतिक हितों को साध सकती है, लेकिन सेक्युलरिज्म की कीमत पर ही ऐसा होगा।

कश्मीर की मस्जिदें क्यों बनीं अलगाववाद का केंद्र?
1990 के दशक में कश्मीरी पंडितों और सिखों के खिलाफ हिंसा का ऐलान वहां की मस्जिदों पर लगे लाउडस्पीकरों से ही होता था। इस ऐलान के बाद उन्मादियों की ‘भीड़’ हजारों सालों से साथ रह रहे पड़ोसियों के कत्ल कर देती थी। महिलाओं के रेप करती थी। इन दिनों एक बार फिर यह दौर देखने को मिल रहा है। बीते कई सालों से हर साल ईद की नमाज के बाद ईदी के तौर पर उन्मादी उपद्रव मचाते हैं। ऐसे में राज्य सरकार को इसके लिए प्रयास करने चाहिए कि कश्मीर घाटी की मस्जिदें अलगाववादियों का केंद्र न बनें। वहां से शब-ए-कद्र की मुबारक रात पर शांति का संदेश ही निकले, न कि मस्जिद से निकल उन्मादी ‘भीड़’ फिर किसी अयूब पंडित को मौत के घाट उतार दे।

(नवभारत टाइम्स डॉट कॉम में प्रकाशित ब्लॉग)

मुस्लिम समाज में कब होगा आंबेडकर का जन्म?

तीन तलाक पर इन दिनों तीखी बहस चल रही है। टीवी ऐंकर और भाजपाई प्रवक्ता मौलवियों पर जोरदार हमले कर रहे हैं और साथ में बैठी पीड़िताएं अपना दर्द बयां कर रही हैं। इनके जवाब में मौलवियों और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसी संस्थाओं से जुड़े लोगों के तर्क हैं- हिंदुओं में तलाक ज्यादा होते हैं, तीन तलाक न हो तो महिला ही मार दी जाए और यह शिगूफा इस्लाम के खिलाफ रचा गया है। पीड़ित महिलाओं को वे उठाकर लाया गया बता रहे हैं। ये और ऐसे तमाम तर्क बताते हैं कि वे भीतर से कितने कमजोर हैं और कैसे अपनी नाइंसाफियों के जवाब में दूसरे लोगों की गलत हरकतों का हवाला दे रहे हैं।

समस्या की जड़ यहीं है कि पैनल में बैठे कुछ लोग सीधे मौलवियों पर हमला बोल रहे हैं और जवाब में वे हिंदुओं में जारी कुरीतियों का हवाला दे रहे है। इस तरह मौलवी तीन तलाक के विरोध को मुस्लिम कौम के खिलाफ साजिश बताने की कोशिश में हैं। हकीकत यह है कि मनुष्य का स्वभाव है कि उसे यदि कोई दूसरा उसकी खामियां बताता है तो वह आमतौर पर उसे गलत ढंग से लेता है। उसे लगता है कि उनकी कौम और समाज को नीचा दिखाने या उपहास के लिए ऐसा किया जा रहा है। अब तक किसी भी समाज में जो बदलाव हुए हैं, आमतौर पर उनके भीतर से ही आवाज उठने पर हुए हैं। तीन तलाक पर मुस्लिम महिलाएं मुखर हुई हैं तो लगता है कि बदलाव होगा, लेकिन इसे मुकम्मल करने के लिए किसी आंबेडकर की जरूरत है। वरना बहस एक दूसरे पर कीचड़ उछालने से आगे नहीं बढ़ेगी और हालात जस के तस घुटन भरे रहेंगे।

आज के दौर में देखें तो मुस्लिम समाज की नुमाइंदगी और उनके हकों की रक्षा के नाम पर राजनीति करने वाले तमाम नेता दिखते हैं। असल में ये मुस्लिम नेता ही उनके भीतर सुधार की पहल कर सकते हैं। लेकिन, ये लोग मदरसों को फंडिंग, कब्रिस्तानों की चारदीवारी, लाउडस्पीकर और बीफ बैन जैसे मुद्दों से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। ऊपरी स्तर पर ऐसे मुस्लिम नेताओं को अभाव दिखता है, जो अंग्रेजी शिक्षा, सेक्युलरिजम और राष्ट्र के प्रति समर्पण में पहली कतार में आने की वकालत करते दिखें। इसकी बजाय वंदे मातरम का विरोध, सेना का विरोध, मोदी-योगी को गालियां और पीड़ित महिलाओं का अपमान किया जा रहा है। यदि ऐसा रहा तो सुधार की गुंजाइश नहीं है, बल्कि आने वाले दिनों में समाज का पिछड़ापन और बढ़ ही सकता है।

इतिहास से सीखें तो मिलेगी मदद
सर सैयद अहमद खां ने 1877 में ऑक्सफर्ड और कैंब्रिज विश्वविद्यालयों की तर्ज पर अलीगढ़ में ऐंगलो ऑरियंटल कॉलेज की स्थापना की थी। यही बाद में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के तौर पर स्थापित हुआ। वह पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने मुस्लिमों के विकास के लिए अंग्रेजी की शिक्षा की वकालत की थी। हालांकि द्विराष्ट्र सिद्धांत की वकालत करने वाले भी वह पहले व्यक्ति थे, जिसके बारे में फिर बात करेंगे। लेकिन मुस्लिम समाज के लिए उनके प्रयासों का बड़े पैमाने पर असर उस वक्त दिखा था और आजादी से पूर्व भारत में मुस्लिमों की शिक्षा का औसत करीब-करीब हिंदुओं के समान ही था। लेकिन, आजादी के बाद मुस्लिम समाज इस स्थिति को बरकरार रखने में नाकामयाब रहा तो इसमें तत्कालीन सरकारों के अलावा उनके अपने नेतृत्व का बड़ा योगदान रहा। सैयद अहमद खां ने जिस दौर में मुस्लिमों की आधुनिक शिक्षा की वकालत की थी, तब हिंदू समाज में इस बारे में बहुत विचार नहीं था। लेकिन, आज मुस्लिम समाज में एक बड़ा तबका परंपरागत धार्मिक शिक्षा ही ले रहा है और यही उसके पिछड़ेपन की मूल वजह है। लेकिन, इसमें किसी भी तरह के सुधार की कोशिश को इस्लाम पर हमले की तरह पेश किया जाता है।

एक आंबेडकर चाहिए बदलाव के लिए
भीमराब आंबेडकर ने दलितों के उत्थान के लिए नारा दिया था, ‘लड़ो लड़ाई पढ़ने को, पढ़ो समाज बदलने को।’ आज दलितों में उत्थान की जो स्थिति दिखती है, उसमें सबसे बड़ा योगदान आंबेडकर का ही है। लेकिन, यह उत्थान ‘दलित खतरे में हैं’ के नारे या फिर परंपरागत कामों को जारी रखकर नहीं आया है। इस सुधार के लिए आंबेडकर ने दलितों की शिक्षा, महिलाओं के अधिकारों और समाज में बराबरी के स्थान की वकालत की थी। मुस्लिम समाज को आंबेडकर से सीखते हुए महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने की पहल करनी चाहिए। इसके लिए उन्हें एक आंबेडकर की जरूरत है, जो उनके बीच से ही हो सकता है। फिलहाल तो इसकी कमी दिखती है। जितनी जल्दी मुस्लिम समाज में आंबेडकर उभरेंगे उतना ही अच्छा होगा। कोई भाजपाई प्रवक्ता, टीवी के ऐंकर, अखबारों के लेखक उनकी समस्या का समाधान नहीं कर सकते।

(नवभारत टाइम्स डॉट कॉम में प्रकाशित ब्लॉग)

सेक्युलरों को छोड़नी होगी मुस्लिम केंद्रित राजनीति?

5 राज्यों के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में बहुमत हासिल कर लिया है। पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में भी वह कांग्रेस से आगे निकली है। खासतौर पर यूपी में बीजेपी का 300 सीटों के आंकड़े पर पहुंचना राजनीतिक विश्लेषकों को चौंकाने वाला है, लेकिन सेक्युलरिज्म के नाम पर लड़ने वाले दलों को यह सबक भी सिखाता है। पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हुए इस चुनाव में यूपी के मतदाताओं ने जिस तरह से बीजेपी के पक्ष में रुख किया है, उससे साबित होता है कि कांग्रेस-एसपी और बीएसपी का सेक्युलर बनाम सांप्रदायिक का मुद्दा नहीं चला। कह सकते हैं कि बीजेपी की जीत और अन्य लोगों की हार का रहस्य इसी में छिपा है।

2002 से आगे नहीं बढ़ सके विपक्षी दल
यदि हम कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की रणनीति देखें तो वह बार-बार सांप्रदायिक ताकतों को हराने और मुस्लिम मतदाताओं से साथ देने की अपील कर रहे थे। गुजरात दंगों के हवाले दिए जा रहे थे, लेकिन इन दलों को सोचना होगा कि घड़ी को रोक देने से वक्त नहीं थम जाता। 2002 से 2017 तक नरेंद्र मोदी और बीजेपी ने लंबा सफर तय किया है। यही वजह है कि वह राम मंदिर और धारा 370 जैसे मुद्दे को बहुत तूल नहीं देती है, इसके बाद भी उसे बड़ा समर्थन मिलता है। कह सकते हैं कि मोदी के नेतृत्व में बीजेपी को मिलने वाले समर्थन में हिंदुत्ववादियों के अलावा बड़ा हिस्सा उन लोगों का है, जो विकास की चाह रखते हैं। यानी पीएम नरेंद्र मोदी और बीजेपी ने अपनी विकास की छवि गढ़ने में सफलता पाई है, जबकि कांग्रेस, एसपी और बीएसपी 2002 से आगे नहीं बढ़े हैं।

उपेक्षित जातियों को दिखी बीजेपी में संभावना
बीजेपी ने विकास को मुद्दा बनाते हुए उन जातियों को साधने का काम किया है, जिन्हें एसपी, बीएसपी और कांग्रेस हाशिये पर रख रहे थे। कुम्हार, लुहार, बढ़ई, कुर्मी, मल्लाह, कोरी, स्वर्णकार और अन्य कम संख्याबल वाली जातियों को बीजेपी ने अपनी ओर लुभाने का काम किया है। इसकी वजह यह है कि ये सभी जातियां बीते 20 सालों से एसपी और बीएसपी में अपने वजूद को तलाश रही थीं। शायद यही वजह है कि इन जातियों ने केंद्र में ओबीसी का चेहरा बने पीएम मोदी और राज्य में केशव प्रसाद मौर्य में अपने लिए संभावनाएं देखीं।

नरेंद्र मोदी का टारगेट करने का हुआ नुकसान
यदि विपक्ष के नेता के तौर पर मुझे रणनीति बनानी हो तो मेरा फोकस अपनी पॉजिटिव कैंपेनिंग करने पर होगा। इससे उलट यूपी समेत देश भर में विपक्षी दल नरेंद्र मोदी को निशाना बनाते रहे हैं। आमतौर पर देखा गया है कि यदि किसी लोकप्रिय नेता पर विपक्षी हमला करते हैं तो उसकी लोकप्रियता में इजाफा हो जाता है। ऐसे में विपक्षी दलों को पीएम मोदी पर निशाना साधने की बजाय अपनी उपलब्धियों और अजेंडे का बखान करने पर ध्यान देना होगा।

अल्पसंख्यकवाद पड़ गया भारी
गैर-बीजेपी दल लंबे समय से मुस्लिम और जातिगत समीकरण को साधकर जीत का गणित बिठाती रही हैं। समाजवादी पार्टी मुस्लिम और यादव गठजोड़, बीएसपी मुस्लिम और दलित गठजोड़ के जरिए राजनीति करती रही हैं। लेकिन ऐसी राजनीति तभी सफल होती है, जब बहुसंख्यक समाज के बड़े तबके का समर्थन हो। जमीनी हकीकत यह है कि कांग्रेस और एसपी के प्रति बहुसंख्यक समाज में यह संदेश गया है कि ये दल अल्पसंख्यकवाद की राजनीति करते हैं। वहीं, मायावती की बीएसपी भी इसी तरह की राजनीति के चलते अपने कोर वोट बैंक को भी जोड़ने में असफल रही है। कह सकते हैं कि आने वाले वक्त में इन दलों को अपनी अल्पसंख्यकवादी छवि को तोड़ने के लिए काम करना होगा।

(नवभारत टाइम्स डॉट कॉम में प्रकाशित ब्लॉग)

इंसानियत से परे यह कैसी कश्मीरियत!

भारत की आजादी के 70 साल होने को हैं। बंटवारे के समय उत्पीड़न के चलते पश्चिमी पाकिस्तान से भागकर जम्मू-कश्मीर आए शरणार्थियों को आज भी अपने अस्तित्व की तलाश है। मौजूदा बीजेपी-पीडीपी सरकार ने उन्हें मामूली राहत देते हुए आवास प्रमाण पत्र जारी करने का फैसला लिया है ताकि वे केंद्रीय संस्थानों और अर्ध सैनिक बलों में नौकरियों के लिए आवेदन कर सकें। ध्यान रहे कि अब भी उनका स्टेटस नहीं बदलेगा और वह प्रदेश विधानसभा के चुनाव में मतदान नहीं कर सकेंगे। सूबे के विभागों में निकलने वाली नौकरियों के भी वे हकदार नहीं होंगे। इन 19 हजार 960 परिवारों के करीब 85 हजार लोगों के पास आम चुनाव में मतदान का अधिकार है, लेकिन जम्मू-कश्मीर का संविधान विधानसभा चुनाव में उन्हें वोट डालने की अनुमति नहीं देता। विधानसभा और निकाय चुनावों में वही व्यक्ति मतदाता हो सकता है, जो वहां का मूल निवासी हो।

इन 85 हजार लोगों को सिर्फ केंद्र की नौकरियों के आवेदन के लायक दर्जा देने पर जम्मू-कश्मीर की घाटी में कोहराम मचा है। कश्मीरियत और इंसानियत की दुहाई देने वाले कट्टरपंथी इन बेसहारा लोगों को मामूली सहारा दिए जाने के विरोध में सूबे में आग लगाने को तैयार हैं। घाटी बंद का ऐलान किया जा रहे है और कहा जा रहा है कि इससे प्रदेश का जनसंख्या संतुलन बिगड़ जाएगा। इसके उलट इन अलगाववादियों ने हजारों विदेशी मुस्लिम शरणार्थियों को घाटी में पनाह दे रखी है। निश्चित तौर पर यह इंसानियत भी है, लेकिन क्या यह सिर्फ इस्लाम को मानने वालों के लिए ही जगती है। आखिर, जो हमदर्दी सुदूर बर्मा से आए मुस्लिमों के लिए है, वही बेसहारा पश्चिम पाक से आए शरणार्थियों के लिए क्यों नहीं दिखती।

हुर्रियत कॉन्फ्रेंस और नैशनल कॉन्फ्रेंस ने इस मुद्दे पर बवाल काटना शुरू कर दिया है। लेकिन, आज तक रोहिंग्या मुस्लिमों की घाटी में मौजूदगी को लेकर एक पत्थर तक नहीं उछला। क्या कश्मीरियत सिर्फ मुस्लिमों से हमदर्दी सिखाती है और हिंदुओं से दुश्मनी? अलगाववादियों के सुर में सुर मिला रहे अब्दुल्ला परिवार को भी इन सवालों के जवाब देने होंगे। यदि कश्मीरियत के नाम पर यूं ही शरणार्थियों और बाशिदों के समुदायों को देखकर ही नीतियां बनेंगी तो फिर प्रदेश की समस्याएं हल नहीं होंगी।

अटल बिहारी वाजपेयी ने कश्मीर की नीति के तहत इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत का त्रिसूत्रीय फॉर्म्युला दिया था। 70 साल में पहली बार प्रदेश की सरकार ने इस नीति के पहले फॉर्म्युले, इंसानियत के तहत इन शरणार्थियों को एक पहचान देने का प्रयास किया है। यदि अलगाववादी और अब्दुल्ला परिवार इसी तरह इंसानियत का विरोध करते रहे तो प्रदेश में सांप्रदायिक उन्माद तो फैल सकता है, लेकिन जम्हूरियत और कश्मीरियत पर कभी बात नहीं हो सकेगी।

शरणार्थियों में 80 फीसदी दलित
पश्चिमी पाकिस्तान से आए इन शरणार्थियों में करीब 80 फीसदी संख्या दलित समुदाय के लोगों की है। लेकिन, आज भी भारत जैसे आजाद मुल्क में ये लोग गुलामों की जिंदगी जी रहे हैं। पूरे देश में आपसी रंजिश और अन्य व्यक्तिगत मुद्दों पर झगड़ों में दलित ऐंगल की तलाश करने वाले नेता आखिर यहां क्यों मौन साधे हैं। गुजरात के ऊना में दलितों का उत्पीड़न निश्चित तौर पर चिंता की बात है, लेकिन जम्मू-कश्मीर में उन्हें गुलाम बनाकर रखना कैसे सहन किया जा सकता है।

(नवभारत टाइम्स डॉट कॉम में प्रकाशित ब्लॉग)

'गांधी मार्ग' के सच्चे पथिक का चले जाना

विकास क्या है? उन्होंने बातचीत के दौरान जब यह सवाल पूछा तो मैंने औपचारिक शिक्षा से लेकर समाज और मीडिया से विकास के बारे में जो समझा था, वह उड़ेल दिया। सब गलत साबित हुआ और विकास की जो अवधारणा उन्होंने बताई, मुझे वही सही जान पड़ी और आज भी ऐसा ही लगता है। वह शख्स कोई और नहीं, तालाबों वाले अनुपम मिश्र थे। सोमवार को जब उनके देहांत की खबर सुनी तो अवाक रह गया। तमाम पर्यावरण प्रेमियों और गांधी के सिद्धांतों में आस्था रखने वाले लोगों के लिए यह अपने ही किसी हिस्से के टूट कर गिर जाने जैसा है। गांधी शांति प्रतिष्ठान से कुछ प्लॉट छोड़कर प्रवासी भवन नाम की इमारत है। 2012 की गर्मियों की बात है, मैं वहीं जम्मू-कश्मीर अध्ययन केंद्र के दफ्तर में बैठता था। इसी बीच मेरा नया शौक हो गया था, दोपहर में अनुपम जी के पास जाकर बैठना। एक करीबी मित्र ने उनसे एक बार मिलवाया था, उनसे मिलने के लिए अपॉइंटमेंट की जरूरत नहीं थी। बस उनके पास वक्त हो और आपको मिल ही जाएगा। हर पर्यावरणप्रेमी शख्स को वह अपने से लगते थे।

उनसे मिलने से पहले ही उनकी अनुपम कृति ‘आज भी खरे हैं तालाब’ पढ़ चुका था। लेकिन, जब उनसे मिला तो पता चला कि इस पुस्तक को लिखने वाले सिर्फ लिक्खाड़ नहीं है, उनकी जिंदगी ही तालाबों को बचाने में रिसी है। बात-बात में मैंने बताया कि उनकी पुस्तक मैंने पढ़ी है और मुलाकात की इच्छा हुई तो आ गया। कुछ देर की बातचीत के बाद उन्होंने मुझे अपनी एक नई कृति ‘ना जा स्वामी परदेसा’ दी, जो उत्तराखंड की पृष्ठभूमि पर है। चलते हुए मैंने उनसे मोबाइल नंबर की मांग की तो पता चला वह इस उपकरण का इस्तेमाल ही नहीं करते। कहा, ‘मोबाइल नहीं रखता, जहां बैठे हैं आप, यही मेरा पता है। जब इच्छा हो आ जाना।’ गांधी शांति प्रतिष्ठान ही उनका आवास था।



‘गांधी मार्ग’ के सच्चे पथिक
यूं तो वह ‘गांधी मार्ग’ के संपादक थे, लेकिन सही मायनों में वह गांधी की राह के सच्चे पथिक थे। गांधी जी के हिंद स्वराज और अनुपम जी की जीवनशैली में बहुत समानताएं थीं। उन्होंने वातानुकूलित कमरों में बैठकर ओजोन की परत में छेद को लेकर चिंताएं जाहिर नहीं कीं। वे झोला उठाकर सुदूर इलाकों में बदलाव के लिए निकले और दिल्ली में भी विकास का सही अर्थ समझाते रहे। चाहे आसमान से बरसा पानी हो या जमीन से निकला जल, उसे बचाए रखने की हमेशा सीख देते रहे। कहते थे- रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। यह सूक्ति भी पानी की कमी के अनुभव से ही निकली होगी।

विकास के ‘अनुपम’ मायने
विकास के बारे में कहते थे, ‘यह एक ऐसी बारात है, जो अपने पीछे सिर्फ कूड़े का ढेर, गरीबी, असमानता और मलिन बस्तियां छोड़ रही है।’प्रकृति के संरक्षण के बिना विकास को वह बेमानी और अस्थायी मानते थे। यह सिर्फ उनकी राय नहीं थी, बल्कि जैसा वह कहते थे, वैसा ही जीवन उन्होंने जिया। लोग कहते हैं कथनी और करनी एक जैसी होनी चाहिए, लेकिन मैं मानता हूं कि उनकी करनी, उनकी कथनी से कहीं आगे थी। उन्होंने अपनी बात बाद में कही, पहले कर दिखाया।

सेल्फ मार्केटिंग से कोसों दूर
टीवी स्क्रीन पर छाने और अखबारों की सुर्खियों में आने की लालसा उनसे कोसों दूर थी। सेल्फ मार्केटिंग के इस दौर में क्या खोया और क्या पाया, इसकी परवाह किए बिना इस तरह से अपने मिशन और विजन के प्रति समर्पित रहना, कोई अनुपम ही कर सकता है।

विनम्र श्रद्धांजलि…

(नवभारत टाइम्स डॉट कॉम में प्रकाशित ब्लॉग)

इससे अच्छा तो दलित ईसाई 'घर वापसी' कर लें

‘दलित ईसाइयों को बड़े पैमाने पर छुआछूत और भेदभाव का शिकार होना पड़ता है। देश भर के कैथलिक चर्च में 5,000 से ज्यादा बिशप हैं, लेकिन इनमें दलित ईसाइयों की संख्या महज 12 है।’ यह किसी दक्षिणपंथी नेता का दावा नहीं है, बल्कि भारत के कैथलिक चर्च की स्वीकारोक्ति है। इतिहास में पहली बार इंडियन कैथलिक चर्च ने यह स्वीकार किया है कि जिस छुआछूत और जातिभेद के दंश से बचने को दलितों ने हिंदू धर्म को त्यागा था, वे आज भी उसके शिकार हैं। वह भी उस धर्म में जहां कथित तौर पर उनको वैश्विक ईसाईयत में समानता के दर्जे और सम्मान के वादे के साथ शामिल कराया गया था।

देश में कैथलिक चर्च के कुल 1.9 करोड़ सदस्य हैं, इनमें से 1.2 करोड़ दलित ईसाई यानी हिंदू धर्म से बरगलाकर लाए गए लोग हैं। कैथलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया द्वारा ‘पॉलिसी ऑफ दलित इम्पावरन्मेंट इन द कैथलिक चर्च इन इंडिया’ नाम से प्रकाशित 44 पेज की रिपोर्ट के मुताबिक, ‘चर्च में दलितों से छुआछूत और भेदभाव बड़े पैमाने पर मौजूद है। इसे जल्द से जल्द खत्म किए जाने की जरूरत है।’ यह रिपोर्ट शायद उन लोगों की आंखें खोल सके, जो ईसाई मिशनरियों के धर्मांतरण को न देखने के लिए ‘गांधारी’ बने बैठे हैं। वामपंथी और कुछ दलित चिंतक अक्सर कहते हैं कि जो हिंदुत्व दलितों को बराबरी नहीं दे सकता, उससे निकल जाना ही बेहतर है। इस रिपोर्ट के बहाने उन्हें यह बताना चाहिए कि आखिर वे हिंदुत्व से निकलकर भी दलदल में क्यों हैं?

अक्सर ऐसे बुद्धिजीवी दो अलग-अलग शब्दों, दलित और हिंदू, का इस्तेमाल करते हैं। इसके लिए उनका तर्क है कि हिंदू तो सिर्फ सवर्ण हैं और दलितों को अधिकार ही नहीं तो हिंदू कैसे? अब वे बताएंगे क्या कि ईसाई तो कुछ गिने-चुने बिशप हैं, और दलित तो दलित ही हैं। कैथलिक चर्च की रिपोर्ट में कहा गया है कि दलितों के साथ अन्याय हो रहा है और चर्च के भी तरह बदलाव की जरूरत है ताकि उन्हें पर्याप्त अधिकार दिए जा सकें। आजादी के 70 साल बीत गए और धर्मांतरण उससे पहले से भी जारी है, आखिर अब तक दलितों को ईसाईयत के हक क्यों न मिल सके। यदि उन्हें ईसाई धर्म में भी छुआछूत और भेदभाव के साथ ही जीना है तो फिर हिंदू धर्म में ‘घर वापसी’ करने का विकल्प कहां गलत है? यहां कम से कम उन्हें आरक्षण तो मिलेगा।

चर्च की नीयत में खोट और नेताओं को चाहिए सिर्फ वोट
इसी रिपोर्ट में कैथलिक चर्च ने दोहराया है कि हम लंबे समय से दलित ईसाइयों को आरक्षण दिलाने के लिए लड़ रहे हैं और यह उन्हें मिलना ही चाहिए। रिपोर्ट में सुप्रीम कोर्ट की ओर से दलित ईसाइयों को आरक्षण दिए जाने की मांग को खारिज किए जाने की भी आलोचना की गई है। वामपंथी चिंतक और चर्च के पैरोकार कहते हैं कि ईसाई मिशनरी का उद्देश्य सिर्फ सेवा करना है। यदि ऐसा है, तो मिशनरी और चर्च उन्हें ईसाई धर्म में भेदभाव और छुआछूत के साथ गुलाम क्यों बनाए हुए हैं? उन्हें हिंदू धर्म में वापसी के लिए प्रेरित क्यों नहीं करते, जहां उन्हें आरक्षण मिल सके और स्वधर्म में बराबरी का हक भी। आखिर ईसाई के तौर पर ही उन्हें दलित बनाए रखने की जिद क्यों? क्या किसी चिंतक के पास है इसका जवाब? राजनीतिक दलों से इस बारे में कुछ उम्मीद करना बेमानी होगा, जिन्हें सिर्फ दलितों का वोट चाहिए। भले ही नवबौद्ध बनकर दें, दलित ईसाई के तौर पर दें या फिर इस्लाम की निचली कड़ी से जुड़कर।


धर्मांतरण अब भी जारी है, अब किसकी बारी है?
देश का मीडिया और नीति-निर्माण के पदों पर दशकों से बैठे रहे वामपंथी चिंतक ईसाई मिशनरियों द्वारा धर्मांतरण किए जाने की हकीकत को नकारते रहे हैं। लेकिन, इस धर्मांतरण और धर्मांतरण से राष्ट्रांतरण के स्मारक आपको गांवों से लेकर शहरों तक में देखने को मिल जाएंगे। एक उदाहरण मैं दे रहा हूं, जब चाहे देख लीजिएगा। दिल्ली से लखनऊ को जोड़ने वाले नैशनल हाईवे-24 के पास गाजियाबाद के विजय नगर इलाके में कुछ वर्ष पूर्व तक कृष्णा नगर नाम की एक बस्ती थी। आज इसे क्रिश्चियन नगर बागू के नाम से जाना जाता है। बस्ती आज भी दलितों की ही कहलाती है, लेकिन अब यहां हिंदू नहीं रहते बल्कि मिशनरी की फसल लहलहाती है। मिशनरी में काम करने वाले लोग खुद इनके बीच नहीं रहते। पॉश कॉलोनियों से सुबह इन्हें बरगलाने आते हैं और शाम तक स्कूल और चर्च में कथित सेवा करते हैं और लौट जाते हैं। कृष्णा नगर बागू से क्रिश्चियन नगर बने इस इलाके के दलित अब भी दलित ही हैं, उनकी हालत नहीं बदली है। लेकिन मिशनरी के लोगों ने इनके दिलोदिमाग में हिंदू समाज और भारत के प्रति पहले की अपेक्षा नफरत का भाव जरूर पैदा कर दिया है।

(नवभारत टाइम्स डॉट कॉम में प्रकाशित ब्लॉग)

Saturday, November 26, 2016

…तो यूं मैं काफिर से मुसलमान हो गया!

सुबह के करीब 4 बजे थे, मैं नाइट शिफ्ट में ऑफिस में था। इस बीच एक  न्यूज वेबसाइट पर मैं गया तो मुख्य खबर से ठीक नीचे एक विज्ञापन देखा, जो इस बात का प्रचार था कि आप कैसे मुसलमान बन सकते हैं और इसके क्या फायदे हैं। उत्सुकता में मैंने इस पर (IslamReligion.com) क्लिक किया तो वहां मुझ जैसे विधर्मियों का इस्लाम में धर्मांतरण कराने के लिए 24 घंटे ऑनलाइन चैट सेवा थी। मैं चैटिंग में जुट गया, मैंने पूछा कि मैं इस्लाम अपनाना चाहता हूं, क्या करना होगा। इसके जवाब में उधर से कहा गया, मैं बहुत खुश हूं कि आपने इस्लाम अपनाने के बारे में सोचा, इससे आप नरक की आग से बाहर आ सकेंगे।
इसके बाद चैट ही उन्होंने मेरा नंबर पूछा और कॉल किया। उन्होंने इस्लाम में ईमान लाने के लिए मुझसे 'ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह' दोहराने को कहा। मैंने दोहराया, इसके बाद उस व्यक्ति ने मुझे बधाई दी और कहा कि ब्रदर अब आप मुसलमान हो गए हैं। मैंने उससे पूछा कि आप कॉल कहां से कर रहे हैं तो जवाब था, सऊदी अरब से। (इस पूरी बातचीत की कॉल रिकॉर्डिंग मेरे पास मौजूद है) तो दोस्तों इस तरह मैं सुबह-सुबह हिंदू से मुसलमान हो गया। यही नहीं पूरी बातचीत के बाद धर्मांतरण का गोरखधंधा चलाने वाली इस वेबसाइट की ओर से मुझे ई-मेल पर कुछ सामग्री भेजकर मुझे बताया गया कि अब आपके सार पाप धुल जाएंगे और आप जन्नत में पहुंचेंगे। 

इसके अलावा एक और वेबसाइट  www.newmuslims.com पर जाकर मुझे अध्ययन के लिए कहा गया ताकि मैं इस्लाम में ईमान ला सकूं। इस वेबसाइट पर यह बताया गया है कि आपको मुसलमान बनने से किस तरह फायदे होंगे। इसके अलावा तमाम जहरीले सिद्धांत भी बताए गए हैं, जिनका अनुसरण करते हुए पक्के मुसलमान बन सकते हैं और पापियों (दूसरे धर्म के लोग) के संसार से बाहर आ सकते हैं।

जिहादी तैयार करने का विषबीज
इसके अलवाा इस वेबसाइट में जिहाद के बारे में भी बताया गया है कि इसका अर्थ क्या होता है। इस वेबसाइट के अनुसार दो तरह के जिहाद होते हैं, एक रक्षात्मक और दूसरा आक्रामक। रक्षात्मक जिहाद वह है, जब मुस्लिम देश या कौम पर हमले के जवाब में हथियार उठाएं। आक्रामक जिहाद का अर्थ है, आप पापियों द्वारा शासित देश पर कब्जे के लिए हमले करें। दोनों को सही माना गया है। यही नहीं इस वेबसाइट पर ऐसे तमाम लोगों के उदाहरण दिए गए हैं, जो नए मुस्लिम बने हैं। इन लोगों में भारत और विदेशों में बसे तमाम हिंदुओं के भी शामिल होने का दावा किया गया है।

इससे ही तो नहीं भटक रहे भारत के युवा?
बीते कुछ सालों में महाराष्ट्र, केरल और तमिलनाडु जैसे कई राज्यों से मुस्लिम युवाओं के इस्लामिक स्टेट में शामिल होने की खबरें आई हैं। इनमें हिंदू और ईसाई धर्म से ताल्लुक रखने वाले भी कुछ युवा थे, जिन्होंने धर्मांतरण किया और फिर इस्लामिक स्टेट में शामिल हो गए। (पढ़ें रिपोर्ट: http://indianexpress.com/article/india/india-news-india/five-of-15-kerala-missing-had-converted-to-islam-just-a-year-ago-2904344/) ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या ऐसी ऑनलाइन सामग्री से ही ये लोग आईएस जैसे आतंकी संगठनों में शामिल नहीं हो रहे?

सबसे बड़ा सवाल तो सरकार से ही है?
किसी भी समाज का हर व्यक्ति धर्म को लेकर समान चेतना नहीं रखता। जन्नत के सपने, सारे पाप धुलने के वादे और तमाम हसीन वादों के चलते सामान्य समझ वाले युवाओं के भटकने की खासी संभावना रहती है।देश के गृह मंत्री राजनाथ सिंह कई बार दोहरा चुके हैं कि इस देश के मुसलमान आईएस से कतई प्रभावित नहीं हैं। लेकिन, धर्मांतरण और जिहाद की यह ऑनलाइन मंडियां क्या उन्हें इस प्रभाव में लेने का काम नहीं कर रहीं हैं? यदि सरकार वाकई माहौल सुधारना चाहती है तो उसे इस पर लगाम कसनी ही चाहिए।

जानें, क्या कहता है संविधान
संविधान में धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार का जिक्र अनुच्छेद 25-28 में किया गया है। आमतौर पर ऐसे लोग देश के संविधान में धर्म के प्रचार की छूट का हवाला देते हुए अपना बचाव करते हैं। यह ध्यान देने की बात है कि संविधान में सिर्फ धर्म के प्रचार की बात की गई है, लेकिन धर्मांतरण को गलत मानते हुए इसे किसी व्यक्ति के विवेक के अधिकार का हनन करार दिया गया है।  संविधान के अनुसार, देश का कोई आधिकारिक राज्य धर्म नहीं है और राज्य द्वारा सभी धर्मों के साथ निष्पक्षता और तटस्थता से व्यवहार किया जाना चाहिए। अनुच्छेद 25 सभी लोगों को विवेक की स्वतंत्रता तथा अपनी पसंद के धर्म के उपदेश, अभ्यास और प्रचार की स्वतंत्रता की गारंटी देता है।

क्या कहता है कानून?
कानून के जानकारों का कहना है कि इस तरह के प्रचार को लेकर किसी तरह का लीगल ऐक्शन लिया जाना मुश्किल है। इसकी वजह यह है कि भारतीय दंड संहिता में इस बारे में स्पष्टता नहीं है। हां, यदि कोई आपके धार्मिक विश्वास और मान्यता को ठेस पहुंचाता है तो आप केस दर्ज करा सकते हैं। सीधे तौर पर यदि कुछ न कहा गया हो तो ऐसा साबित करना मुश्किल होता है। यही वजह है कि हाल ही में इस्लामिक धर्म उपदेशक जाकिर नाइक के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई को लेकर जानकारों की राय बंटी हुई है।

साइबर रैडिकलाइजेशन रोकने को जरूरी है ठोस साइबर लॉ 
देश में साइबर लॉ के जानकार कहे जाने वाले पवन दुग्गल कहते हैं, 'बीते कुछ सालों में इंटरनेट पर हाइपर रैडिकल कॉन्टेंट की बाढ़ आ गई है। लेकिन, इसे रोकने में हमारा आईटी कानून असफल है। इसकी वजह यह है कि आईटी ऐक्ट में इसे लेकर किसी स्पष्ट प्रावधान का अभाव है।' हां, किसी वेबसाइट या सोशल मीडिया अकाउंट को आपत्तिजनक पाए जाने पर सरकार उसे ब्लॉक कर सकती है या करवा सकती है।

Tuesday, September 6, 2016

गांधी हत्या: पटेल ने दी थी संघ को क्लीन चिट

आरएसएस के लोगों पर महात्मा गांधी की हत्या का आरोप लगाने, मुकरने और फिर मानहानि केस में डटने का फैसला लेकर राहुल गांधी ने बहुत समझदारी का परिचय नहीं दिया है। एक कुशल राजनेता के लक्षण यह होते हैं कि पहले तो वह बोलता ही तौल कर है और गलती से कुछ गड़बड़ हो जाए तो माफी मांगने से नहीं हिचकता। राहुल ने इनमें से किसी भी तरह की समझदारी नहीं दिखाई, हालांकि वह इसके लिए जाने भी नहीं जाते। राहुल ने सीधे तौर पर आरएसएस से जुड़े लोगों को महात्मा गांधी की हत्या के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया। उनके इस आरोप में कितनी सच्चाई है, इसके लिए हमें कुछ तथ्यों पर नजर डालनी होगी।

महात्मा गांधी की हत्या के बाद संघ पर लगे प्रतिबंध का हवाला देते हुए वामपंथी इतिहासकार इस मामले में आरएसएस को जिम्मेदार ठहराते रहे हैं। लेकिन, इससे बड़ा तथ्य यह रहा है कि आरएसएस पर जिस नेहरू सरकार ने बैन लगाया और गुरु गोलवलकर को गिरफ्तार किया था, उसी सरकार ने संघ पर से बैन हटाया भी था। कुछ लोग सरदार पटेल और नेहरू के बीच हुए पत्र व्यवहार के हवाले से संघ को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश करते रहे हैं। इस थिअरी में बड़ा झोल है। यह सच है कि पटेल ने नेहरू को लिखे एक पत्र में आरएसएस पर सांप्रदायिक तनाव पैदा करने का आरोप लगाया था। सिर्फ इसके आधार पर ही वामपंथी लेखक संघ पर गांधी हत्या का कलंक लगाने की कोशिश में रहते हैं।

पटेल ने दी थी आरएसएस को क्लीन चिट

दरअसल, यह तथ्यों की चोरी का मामला है। सरदार पटेल ने गृह मंत्री की हैसियत से प्रधानमंत्री नेहरू को 27 फरवरी, 1948 को लिखे पत्र में कहा था, ‘आरएसएस इस सबमें शामिल नहीं था। यह हिंदू महासभा की एक अतिवादी विंग थी, जिसने सावरकर के नेतृत्व में गांधी हत्या की साजिश रची।’उनका यह पत्र सीधे तौर पर आरएसएस को क्लीन चिट है। हालांकि अदालत में विनायक दामोदर सावरकर के खिलाफ लगे आरोप भी साबित नहीं हो सके। खास बात यह है कि सावरकर ने अपना मुकदमा खुद लड़ा और तथ्यों की जंग में जीत गए।

जुलाई, 1948 में संघ से बैन हटाने की मांग करते हुए नेहरू मंत्रीमंडल के सदस्य श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने पटेल को पत्र लिखकर संघ पर लगे बैन को हटाने और मुस्लिम समुदाय के एक वर्ग को ‘देशद्रोही’ बताया था। इस पत्र के जवाब में पटेल ने लिखा था, ‘आरएसएस की गतिविधियां सरकार और राज्य के समक्ष खतरा पैदा करती हैं। जहां तक मुस्लिमों की बात है, मैं आप से पूरी तरह सहमत हूं कि कुछ लोग देश के प्रति वफादार नहीं हैं और खतरा साबित हो सकते हैं।’

जाहिर है कि कांग्रेस के नेता होने की वजह से पटेल की कुछ सीमाएं थीं और वह आरएसएस का खुलकर समर्थन नहीं कर सकते थे। आखिर वह दूसरे ध्रुव पर जो खड़े थे। लेकिन, वामपंथी इतिहासकार इस तथ्य के एक सिरे को ही पकड़ते हैं, संघ की निंदा को तो उन्होंने हाथोंहाथ लिया, लेकिन मुस्लिम समुदाय के कट्टरवादी तबके के बारे में की गई उनकी टिप्पणी को हजम कर गए। यह सभी तथ्य सरदार पटेल पर प्रकाशित पुस्तक ‘कलेक्टड वर्क्स ऑफ सरदार वल्लभभाई पटेल’ में मौजूद हैं। लेकिन, वामपंथी इन तथ्यों का सुविधा के अनुसार इस्तेमाल करते रहे हैं।

कट्टर मुस्लिमों को पटेल ने दिया था पाक जाने का ऑफर

6 जनवरी, 1948 को लखनऊ में एक जनसभा को संबोधित करते हुए पटेल ने कट्टरवादी मुस्लिमों को चेताते हुए कहा, ‘आप लोग कश्मीर में पाकिस्तान के हमले की निंदा क्यों नहीं करते? आप दो घोड़ों की सवारी नहीं कर सकते। आप को एक घोड़ा चुनना होगा। जो लोग पाकिस्तान जाना चाहते हैं, वह जा सकते हैं और वहां शांति से रह सकते हैं।’

गांधी हत्या पर गठित आयोग ने दी क्लीन चिट

महात्मा गांधी की हत्या से जुड़े तथ्यों की पड़ताल के लिए तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने 1965 में जेएल कपूर आयोग गठित किया था। इस आयोग ने 1969 में रिपोर्ट सौंपी थी, जिसमें आरएसएस या आरएसएस के लोगों (जैसा राहुल गांधी का कहना है) को किसी भी तरह से जिम्मेदार नहीं माना गया। यहां तक कि महाराष्ट्र सरकार की ओर से सीआईडी और पुलिस कमिश्नर से मांगी गई रिपोर्ट में भी संघ पर कोई आरोप नहीं लगा। आयोग ने जिन लोगों से गवाही ली, उनमें से किसी ने भी गांधी हत्या के मामले में संघ की संलिप्तता को लेकर कोई बात नहीं की। अलबत्ता, संघ को विभाजन की त्रासदी में पाकिस्तान से लुट-पिटकर आने वाले हिंदुओं की मदद करने वाला संगठन करार दिया।

(नवभारत टाइम्स डॉट कॉम में प्रकाशित ब्लॉग)

Thursday, September 1, 2016

गिलगित-बाल्टिस्तान: पाकिस्तानी उत्पीड़न का स्थान

जम्मू-कश्मीर में भारत सरकार और सेना की भूमिका के मद्देनजर स्थानीय लोगों के मानवाधिकारों की अक्सर बात की जाती रही है। एक तबका तो ऐसा है, जो जम्मू-कश्मीर की तथाकथित आजादी के नाम पर अलगाववादियों को भी बौद्धिक समर्थन देता रहा है। लेकिन, हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। जम्मू-कश्मीर भी एक ऐसा सिक्का है, जिसके दो पहलू जगजाहिर हैं, पहला है भारत के हिस्से का जम्मू-कश्मीर और दूसरा पाकिस्तान द्वारा जबरन कब्जाया गया जम्मू-कश्मीर। निश्चित तौर पर एक देश के तौर पर यह हमारी असफलता है कि जम्मू-कश्मीर के एक तबके को हम आज भी भरोसे में नहीं ले पाए हैं।

लेकिन, दूसरा पहलू इससे भी कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है, जिस पर हमारे यहां बहुत कम चर्चा होती है। रणनीतिक तौर पर सरकारों की नजरों से ओझल होने के चलते हम भी पाकिस्तान द्वारा कब्जाए जम्मू-कश्मीर को भूल से गए हैं। लेकिन, पिछले दिनों जब एक बार फिर लंबे समय बाद केंद्र सरकार की ओर से इस मुद्दे को उठाया गया तो कुछ हलचल दिखी है। खुद प्रधानमंत्री ने बलूचिस्तान और पीओके (पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर) में मानवाधिकारों के हनन का मुद्दा उठाया है। लेकिन, बहुत कम लोग जानते हैं कि पाकिस्तान यहां किस तरह स्थानीय लोगों को कुचलने की कोशिश कर रहा है। आइए आज बात करते हैं, गिलगित-बाल्टिस्तान की।

करीब 15 लाख की आबादी और 72,494 स्क्वेयर किलोमीटर क्षेत्रफल वाले गिलगित-बाल्टिस्तान को पाकिस्तान में पीओके के उत्तरी क्षेत्र के नाम से जाना जाता है। पांच जिलों में बंटे इस उत्तरी क्षेत्र की बड़ी आबादी शियाओं और इस्माइलियों की है, जिन्हें सुन्नी इस्लामिक राष्ट्र पाकिस्तान में लगातार प्रताड़ित किया जा रहा है। इस इलाके के मूल निवासी शियाओं, इस्माइलियों और विभिन्न जनजातियों के उत्पीड़न की कहानी लंबी है। पाक ने यहां के लोगों को हमेशा ही सांप्रदायिक आधार पर लड़ाने की कोशिश की है ताकि उसके उत्पीड़न के खिलाफ एकजुटता न हो सके।

अब तक के सबसे कट्टर इस्लामिक राष्ट्रपतियों में से एक जिया-उल हक के मार्शल लॉ के दौर में इस्लाम के नाम पर यहां शरीयत लागू कर दिया गया। 1982 के बाद से ही यहां सांप्रदायिक हिंसा का दौर जारी है। 1988 में पाक सेना ने यहां कई शिया प्रदर्शनकारियों को जिंदा फूंक दिया था। 1996 में बाहरी लोगों को बसाने का विरोध कर रहे शियाओं पर पाक सेना ने ताबड़तोड़ फायरिंग की थी। यहां पहली बार अक्टूबर 1994 में चुनाव हुए थे, जिसके बाद 26 सदस्यीय नॉर्दन एरियाज एग्जिक्यूटिव काउंसिल का गठन किया गया। लेकिन, मार्च 1995 में कहा गया कि इस काउंसिल के पास किसी तरह के कानून को पारित करने का अधिकार नहीं होगा, यह काउंसिल सिर्फ सलाह दे सकती है।

इस्लामाबाद से ही चलता है शासन

गिलगित-बाल्टिस्तान की सत्ता की कमान पाक सरकार के अंतर्गत काम करने वाले कश्मीर एवं नॉर्दन एरियाज अफेयर्स मिनिस्ट्री के पास है। इसका मुखिया इस्लामाबाद में स्थिति पाक सरकार का जॉइंट सेक्रटरी होता है, जिसके पास सभी मामलों के निपटारे की ताकत होती है। यहां की सिविल, पुलिस और सुरक्षा सेवाओं में पाकिस्तानियों को ही नियुक्ति दी जाती है। न्यायिक आयुक्त की ओर से सुनाया गया कोई भी फैसला यहां अंतिम होता है, इसके खिलाफ कहीं अपील नहीं की जा सकती।

डिमॉग्रफी बदलने में जुटा है पाकिस्तान

पाकिस्तान की कोशिश है कि यहां कि आबादी के संतुलन को पूरी तरह अपने पक्ष में कर लिया जाए। स्थानीय लोगों को अल्पसंख्यक बनाने की नीति के तहत पाक ने गिलगित और स्कर्दू में बड़े पैमाने पर बाहरी लोगों को जमीन आवंटित की है।  यह यूनाइटेड नेशंस कमिशन फॉर इंडिया ऐंड पाकिस्तान के प्रस्तावों का भी उल्लंघन है। यह बाहरी लोग स्थानीय समुदायों की अपेक्षा आर्थिक तौर पर समृद्ध हैं और सरकार के समर्थन से इनका उत्पीड़न कर रहे हैं। 2001 की जनगणना के मुताबिक बाहरी और स्थानीय लोगों की जनसंख्या का अनुपात 3:4 हो गया है, जो करीब एक दशक पहले ही 1:4 था। पंजाबी और पख्तून मूल के लोगों की यहां तेजी से बढ़ती आबादी के चलते स्थानीय लोग असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।

भारत का सिरदर्द बढ़ा रहा है चीन का दखल

1963 में पाकिस्तान ने सीमा समझौते के नाम पर गिलगित बाल्टिस्तान के रणनीतिक तौर पर बेहद महत्पूर्ण 5,180 स्क्वेयर किलोमीटर हिस्से को चीन को सौंप दिया था। पाकिस्तान ने इस इलाके को काराकोरम हाईवे बनाने के नाम पर चीन को सौंपा है। इस तरह चीन को पेइचिंग से कराची तक ‘लैंड लिंक’ की सुविधा मिल गई। अब दोनों देशों के बीच इस इलाके को चीन-पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरीडोर के तौर पर विकसित करने का करार हुआ है। इसमें स्थानीय लोगों से औने-पौने दामों पर जमीन लेकर उन्हें खदेड़ा जा रहा है। यहां हालिया हिंसा और विरोध प्रदर्शनों की बड़ी वजह चीन प्रायोजित परियोजनाओं के लिए अधिग्रहण ही है।

पाक सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक भारत के हिस्से में गिलगित-बाल्टिस्तान

पाकिस्तान के संविधान में गिलगित-बाल्टिस्तान के स्टेटस के बारे में कुछ नहीं कहा गया है। हालांकि कश्मीर को विवादित राज्य बताया गया है। नॉर्दन एरियाज यानी गिलगित बाल्टिस्तान के स्टेटस को लेकर दायर की गई एक याचिका की सुनवाई करते हुए पीओके हाईकोर्ट ने मार्च 1993 में एक फैसले में पाक सरकार की प्रशासनिक व्यवस्था की तीखी आलोचना करते हुए कहा था कि इस इलाके की सत्ता पीओके सरकार के हाथ होनी चाहिए और पाक सरकार को इसकी मदद करनी चाहिए। इस फैसले के खिलाफ पाक सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी। इस पर सुनवाई करते हुए 14 सिंतबर, 1994 को पारित आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, ‘उत्तरी क्षेत्र भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर राज्य के हिस्से हैं। यह आजाद कश्मीर यानी पीओके का हिस्सा नहीं हैं जैसा कि आजाद कश्मीर के अंतरिम संविधान ऐक्ट 1974 में कहा गया है।’

(नवभारत टाइम्स डॉट कॉम के ब्लॉग में प्रकाशित)

Wednesday, August 10, 2016

ऐसे पत्रकारों को तो लोग ‘दलाल’ ही कहेंगे!

पत्रकार की भूमिका क्या है? एक पत्रकार के नाते इस सवाल का जवाब मुझे हमेशा यही मिला है कि जहां भी आप हो, वहां से हर मसले को निरपेक्ष दृष्टि से देखना। लेकिन, जब कोई पत्रकार किसी राजनीतिक दल का कार्यकर्ता अधिक हो जाए और उसका अपने पेशे से सरोकार सिर्फ अपनी विचारधारा के पोषण तक सीमित हो जाए तो इसे क्या कहेंगे? जाहिर है इन्हें पत्रकार नहीं, बल्कि राजनीतिक संगठन का कार्यकर्ता कहा जाएगा (भावनाओं पर काबू न रख पाने वाले लोग तो ‘दलाल’ तक कह देते हैं)। इसका एक उदाहरण नीचे संलग्न एक गोष्ठी का पत्रक है, जिसमें खुद को देश के निष्पक्ष पत्रकारों में शुमार करने वाले ओम थानवी एक सेशन के अध्यक्ष के तौर पर शिरकत करने वाले हैं। इस प्रॉपेगेंडा गोष्ठी का नाम है, ‘संघ का आतंकवाद और न्याय की असफलता’। कॉन्स्टिट्यूशन क्लब दिल्ली में प्रस्तावित कार्यक्रम के लिए छपे इस पत्रक में संघ के स्वयंसेवक (जिसकी मूंछे आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत जैसी दिखाई गई हैं) की प्रतीकात्मक तस्वीर इस्तेमाल की गई है। यानी साफ तौर पर संघ को एक आतंकी संगठन के तौर पर चित्रित करने की कोशिश की गई है।

इस गोष्ठी में हेमंत करकरे की मौत पर सवाल, देश की न्यायिक व्यवस्था का पूर्वाग्रह और ‘संघी आतंकवाद के खतरे’ जैसे फर्जी विषय शामिल किए गए हैं। इस कार्यक्रम के वक्ताओं की सूची पर भी एक बार नजर डाल लीजिए, इनमें हर्ष मंदर, तीस्ता सीतलवाड़, सुभाष गाताडे, शशि थरूर, मनोज झा, कविता कृष्णन, प्रफेसर अपूर्वानंद और सीताराम येचुरी जैसे लोग शामिल हैं। इस पूरी गैंग की विचारधारा क्या है, इसके बारे में बताने की जरूरत नहीं है। हर्ष मंदर वह व्यक्ति हैं, जो यूपीए सरकार के दौरान सोनिया गांधी की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद में सदस्य थे। आरएसएस से इनकी पुरानी वैचारिक रंजिश है। शशि थरूर तो कांग्रेस के सांसद हैं ही। प्रफेसर अपूर्वानंद एक शिक्षक से ज्यादा काम देश में वाम विचारधारा के प्रचारक का करते रहे हैं। तीस्ता सीतलवाड़ को कौन नहीं जानता, इन्हीं के एनजीओ की विदेशी फंडिंग पर सरकार ने बैन लगाया है। पीएम नरेंद्र मोदी के खिलाफ तमाम मुकदमों की अगुवा रही हैं। सीताराम येचुरी तो आखिर सीपीएम के महासचिव हैं ही।
इनका इतिहास बताता है कि ये लोग ऐसा ही कार्यक्रम आयोजित कर सकते हैं।

चिंता का सबब है ओम थानवी का इस गोष्ठी का मेहमान बनना। वह तो खुद को निरपेक्ष पत्रकारों में से एक बताते रहे हैं (हालांकि वह कभी रहे नहीं)। थानवी का इस कार्यक्रम के मेहमानों में शामिल होना बताता है कि देश में पत्रकारों की एक जमात किस हद तक गिरने पर उतारू है। ऐसे में यदि कोई इन्हें ‘दलाल’ कहता है तो क्या बुरा है? खुद इस पेशे में होने के चलते पत्रकारों के लिए ऐसे संबोधन मुझे आहत करते हैं, लेकिन अब मैं कहूंगा कि जहां थानवी जैसे हों, वहां ऐसे कहने वाले भी गलत नहीं हैं।

इस पूरी गोष्ठी की थीम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को आतंकी संगठन करार देने की है। मेरा मानना है कि इन लोगों को इस गोष्ठी के आयोजन की अनुमति ही नहीं दी जानी चाहिए। आखिर कैसे कोई बिना किसी तथ्य के किसी संगठन को आतंकवादी करार दे सकता है? यदि आपको संघ के आतंकी घटनाओं में लिप्त होने का विश्वास है तो अदालत में केस करिए। ऐसे प्रॉपेगेंडा कार्यक्रमों से क्या होगा? लेकिन यह न्यायालय क्यों जाएं, इन्होंनें तो न्यायिक व्यवस्था को ही पूर्वाग्रही करार दे दिया है। इन कथित बुद्धिजीवियों, नेताओं और पत्रकारों के इस गैंग की ओर से प्रस्तावित यह कार्यक्रम सीधे तौर पर देश की व्यवस्था को एक चुनौती है। अब इन्हें ‘दलाल’ और ‘देशद्रोही’ न कहा जाए तो क्या कहा जाए?

यह बात बिल्कुल सही है कि संघ में खामियां हैं, उसकी विचारधारा से किसी का भी असहमति रखने का अधिकार है। लेकिन आप कैसे बिना सबूत के इस तरह का अनर्गल आरोप लगा सकते हैं? यह ठीक ऐसा ही है, जैसे संघ की विचारधारा से प्रभावित पत्रकार और विचारक कांग्रेस और सीपीएम जैसे दलों को आतंकी संगठन घोषित करने का प्रॉपेगेंडा रचने के लिए किसी गोष्ठी का आयोजन करें।

राहुल गांधी को लगी फटकार से सीखें

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने संघ के लोगों को महात्मा गांधी का हत्यारा करार देने वाले बयान को लेकर यह कहते हुए फटकार लगाई थी कि आप किसी संगठन की छवि इस तरह धूमिल नहीं कर सकते। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, ‘जब आप किसी व्यक्ति या संस्था के बारे में बोलते हैं तो आपको सतर्क रहना चाहिए। नाथूराम गोडसे ने गांधीजी को मारा और आरएसएस के लोगों ने गांधीजी को मारा, इन दोनों बातों में बहुत फर्क है।’

अदालत ने इस मामले में राहुल को आपराधिक मामले से बचने के लिए संघ से माफी की सलाह दी है। बिना सोचे समझे किसी संगठन पर इस तरह का कुख्यात आरोप लगाने वालों के लिए सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला एक सबक है। इस गोष्ठी के आयोजकों को इस फैसले से सीखना चाहिए। यदि इन्हें वास्तव में लगता है कि संघ आतंकी संगठन है तो अपनी लंबी-चौड़ी वकील लॉबी के जरिए कोर्ट में याचिका दायर करें। यह गैंग जब याकूब मेमन जैसी आतंकी के बचाव में आधी रात को सुप्रीम कोर्ट पहुंच सकती है, तो फिर संघ के खिलाफ रात में न सही दिन के उजाले में याचिका दायर करें।

रस्सी जल गई, लेकिन ऐंठ न गई

यह कहावत शायद किसी ने वाम विचारधारा वाले लोगों के लिए ही रची थी। देशविरोधी बयानों, समाज को तोड़ने के अजेंडे, समुदाय विशेष के तुष्टिकरण, आतंकवाद के बचाव के लिए कुतर्क गढ़ने के इनके कृत्यों के चलते ही देश की जनता ने इन्हें खारिज कर दिया है। लेकिन, मीडिया और अकादमिक जगत में कुंडली मारे बैठा इनका एक गिरोह आज भी अपने कुत्सित प्रयासों में लगा हुआ है। राजनीतिक तौर पर देश की जनता ने इन्हें एक तरह से खत्म कर ही दिया है, यही हाल रहा तो मीडिया और अकादमिक जगत में भी इनकी विश्वसनीयता समाप्त हो जाएगी।

Monday, July 25, 2016

माया जी! यह बुद्ध का संदेश तो नहीं है...

घृणा, घृणा करने से कम नहीं होती, बल्कि प्रेम से घटती है, यही शाश्वत नियम है। यह कहना था भगवान बुद्ध का। बीजेपी नेता दयाशंकर सिंह की ओर से मायावती की तुलना ‘वेश्या’ से किए जाने के बाद उबले बीएसपी के ज्यादातर नेताओं और कार्यकर्ताओं ने जिस तरह की प्रतिक्रिया दी, वह इस संदेश के पूरी तरह विपरीत है। खुद बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने कहा, ‘उसने जो कहा, वह अपनी बहन-बेटी के लिए कहा है।’ राज्यसभा में उनकी यह प्रतिक्रिया भी मर्यादित नहीं कही जा सकती। आखिर दयाशंकर की इस टिप्पणी के जवाब में उनकी बहन-बेटी पर निशाना साधना कैसे जायज हो सकता है? दयाशंकर ने जो कहा वह कितना निंदनीय है और किस तरह पुरुषवादी एवं दलित विरोधी सोच का प्रतीक है, इसके बारे में कुछ कहने की जरूरत नहीं है।


लेकिन मायावती बड़ी नेता हैं, उनका बड़प्पन और बढ़ता यदि वह जैसे को तैसे की प्रतिक्रिया देने की बजाय खुद को पीड़ित के तौर पर ही पेश करतीं। वह उनके राजनीतिक हितों के भी अनुकूल रहता और दयाशंकर जैसे लोगों के खिलाफ एकसुर में निंदा का माहौल बनता। लेकिन बीएसपी के लोगों ने उनके ‘डीएनए में कमी’ बताकर और ‘दयाशंकर कुत्ते को फांसी दो’ जैसे नारे लगाकर भी सभ्यता का परिचय नहीं दिया। यह ऐसा ही है कि कोई शोहदा यदि राह चलते किसी लड़की से बदतमीजी कर दे तो भीड़ उसके घर पर चढ़ जाए और उसके परिवार की महिलाओं से उसका बदला लेने की कोशिश करे।

कांशीराम के नेतृत्व में जिस तरह से बीएसपी का उभार हुआ और मायावती ने उनके बाद दलित समाज की मुखर आवाज के तौर पर जिम्मेदारी संभाली, उसका मैं भी कायल हूं। उत्तर प्रदेश जैसे जटिल राजनीतिक परिस्थितियों वाले राज्य में मायावती ने कुशल प्रशासन देकर लोगों का भरोसा जीता है। लेकिन यह उनके व्यक्तित्व और कार्यशैली की ही कमी है कि समाज का एक बड़ा तबका आज भी उनको वोट नहीं देता। एक बड़ा वर्ग ऐसा है, जो मानता है कि मायावती बदले की राजनीति करती हैं।

बीते कार्यकाल की उनकी सोशल इंजिनियरिंग को छोड़ दें तो जिस तरह से उन्होंने ‘तिलक तराजू और तलवार…’ जैसे कुख्यात नारे दिए थे, वह भी कम समाज विध्वंसक नहीं थे। आखिर कोई कैसे किसी जाति विशेष के खिलाफ इस तरह के नारे लगा सकता है। लेकिन समाज में यह भी हुआ, इसे लोगों की सहिष्णुता ही कहा जाएगा कि इसके बदले में दूसरे नारे नहीं उछले।

2007 से 2012 के अपने मुख्यमंत्रित्व काल में माया ने यह साबित करने की कोशिश की थी कि उनके राज में गैर-दलितों के भी हित सुरक्षित हैं। लेकिन दयाशंकर सिंह के विरोध में जिस तरह के नारे उछले हैं, वह एक बार फिर आशंका पैदा करते हैं। यदि मायावती और बीएसपी को लगता है कि ऐसे प्रदर्शनों से दलित समाज थोक में उन्हें वोट देगा तो वे सही हो सकते हैं, लेकिन यह भी सच है कि इससे सोशल इंजिनियरिंग के दौर में जुड़ा गैर-दलित वर्ग उनसे छिटक भी सकता है। दयाशंकर के आपत्तिजनक बयान पर बीएसपी राजनीति कर रही है, इसका उसे हक भी है। लेकिन, जिस तरह की रणनीति उसने अपनाई है, वह बैकफायर कर सकती है। इस प्रकरण से मायावती सूबे की जनता में खुद को पीड़ित पक्ष के तौर पर पेश कर सकती थीं, लेकिन जैसा रुख खुद उन्होंने और समर्थकों ने अख्तियार किया है, वह उल्टे नुकसान ही पहुंचाएगा।

पीएम नरेंद्र मोदी से सीखें मायावती

2014 के आम चुनावों से कुछ महीने पहले कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक चल रही थी। एक पत्रकार ने मणिशंकर अय्यर से मोदी को लेकर सवाल पूछा तो उनका जवाब था, ’21वीं शताब्दी में वह (नरेंद्र मोदी) प्रधानमंत्री बन पाएं, ऐसा कतई मुमकिन नहीं है… लेकिन यदि वह यहां (कांग्रेस अधिवेशन में) आकर चाय बेचना चाहें तो हम उनके लिए जगह बना सकते हैं।’ इस बयान के जवाब में मोदी ने यह नहीं कहा था कि मणिशंकर अय्यर या अन्य कोई कांग्रेसी बीजेपी अधिवेशन में आकर चाय बेचे या पानी पिलाए, बल्कि राजनीतिक चातुर्य दिखाते हुए उन्होंने खुद को गरीब, शोषित और पीड़ित के तौर पर पेश किया। उनका यह कार्ड किस तरह से चला, इसकी बानगी आम चुनाव के नतीजे हैं।

यह महात्मा बुद्ध का संदेश नहीं है

बीएसपी के लोग महात्मा बुद्ध का अनुसरण करने की बात करते हैं। उनका पहला सिद्धांत ही सहिष्णुता है। कहा जाता है कि भारतीय समाज में बढ़ती हिंसा के चलते ही बौद्ध मत का प्रसार बढ़ा। लेकिन, दयाशंकर के आपत्तिजनक बयान के विरोध में बुद्ध के कथित अनुयायी जिस तरह के नारे उछाल रहे हैं और उनकी बहन-बेटियों पर टिप्पणी कर रहे हैं, वह भी मर्यादा के अनुकूल नहीं हैं। मायावती और उनके समर्थकों को सोचना ही चाहिए कि बुद्ध के किस संदेश को मानते हुए वह ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ की ओर बढ़ रहे हैं।

(नवभारत टाइम्स डॉट कॉम में प्रकाशित ब्लॉग)

यहीं खत्म होना था बुरहान का सफर

मौत। हर इंसान का अंत एक दिन इसके साथ ही होता है, लेकिन जीवन भर उसके कामों के हिसाब से ही मौत के बाद उसे जाना जाता है। कई बार तो उसके कामों के आधार पर ही तय होता है कि उसे कौन सी मौत मिलेगी। तो हिज्बुल मुजाहिदीन के आतंकी बुरहान वानी को जो मौत मिली, वह उसके कर्मों के मुताबिक ही थी।  होश संभालने के साथ ही यह लड़का आतंकी संगठन में शामिल हो गया था, आतंक का पोस्टर बॉय बना और 22 साल की उम्र में ही एक एनकाउंटर में वह ढेर हो गया। ढेर हो गया या फिर कर दिया गया, यह किसी आतंकी या गैंगस्टर के लिए ही लिखा जाता है। सामान्य लोगों का निधन होता है और महान आत्माएं तो ‘खुद’ अपना शरीर त्याग देती हैं।


मौत के उल्लेख का यह वर्गीकरण व्यक्ति के कर्मों के मुताबिक ही है। इसके बावजूद भी ऐसे कई कथित बुद्धिजीवी पाए जा रहे हैं, जो अपनी कलमकारिता से यह बताने में जुटे हैं कि बुरहान वानी ‘क्रांतिकारी’ था और उस आतंकी की तुलना भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद की शहादत से कर रहे हैं यानी उसकी मौत को शहीद होना बता रहे हैं।

ऐसे लोगों ने यह कुत्सित प्रयास पहली बार नहीं किया है। इनकी कलमें पहले भी अफजल गुरु और याकूब मेमन की फांसी के विरोध में चली थीं। इस तबके की विशेषता यह है कि ये तथ्यों और तर्कों को तोड़-मरोड़कर पेश करने की महारथ रखते हैं। किस उदाहरण को कहां इस्तेमाल कर दें, इसका भी कोई अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।

कुछ मीडिया समूह और तथाकथित उदारवादी तो एक तरह से कैंपेन चला रहे हैं और बताने में जुटे हैं कि कैसे बुरहान वानी कश्मीरियों के लिए शहीद था। तर्कों की दुष्टता यहां तक कि कश्मीर की ‘आजादी’ की मांग की तुलना भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से कर रहे हैं। ऐसे ही कुछ तर्कों के जवाब-

एक बेटा जायदाद बेचने का फैसला नहीं ले सकता

जम्मू-कश्मीर के 2,22,236 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में से 1,01,387 वर्ग किलोमीटर का इलाका भारत के हिस्से में है। इसमें से 26,293 वर्ग किमी में जम्मू बसा है, जबकि 59,146 किलोमीटर का क्षेत्रफल लद्दाख का इलाका है, बाकी बचा 15,948 वर्ग किमी का हिस्सा कश्मीर घाटी का है। यानी कश्मीर घाटी का क्षेत्रफल लद्दाख और जम्मू की तुलना में बेहद कम है।

कथित तौर पर आजादी की मांग करने वालों का बहुमत इसी इलाके में बसता है, लेकिन अलगाववादी संगठन और इनके समर्थक लेखक समूह इसे पूरा राज्य की मांग बताने पर तुले हैं। अगर किसी घर में 3 बेटे हों (जम्मू, लद्दाख और कश्मीर) तो फिर कश्मीर से पूछकर ही आजादी का फैसला क्यों होना चाहिए। फिर इसी कश्मीर घाटी में आधा हिस्सा उन कश्मीरी पंडितों और सिखों का है, जिन्हें अमानवीय प्रताड़नाएं देकर इस्लामिक आतंकवादियों ने उनके घर से खदेड़ दिया। आज वह दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। इन लोगों का भी जम्मू-कश्मीर के जर्रे-जर्रे पर उतना ही हक है, जितना घाटी के अलगाववादियों का।

पूरा जम्मू-कश्मीर अशांत नहीं

अलगाववाद समर्थक लेखक समूह तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करते हुए यह साबित करने में जुटे रहते हैं कि पूरा जम्मू-कश्मीर ही अशांत है। ऐसा नहीं है, जम्मू और लद्दाख में कभी कोई पत्थर नहीं उछला। कश्मीर घाटी की समस्या भी किस तरह से अलगाववादियों की देन है, यह भी किसी से छिपा नहीं है।

पिछले दिनों ही एक अलगाववादी नेता के बेटे ने कहा था कि गोली खाने के लिए गरीब ही क्यों हैं, आखिर इन नेताओं के बेटे खुद बंदूकें लेकर क्यों नहीं उतरते? साफ है कि इस समस्या की जड़ में पाकिस्तान के पैसों से फल-फूल रहे अलगाववादी और वे आतंकवादी हैं, जो सूबे में इस्लामी निजाम की स्थापना के लिए गोलियां चला रहे हैं। बुरहान की मां ने भी एक न्यूज पोर्टल से बातचीत में कहा है, ‘मेरा बेटा इस्लामी निजाम के लिए मरा, काफिरों से लड़ते हुए।’

यह जंग बर्बादी की है

इन आतंकियों और अलगाववादियों को अपनी कलम से खाद-पानी देने वाले लोग इसे आजादी का संघर्ष बताते हुए बुरहान जैसों की तुलना भगत सिंह से करते हैं। ध्यान देने की जरूरत है कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की आग पूरे देश में धधक रही थी। ऐसा नहीं था कि किसी राज्य में आजादी की जंग न चल रही हो। कश्मीर में एक विशेष समुदाय के कुछ भटके हुए लोग आतंकवाद की राह पर निकल पड़े हैं, इसे आजादी की जंग कैसे कहा जा सकता है?

इन आतंकियों के परिवार के लोग तो खुद स्वीकार कर रहे हैं कि उनके बेटे इस्लामी निजाम की स्थापना के लिए मरे हैं। एक तथ्य और कि आजादी की जंग में इस्लामिक स्टेट जैसे खूंखार आतंकी संगठनों के झंडे नहीं लहराए जाते। IS के झंडे लेकर जो जंग लड़ी जा रही हो, वह आजादी की तो नहीं बर्बादी की जरूर हो सकती है।

(नवभारत टाइम्स डॉट कॉम में प्रकाशित ब्लॉग) 

इसलिए मची है पिछड़ा कहलाने की होड़

बाबासाहेब आंबेडकर ने हिंदू समाज की जाति-व्यवस्था पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि यह एक ऐसी बहुमंजिला इमारत की तरह है, जिसमें कोई सीढ़ी नहीं है। उनका कहना था कि यह व्यवस्था ऐसी है, जिसमें ऊपर का व्यक्ति नीचे नहीं आ सकता और नीचे का व्यक्ति ऊपर नहीं आ सकता, उन्हें अपनी ही मंजिलों पर मरना होगा। लेकिन, बीते कुछ सालों से इन मंजिलों पर सीढ़ियां लगाने की कोशिशें हो रही हैं। कल तक ऊपरी मंजिल पर बैठे लोग, अब निचली मंजिल पर आना चाहते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि वहां सुविधाएं आसानी से उपलब्ध हैं, नौकरियों और पढ़ाई में आरक्षण है, फिर ऊपर की मंजिल पर बैठकर क्या किया जाए?

चलो नीचे ही उतरने की कोशिश करते हैं, कोई आंदोलन करते हैं। कूपा, पटेल और जाट आंदोलन इसी सोच की परिणति हैं। यह तीनों ही जातियां भारत की सामाजिक व्यवस्था में हमेशा से उच्च मध्य पायदान पर रही हैं। इसलिए जब समाज में दलितों और पिछड़ों को आरक्षण देने की व्यवस्था की गई तो इन पर विचार नहीं किया गया। यह जातियां समाज में उच्च मध्य पायदान पर रहने के साथ ही आर्थिक तौर पर भी सक्षम रही हैं। (व्यक्तिगत तौर पर किसी का पिछड़ापन अलग बात है) लेकिन अब इन जातियों ने आरक्षण की मांग को लेकर हिंसक आंदोलन शुरू कर दिए हैं।

यह अपेक्षाकृत ताकतवर जातियां आखिर क्यों आरक्षण के लिए आंदोलन कर रही हैं? इसकी पड़ताल करना जरूरी है। यह सही है कि आजादी के वक्त जो हालात थे, उसमें सवर्ण लोग प्रभुत्वशाली भूमिका में थे, खेती से लेकर नौकरी-चाकरी तक पर उनकी स्थिति बेहद मजबूत थी। दलितों और आदिवासियों के पास आगे बढ़ने के लिए संसाधानों का अभाव था, उनकी सामाजिक स्थिति भी बेहद कमजोर थी। सवर्णों के अमानवीय बर्ताव से वह पीड़ित थे, उससे उनकी मुक्ति के संविधान में कुछ प्रावधान किया जाना जरूरी थी। संविधान निर्माताओं ने ऐसा किया भी, दलितों को 15 पर्सेंट और आदिवासियों को 7.5 पर्सेंट का आरक्षण प्रदान किया गया। 10 साल के बाद इस व्यवस्था की समीक्षा की जानी थी। लेकिन इसकी मियाद बढ़ती रही, इसकी वजह यह थी कि जिन लोगों के लिए यह लागू किया था, उस समाज को समग्र तौर पर इस व्यवस्था का लाभ नहीं मिल सका। 

आम सहमति है कि पिछड़े समाज को मिलने वाला आरक्षण उनके समग्र विकास तक जारी रहना चाहिए। यहां मैं साफ कर दूं कि मेरी भी यही राय है। लेकिन उदारीकरण की नीतियों के बाद से सामाजिक और आर्थिक हालात काफी बदल गए हैं। एक दौर में कुछ निश्चित तबकों के लिए आरक्षण की व्यवस्था से अन्य जातियां बहुत प्रभावित नहीं होती थीं क्योंकि उनके पास खेती जैसे अन्य उपक्रम थे। उसका एक वर्ग खेती के जरिए अपना गुजारा कर लेता थे। 

उदारीकरण के बाद से जीडीपी आधारित ग्रोथ के दौर में नौकरियों का प्रभुत्व बढ़ा है। पलायन की दर बढ़ी है, गांव में खेती कर रहे युवाओं को अब निखट्टू तक कहा जाने लगा है। शादियां भी अब खेती नहीं नौकरी देख कर होने लगी है।jat दूसरी तरफ जनसंख्या वृद्धि के चलते जोतें छोटी होती गई हैं, अकेले खेती पर निर्भर रहने वाले परिवार विरले ही होंगे। इसलिए अब हर जाति-समुदाय के लोग नौकरियों के लिए प्रयासरत हैं। वह भी सरकारी नौकरी, जहां इस उथल-पुथल के दौर में जिंदगी स्थिरता से कट सके। कूपा, पटेल और जाट जैसी बिरादरियों के आरक्षण की जंग में उतरने के मूल कारण यही हैं।

ध्यान रखने की जरूरत है कि नीतियां भी इस पर निर्भर होती हैं कि हमने विकास के लिए या देश चलाने के लिए मॉडल कौन सा चुना है। फिलहाल देश जीडीपी आधारित विकास मॉडल पर चल रहा है, जहां कृषि में अप्रत्यक्ष बेरोजगारी की स्थिति है। ऐसे में कृषि में संलग्न रही जातियां परेशान हैं। उल्लेखनीय है कि जाट, पटेल और कूपा तीनों ही खेतिहर समुदाय हैं। भले ही इन जातियों का बीता इतिहास सुनहरा रहा हो, लेकिन इनमें भी एक तबका ऐसा है जो खेती की जोतें छोटी होने और नौकरियां न मिलने के चलते गरीबी के दलदल में फंस गया है। लेकिन, इस तरह आरक्षण को रेवड़ी की तरह बांटना भी तो सही नहीं होगा। ऐसे में सरकार को वोटबैंक की राजनीति और किस राज्य में किस जाति की कितनी आबादी है, इस गणित में फंसे बिना कुछ उपाय करने चाहिए।

इनमें से कुछ उपाय जो मुझे सूझे हैं, मैं उनका उल्लेख कर रहा हूं। यदि आपके जेहन में भी इस आरक्षण व्यवस्था को लेकर कुछ सुझाव हैं तो आप उनका जिक्र कर सकते हैं।

– दलितों एवं पिछड़ी जातियों को मिल रहा आरक्षण जस का तस रहना चाहिए।

– जाट, कूपा एवं पटेल समेत अन्य जातियों के गरीबों को (पूरे समुदाय को नहीं) नौकरी एवं शिक्षा में आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया जाना चाहिए।

– एलपीजी सब्सिडी वापस लौटाने की तरह ही कुछ ऐसे लोग जो समाज में ऊंचे पायदान पर पहुंच चुके हैं और उन्हें लगता है कि अब वे आरक्षण के बिना आगे बढ़ सकते हैं, उन्हें इस सुविधा से खुद को अलग कर लेना चाहिए। इसकी मुहिम समुदायों के नेताओं की मदद से ही आगे बढ़ सकती है।

– कुछ लोगों के आरक्षण लौटाने से उनके ही समाज के किसी गरीब को मदद मिलेगी।

– देश में कई ऐसे क्षेत्र हैं, जो बेहद पिछड़े हैं। वहां रहने वाले किसी भी समुदाय के लिए मुख्यधारा में शामिल होना चुनौती है। ऐसे लोगों को उनकी भौगोलिक स्थिति के आधार पर ही केंद्रीय नौकरियों एवं शिक्षण संस्थानों में आरक्षण दिया जाना चाहिए।

– लद्दाख, हिमाचल-उत्तराखंड के दुर्गम पहाड़ी इलाके और पूर्वोत्तर राज्यों को इसमें शामिल किया जा सकता है।

– आरक्षण को लेकर राजनीति नहीं होनी चाहिए। इससे अधिक आबादी वाली जातियों को वोट बैंक का फायदा मिलता है, लेकिन अल्पसंख्यक जातियों की परवाह करना भी तो सरकार का ही काम है।

– आरक्षण का फैसला किसी समाज की स्थिति का आकलन करने के बाद ही होना चाहिए। जिसकी लाठी, उसका आरक्षण की तर्ज पर फैसले हुए तो हालात भयावह हो सकते हैं।

(नवभारत टाइम्स डॉट कॉम में प्रकाशित ब्लॉग)

आखिर हम खोया जम्मू-कश्मीर कब लेंगे?

जेएनयू में पिछले दिनों कुछ छात्रों ने जब कश्मीर की कथित आजादी को लेकर नारेबाजी की तो एक बार फिर समूचे देशवासियों का ध्यान राष्ट्र के इस महत्वपूर्ण हिस्से की ओर गया। आमतौर पर जम्मू-कश्मीर की चर्चा दिल्ली या अन्य हिस्सों में तभी होती है, जब कोई विवाद होता है या सरकार गठन का कोई मसला होता है। लेकिन, आज 22 फरवरी की तिथि इस प्रदेश और देश के लिहाज से बेहद अहम है। आज ही के दिन 1994 को भारत की संसद ने पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर को वापस लेने का संकल्प दोहराया था। (22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तानी कबाइलियों और सेना ने अचानक हमला बोल राज्य के बड़े हिस्से पर कब्जा जमा लिया था।)

फिलहाल जम्मू-कश्मीर के 2,22,236 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में से 1,01,387 वर्ग किमी का इलाका भारत का है। इसमें से 26,293 वर्ग किमी में जम्मू बसा है, जबकि 59,146 किलोमीटर का क्षेत्रफल लद्दाख का इलाका है, बाकी बचा 15,948 वर्ग किमी का हिस्सा कश्मीर घाटी का है। इसके अलावा जम्मू-कश्मीर रियासत का 78,114 वर्ग किमी हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में है। यही नहीं चीन ने भी भारत के इस अहम हिस्से के 37,555 किमी क्षेत्रफल पर अपना कब्जा जमा रखा है। वहीं, पाकिस्तान ने चीन को अपने कब्जाए इलाके में से 5,180 वर्ग किमी हिस्सा चीन को सौगात के तौर पर सौंप दिया है।

इन आंकड़ों को यहां इसलिए दोहराया गया ताकि हमें इस बात का अहसास हो सके कि देश का कितना बड़ा हिस्सा पाकिस्तान और चीन के कब्जे में चला गया है। इसी हिस्से को वापस पाने के लिए भारत की संसद ने अपना संकल्प दोहराया था, यहां से निर्वाचित होने वाले 22 विधायकों के लिए आज भी राज्य विधानसभा में 22 सीटें खाली पड़ी हैं। लेकिन, दुखद बात यह है कि हम इस संकल्प पर रत्ती भर भी आगे नहीं बढ़े हैं। उल्टे माहौल यह पैदा हो गया है कि कुछ देशद्रोही तत्व मौजूदा जम्मू-कश्मीर को भी भारत से छीनने के नारे दे रहे हैं। यहां मेरा मंतव्य उन नारों में जाना नहीं है, लेकिन सरकार समेत पूरे समाज को इस बात की ओर ध्यान देने की आवश्यकता है कि हमने क्या खोया और क्या पाया है। 

1994 के बाद से अब तक झेलम में बहुत पानी बह चुका है, लेकिन हम उस खोए हिस्से को पाने के कोई प्रयास करते नहीं दिखे हैं। कांग्रेस की सरकार हो या राष्ट्रवाद के नाम पर सत्ता में आने वाली बीजेपी, कोई भी दल इस मामले में प्रयास नहीं कर सका है।

उल्टे ऐसा माहौल तैयार हो गया है, जैसे हम इस हिस्से को ही भूल गए हों। 22 साल पहले पारित इस प्रस्ताव की हम चर्चा भी नहीं करते। रणनीतिक मोर्चे पर भारत सरकार की यह बड़ी चूक है, एक तरफ हम दक्षिण चीन सागर में चीन से लोहा लेने की तैयारियां करने की बात करते हैं, वहीं देश का ही एक बड़ा हिस्सा चीन और पाक के कब्जे में है और हमारी राजनीतिक सत्ता मौन है। 

पाक और चीन के कब्जे में गया यह इलाका रणनीतिक तौर पर कितना महत्वपूर्ण है, इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि गिलगित-बल्तिस्तान के पूरे क्षेत्रफल को पाकिस्तान ने चीन को ही सौंपने का ऑफर दे दिया है। यही नहीं चीन ने तिब्बत से लेकर पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह तक रेल नेटवर्क तैयार करने का भी काम शुरू कर दिया है, यह इसी इलाके से होकर गुजरेगी। भारत दोतरफा घिर रहा है, लेकिन हम मौन हैं।

अकसर पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र में जाकर जम्मू-कश्मीर के मुद्दे को उठाने की कोशिश करता है और हमारी सरकार बचाव करती दिखती है कि इस पर तो बात ही नहीं होनी चाहिए। मेरा सवाल है कि यह रक्षात्मक रवैया क्यों, हम यह पक्ष क्यों नहीं रखते कि बात होनी चाहिए लेकिन इस पर कि पाकिस्तान अवैध रूप से कब्जाए इलाके से अपना कब्जा कब छोड़ेगा? पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की जो दुर्दशा पाक सरकार और आतंकियों ने कर रखी है, उस मुद्दे को भी हमें संयुक्त राष्ट्र में उठाना चाहिए। 26 बरस पूरे हो चुके हैं, यह वक्त कम नहीं होता।

गिलगित के रहने वाले शिंगे हसनेन शेरिंग ने पिछले साल अपने भारत दौरे के वक्त इस बात का जिक्र किया था कि इस इलाके में किस तरह से चीन और पाक स्थानीय लोगों का दमन कर रहे हैं। वहां का एक तबका आज भी भारत से जुड़ने की चाह रखता है, लेकिन हमारी सरकार है कि इस मसले पर कुंभकर्णी नींद से जागने का नाम ही नहीं ले रही। वहीं, तिब्बत को पहले ही लील चुका चीन इस इलाके के रणनीतिक महत्व को समझते हुए इसे भी डकारने और भारत की घेरेबंदी की कोशिशों में जुटा है। अब वक्त आ गया है, जब भारत के टुकड़े करने के नारे लगाने वाले लोगों पर कार्रवाई के साथ ही भारत को अपने उन हिस्सों को भी सहेजने की कोशिश करनी चाहिए, जिन्हें षड्यंत्र और छलपूर्वक उससे छीन लिया गया है।

गिलगित-बल्तिस्तान का रणनीतिक महत्व

गिलगित-बल्तिस्तान का क्षेत्र करीब 90 हजार वर्ग किलोमीटर है, जिसमें से 20 हजार वर्ग किमी हिस्सा चीन के कब्जे में है। गिलगित-बल्तिस्तान की सीमाएं अफगानिस्तान, कजाकिस्तान, पाकिस्तान, चीन व भारत के साथ लगी हैं। इसी कारण चीन अपनी विस्तारवादी एवं दादागिरी की नीयत से इस इलाके में अपनी पैठ बढ़ा रहा है, ताकि उसका चारों ओर से भारत को घेरने का मकसद भी पूरा हो सके। गिलगित-बल्तिस्तान के रणनीतिक महत्व को इस बात से ही समझा जा सकता है कि पूर्व में इसकी सीमाएं सोवियत यूनियन तक से लगती थीं। अंग्रेजों ने मध्य एशिया में अपनी पैठ बनाने के मकसद से 1935 में महाराजा हरिसिंह से समझौता कर गिलगित-बल्तिस्तान इलाके को लीज पर ले लिया था। इस इलाके की सुरक्षा व प्रशासन की जिम्मेदारी अंग्रेजों के हाथ में थी। 1947 में इस क्षेत्र को उन्होंने महाराजा को वापस कर दिया। इसकी सुरक्षा के लिए अंग्रेजों ने एक अनियमित सैनिक बल गिलगित स्काउट का भी गठन किया था।

(नवभारत टाइम्स डॉट कॉम में प्रकाशित ब्लॉग)

इसलिए टूट रहा है वामपंथ का ‘लालकिला’

बीते कुछ दशकों में भारतीय राजनीति को यदि सबसे बड़ा नुकसान हुआ है तो वह है ‘वामपंथ का बर्बादी की ओर बढ़ना’। जेएनयू में कुछ वामपंथी विचारधारा के छात्रों की ओर से भारत विरोधी नारे लगाने से लेकर रोहित वेमुला की मौत पर राजनीतिक रोटियां सेंकने, याकूब की फांसी पर अनर्गल विलाप करने, मालदा पर चुप्पी साधने, बीफ पार्टियां करने, कश्मीर की आजादी के नारों का समर्थन करने तक ऐसी तमाम हरकतें इस बात की बानगी हैं कि वामपंथ अब आत्मघाती राह पर है। वामपंथी संगठनों की ओर से इस तरह के अनर्गल मुद्दे उठाना यह साबित करता है कि उनके पास रचनात्मक मुद्दों की कमी हो गई है, या वह कम मेहनत पर ज्यादा फसल काटना चाहते हैं।

यह सही है कि भारत माता की वंदना करने में वामपंथी विचारधारा के लोगों को कभी दिलचस्पी नहीं रही, सैनिकों को वह सरकारी लठैत कहते रहे हैं, अदालत (याकूब मेमन और अफजल गुरु के मामले में) यदि उनकी सोच के अनुकूल फैसला न दे तो उस पर भी सवाल उठाने लगते हैं। अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर वह यह सब करते रहे हैं। भले ही भारतीय वामपंथ की वैचारिक प्रेरणा के स्रोत कहे जाने वाले चीन और रूस में इस तरह की आजादी न हो (थ्येन मेन चौक का गोलीकांड याद रखना चाहिए), लेकिन भारत में मिलती रही है। यह तभी संभव हुआ है, जब भारत में स्थिरता रही है, लोकतंत्र मजबूत रहा है और यह सहिष्णु देश आबाद रहा है। लेकिन, सोचिए यह देश बर्बाद हो जाए और टुकड़े हो जाएं तो क्या इस तरह की आजादी किसी को मिल सकेगी?

वामपंथी राजनीति हो या दक्षिणपंथी, हर तरह की राजनीति तभी चल सकेगी, जब यह देश रहेगा। यदि भारत ही बर्बाद हो जाएगा तो फिर क्या? लेकिन वामपंथी खेमा 16 मई, 2014 के बाद से इतनी अधीरता और बौखलाहट में आ गया है कि गालियों की भाषा में बात करने लगा है। कभी सभ्यता और पढ़ाई-लिखाई को अपनी बपौती मानने वालों के नारे ऐसे हो गए हैं कि सड़क छाप गुंडे भी शरमा जाएं, ‘नीम का पत्ता कड़वा है, नरेंद्र मोदी… है।’ मेरा सवाल है कि मित्रो, आप ऐसा क्यों कर रहे हैं?

आपके या दूसरे खेमे के लोगों की विचारधारा अलग हो सकती है, लेकिन हैं तो सब भारतीय ही न? भारत की मंगलकामना तो देश में हर विचार के व्यक्ति को करनी ही चाहिए। लेकिन, दुर्भाग्य से वामपंथी राजनीति मतिभ्रम का शिकार हो गई है, अभिव्यक्ति की आजादी की बात करते-करते वह देशद्रोहियों की गोद में जानकारी बैठ गई है। वामपंथ का ऐसा चरित्र पहले न देखा था।

वाजिब मुद्दे उठाने से बढ़ेगा आधार

हालिया सरकार की ही बात करें तो एक तरफ कॉरपोरेट जगत को भारी सब्सिडी विकास के नाम पर दी जा रही है। वहीं, किसानों की सब्सिडी में कटौती की जा रही है। बैंकों के लाखों करोड़ रुपये एनपीए में चले गए हैं, यह कर्ज कंपनियों ने ले रखा था। सरकार उसे भूल नया पैकेज जारी करने की तैयारी में है, जबकि किसान की जमीन 50 हजार के कर्ज पर भी नीलाम हो जाती है। मजदूरों का बुरा हाल है, उस पर भी राजस्थान और अन्य बीजेपी शासित राज्यों में श्रम सुधार कानूनों के नाम पर गरीबों का हक मारा जा रहा है। रोजगार के अवसर छीने जा रहे हैं, लेकिन वामपंथी मौन साधे हैं। यह वह रचनात्मक मुद्दे हैं, जिनका विरोध कर वह अपनी खोई जमीन हासिल कर सकता है। इसके लिए उसे देशद्रोहियों की भाषा नहीं बोलनी पड़ेगी। हिंदू-मुसलमान की बजाय मजदूर, दलित-सवर्ण की बजाय वामपंथ यदि किसान की बात करे तो उसकी सेहत के लिए ज्यादा अच्छा रहेगा। मजदूर और किसान में हिंदू, मुसलमान, सवर्ण और दलित तक सभी शामिल हैं।

सीखना होगा विपक्ष में रहना

पिछले कुछ दिनों से वामपंथी बुद्धिजीवी और ऐक्टिविस्टों का जो स्वर है, वह विरोध से ज्यादा बौखलाहट प्रतीत होता है। मेरे कई मित्र हैं, जो कह रहे हैं कि 16 मई, 2014 की तारीख के बाद से देश का माहौल बिगड़ गया है। एक बड़े इतिहासकार ने तो आरएसएस की तुलना इस्लामिक स्टेट से कर दी। बिना किसी तथ्य के इस तरह की बात करना बौखलाहट नहीं तो क्या है? कुछ लोगों ने पुरस्कार वापसी का ही अभियान छेड़ दिया, वह भी सिरे नहीं चढ़ा। फिर रोहित वेमुला की आत्महत्या को दलित उत्पीड़न करार देकर राजनीतिक रोटियां सेंकने लगे, वहां से भी खाली हाथ लौटना पड़ा। इसकी वजह यही थी कि उनके मुद्दे रचनात्मक नहीं थे। उनका विरोध सिर्फ विरोध के लिए था। दरअसल, करीब 7 दशकों में इतनी बुरी तरह हाशिये पर जाने की स्थिति वामपंथियों ने कभी नहीं झेली थी, लेकिन मित्रो, ऐसा दौर भी आता है, राजनीति में आपको विपक्ष में भी रहना सीखना होगा। इस मामले में वामपंथी मित्र वैचारिक तौर पर अपने कट्टर विरोधी संगठन आरएसएस से भी सीख सकते हैं, जो दशकों तक सत्ता से दूर रहा, लेकिन भारत की बर्बादी की कामना कर कभी सत्ता में आने की कोशिश नहीं की।

बदलाव खुद से शुरू करना होगा

‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’। यह बात वामपंथ पर एकदम सटीक लगती है। यह सही है कि आरएसएस और कांग्रेस समेत तमाम राजनीतिक दल दलितों एवं समाज के पिछड़े तबकों को उनका वाजिब हक देने में असफल रहे हैं। लेकिन वामपंथी दलों और विचारकों को अपने भीतर भी झांकना चाहिए। बीते 51 सालों में सीपीएम के पोलित ब्यूरो में यदि एक भी दलित को जगह नहीं मिल सकी है तो यह किसकी कमी है? क्या वहां भी आरएसएस के चलते दलितों को नेतृत्व में हिस्सा नहीं मिल सका? रोहित वेमुला के मामले में रोना मचाने वाले मित्रों को इन सवालों का भी जवाब देना होगा कि नक्सलियों का नेतृत्व भी ब्राह्मणों के हाथ में ही क्यों है और मरने को दलित ही क्यों हैं? साफ है कि वामपंथ को खुद से बदलाव की शुरुआत करने की जरूरत है।

(नवभारत टाइम्स डॉट कॉम में प्रकाशित ब्लॉग)

Wednesday, July 9, 2014

इराक की तपिश


अमेरिका के हाथों बर्बाद हो चुकी दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक मेसोपोटामिया यानी इराक एक बार फिर अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है। सद्दाम हुसैन को सबक सिखाने के लिए 20 मार्च, 2003 को हुए अमेरिकी हमले में देश की तबाही तो पहले ही हो चुकी थी, अब विखंडन की राह पर भी आगे बढ़ता दिख रहा है। लेकिन सबसे बड़ा खतरा यह है कि एक बार फिर दुनिया में आतंकवाद का खतरा पैदा होने लगा है। वहीं, इराक में छिड़ा सांप्रदायिक संघर्ष इस्लामिक जगत में भी शिया और सुन्नी देशों के बीच तलवारें खिंचने की वजह साबित हो सकता है। इराक में इस्लाम के ही तीन वर्ग रहते हैं, शिया, सुन्नी और कुर्द। कुर्द भी सुन्नी समुदाय का ही एक वर्ग हैं, लेकिन अरबी मूल के अन्य सुन्नियों से यह भिन्न हैं। 

    इराक इन तीन समुदायों के शिविर क्षेत्रों में विभाजित हो चुका है। सुन्नियों ने जहां देश के मध्य क्षेत्र के सूबों पर कब्जा जमा रखा है, वहीं शियाओं ने दक्षिण के राज्यों पर अपना आधिपत्य कायम किया है। जबकि कुर्द लड़ाकों की उत्तरी इलाके में स्वायत्त सत्ता है। सद्दाम हुसैन की बाथ पार्टी भी सुन्नियों की ही राजनीति करती थी। वैसे तो सद्दाम का शासन सेकुलर था, लेकिन शियाओं को सत्ता के केंद्र से को दूर ही रखा गया। देश में सांप्रदायिक संघर्ष की नींव तभी से पड़नी शुरू हुई थी, लेकिन अमेरिकी सैनिकों के इराक से वापस जाने के बाद यह संघर्ष और बढ़ गया। इसकी वजह शियाओं और सुन्नियों के बीच सत्ता पर आधिपत्य जमाने की होड़ थी। अमेरिका ने सद्दाम का खात्मा करने के बाद शिया नेता नूर-अल मलिकी को शासन की बागडोर सौंपी, लेकिन ईरान की शिया सरकार से बढ़ती नजदीकी के कारण अमेरिका को यह दांव उल्टा पड़ता दिखा। जानकार मानते हैं कि अमेरिका ने ही अलकायदा की इराकी इकाई आईएसएस ;इस्लामिक स्टेट इन इराक एंड सीरियाद्ध को बढ़ावा देने का काम किया ताकी ईरान और इराक की शिया सरकारों के बीच बढ़ रही एकता से अमेरिका के लिए संभावित खतरों को समाप्त किया जा सके। लेकिन, इसमें कोई दोराय नहीं कि अमेरिका द्वारा तालिबान की ही तर्ज पर खड़ा किया गया यह संगठन भविष्य में दुनिया के लिए एक बड़ा खतरा साबित हो सकता है। 
        
        भारत की दृष्टि से बात करें तो कश्मीर का मुद्दे पर पाक स्थित सुन्नी आतंकी संगठनों को आईएसआईएस का प्रश्रय मिलने की भी संभावना है। मालूम हो कि जम्मू-कश्मीर में भी मुस्लिमों का ही हिस्सा शिया और गुर्जर बकरवाल समाज उपेक्षा का शिकार होता रहा है। यहां तक कि श्रीनगर में ताजियों को लेकर भी शिया-सुन्नी रहा है। ऐसे में जम्मू-कश्मीर में एक बार फिर सुन्नी आतंकवाद सिर उठा सकता है। आईएसआईएस के कश्मीर तक हस्तक्षेप करने की संभावना की बड़ी वजह उसके मुस्लिम जगत के रहनुमा बनने की चाह है। ऐसे में भारत में सुन्नी मुस्लिमों के एक बड़े वर्ग को प्रभावित करने और कश्मीर में आतंक की नई पौध जमाने के लिए वह इस क्षेत्र में दखल के प्रयास कर सकता है। गौरतलब है कि अलकायदा, लश्कर-ए-तोयबा और तालिबान जैसे आतंकी संगठन भारत में अपने आधार को बढ़ाने और भारतीय मुसलमानों को बरगलाने के लिए कश्मीर को एजेंडे की तरह इस्तेमाल करते रहे हैं। इन सभी आतंकी संगठनों को कश्मीर के भ्रमित सुन्नी युवाओं के बीच ही कमांडरों की तलाश रहती है। इन बेरोजगार और कट्टरपंथियों के प्रभाव वाले युवाओं को भारत के अन्य हिस्सों के मुस्लिम युवाओं की तुलना में बरगलाना आसान होता है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश समेत देश के तमाम हिस्सों में सांप्रदायिक तनाव भी ऐसे आतंकी संगठनों के लिए उर्वर साबित हुए हैं। इस सबको ध्यान में रखते हुए भारतीय खुफिया एजेंसियों और सरकार को इराक से अपने नागरिकों की सुरक्षित रिहाई के साथ ही देश में आतंकवाद के खतरे को बढ़ने से भी रोकना होगा। इराक की तपिश में हम न तपें कम से कम इसका ख्याल तो हमें रखना ही होगा।

तेल भी है संघर्ष की बड़ी वजह
इराक में जारी वर्तमान संकट की एक बड़ी वजह तेल भी है। यह देश दुनिया में तेल की उपलब्धता के लिहाज से पांचवां और उत्पादकता के लिहाज से आठवां सबसे बड़ा देश है। आईएसआईएस को खड़ा करके अमेरिका तेल के मामले में भी अपना हित सधता देख रहा है। इराक में 17 फीसदी तेल रिफाइनरी कुर्दों के आधिपत्य वाले दक्षिणी क्षेत्र में ही हैं। इराक में 3ण्3 अरब बैलर तेल का उत्पादन प्रतिदिन होता है। हालिया हिंसा के चलते तेल उत्पादन प्रभावित होने और अंतरराष्टीय आपूर्ति में भी कमी आने की संभावना है।

दूसरे देशों के लिए चिंता की वजह
सन् 2003 में सद्दाम हुसैन के सत्ता से बेदखल होने के बाद से इराक क्षेत्रीय ताकतों के लिए संघर्ष के मैदान में तब्दील हो गया है। इराक की शिया सरकार ईरान और सीरिया के करीब है। इसकी वजह वहां भी शिया सरकार होना है। जबकि सुन्नी शासन वाले सउदी अरब और कतर की सरकारें सुन्नी आतंकियों को समर्थन कर रही हैं ताकी सीरिया, ईरान और इराक में अपना प्रभुत्व बढ़ाया जा सके। आईएसआईएस की शुरूआत सीरिया से ही हुई थी, लेकिन बशर अल असद की सरकार से निपटने में विफल रहने के बाद इन लड़ाकों ने अस्थिरता के दौर से गुजर रहे इराक की ओर रूख किया। जहां पहले से छिड़े सांप्रदायिक संघर्ष के चलते इसे अपनी जड़ें जमाने में आसानी हुई।

भविष्य के खतरे
आईएसआईएस आतंकियों ने इराक के महत्वपूर्ण शहर मोसुल में कब्जा जमाने के बाद बगदाद की ओर रूख किया है। भविष्य में इस आग के और भड़कने की संभावना है। ईरान को नूर अल मलिकी की शिया सरकार के साथ ही इराक में रह रहे शिया और कुर्दों की भी चिंता है। इसके अलावा कुर्दों की बड़ी आबादी वाले तुर्की को भी इराक की अस्थिरता ने परेशानी में डाला है। फिलहाल शिया और सुन्नी संघर्ष का मैदान बने इराक में यदि यह झगड़ा बढ़ता है तो तुर्की से अफगानिस्तान तक फैले कुर्द भी कुर्दिस्तान की लड़ाई का ऐलान कर सकते हैं। गौरतलब है कि अफगानिस्तान से नाटो सेनाओं की वापसी के बाद से तालिबान की पकड़ मजबूत हुई है। ऐसे में इराक से लेकर अफगानिस्तान तक यदि आतंकियों का गठजोड़ बनता है तो यह कोई अचरज की बात नहीं होगी।

Wednesday, July 10, 2013

ड्रैगन की ढाल बना चीनी मीडिया


किसी भी देश में लोकतंत्र को बनाए रखनेजनहित की आवाज उठाने के लिए मीडिया को महत्वपूर्ण माना जाता है। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कूटनीति में भी मीडिया का योगदान होता हैजिसे नकारा नहीं जा सकता।खाड़ी युद्ध के बाद से तो अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति के स्तर पर मीडिया का इस्तेमाल बढ़ा है। 

अमरीका-इराक युद्धअमरीका अफगान युद्ध में भी अमरीकी पक्ष को आतंक के मुक्तिदाता के रूप में दिखाने के लिए इस्तेमाल कियागया था। इराक के पूर्व शासक सद्दाम हुसैन की मूर्ति को गिरते हुए और वहां कुछ इराकी लोगों के नृत्य करने के दृश्य को टेलीविजन चैनलों पर बार-बार दिखाया गया था। 

इससे यह साबित करने का प्रयास किया गया थाकि इराक पर अमरीकी हमले से इराकियों को खुशी है और वह इसको सद्दाम के दुर्दांत शासन से मुक्ति के तौर पर देख रहे हैं। कुछ ऐसा ही रवैया भारतीय सीमा में चीनी सैनिकों की घुसपैठ के बाद चीनी मीडिया का भी था।चीन के सैनिकों के भारतीय सीमा में घुसने के बाद स्वाभाविक रूप से सीमा पर तनाव बढ़ना था। हालांकि भारत सरकार इस मुद्दे पर आश्चर्यजनक रूप से चुप्पी साधे रहीलेकिन विपक्षी दलों और मीडिया ने जरूर इस मुद्देपर सरकार को प्रमुखता से घेरने का काम किया। वहीं चीनी मीडिया ने अपनी सरकार की विस्तारवादी नीतियों के लिए ढाल के रूप में काम किया। बीते 15 अपै्रल को लद्दाख के दौलत बाग ओल्डी सेक्टर में भारतीय सीमाके अंदर 19 किलोमीटर तक चीनी सैनिकों के घुसपैठ करने के बाद भारत-चीन सीमा पर तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई थी। इस मुद्दे पर चीनी मीडिया के रूख की बात करें तो उसने घुसपैठ के मुद्दे को ही भटकाते हुए इसेभारतीय मीडिया की देन बताया। जबकि चीनी मीडिया बड़ी चालाकी से इस बात को टाल गया कि आखिर भारत-चीन सीमा पर तनाव का कारण तो भारतीय सीमा में चीनी सैनिकों की घुसपैठ ही है। 
चीन की विस्तारवादी नीति के लिए ढाल का काम करते हुए चीन के प्रचलित समाचार पत्र ने भारत-चीन के बीच तनाव का कारण बताते हुए लिखा कि-
 ‘‘भारत-चीन के बीच तनाव की स्थिति उस वक्त उत्पन्न हुईजबभारतीय मीडिया ने यह प्रचारित किया कि भारत-चीन की पश्चिमी विवादित सीम में चीनी सैनिकों ने मध्य अप्रैल में घुसपैठ की है।‘‘ (http://english.peopledaily.com.cn/90883/8234989.html½
वहीं चीनी सरकार के पक्ष में चाइना डेली ने लिखा कि- ‘‘बीजिंग ने इन आरोपों को विवादास्पद करार दिया है और कहा कि चीनी सैनिक सीमा पर शांति और सौहार्द की स्थिति बनाए रखने के लिए तत्पर है और सैनिकों नेभारतीय सीमा में प्रवेश नहीं किया है।‘‘ (http://english.peopledaily.com.cn/90883/8234989.html½
चीनी मीडिया की इस रिपोर्टिंग के माध्यम से आसानी से यह पता चलता है कि किस प्रकार चीनी सरकार की विस्तारवादी नीति के लिए प्रोपेगेंडा फैला रहा है। प्रोपेगेंडा यह कि पहले तो चीनी मीडिया ने लाइन आफ कंटोलको ही विवादासपद करार दियाजिस पर भारत को हमेशा से ऐतराज रहा है। इस एक दांव के जरिए चीनी मीडिया ने भारत के ऐतराज को ही निराधार साबित करने की कोशिश की। 

किसी झूठ को सत्य की भांति प्रचारितकरने या उसको सत्य के स्थान पर प्रस्थापित करने के प्रयास को प्रोपेगेंडा कहा जाता है। दूसरे शब्दों में यह भी कहा जाता है कि किसी झूठ को सौ बार बोला जाए तो वह सत्य प्रतीत होने लगता है। चीनी मीडिया ने भीलाइन आफ कंटोल को विवादित ठहराने के झूठ को ही दोहराने का फैसला कर लिया है। चीनी मीडिया के इस प्रोपेगेंडे के असर की बात की जाए तो पश्चिमी देशों के मीडिया जगत में भी इसका प्रभाव हुआ और उन्होंने भीभारत-चीन के बीच तनाव को घुसपैठ नहीं बताया। पश्चिमी मीडिया ने कहा कि भारतीय मीडिया और अधिकारियों की ओर से यह कहा गया है कि चीनी सैनिकों ने भारतीय सीमा में घुसपैठ कीतब से ही भारत और चीनसीमा पर तनाव की स्थिति बनी हुई है। चीनी मीडिया के प्रोपेगेंडे के असर को देखने के लिए 3 मई को वायस आफ अमरीका की वेबसाइट पर प्रकाशित रिपोर्ट को देखना उचित होगाजिसने लिखा-
‘‘पिछले महीने भारतीयअधिकारियों ने बताया था कि चीनी सैनिकों ने भारत-चीन की लद्दाख सीमा में घुसपैठ कर अपने टेंट लगा लिए हैं। वहीं चीन ने इस आरोप को नकारते हुए कहा कि चीनी सैनिकों ने कोई घुसपैठ नहीं की है और वे वास्विकनियंत्रण रेखा के चीनी इलाके में ही हैं। यह घटना लंबे समय से चीन-भारत के मध्य चले  रहे सीमा विवाद का ही हिस्सा हैजो कई दौर की वार्ताओं के बाद भी सुलझ नहीं सका है।‘‘(http://www.voanews.com/content/reports-of-possible-breakthrough-in-india-china-border-dispute/1655087.html½ 
वायस आफ अमरीका की इस रिपोर्ट का विश्लेषण करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि जो सीमा विवादित नहीं थीमीडिया रिपोर्टों ने उस सीमा को विवादित प्रचार करना शुरू कर दिया। यहीं नहीं चीन की दुस्साहसी घुसपैठको नजरअंदाज करते हुए इसे लंबे समय से चले  रहे सीमा विवाद का ही एक हिस्सा करार दिया। कहना  होगा कि मीडिया की रिपोर्टें आने वाले वक्त के लिए एक दस्तावेज भी होती हैं और वह दस्तावेजीकरण यदिएक प्रोपेगेंडे के तहत ही हो तो सच के स्थापित होने की संभावनाएं कहां रह जाएंगी। इसी मामले में जब भारत सरकार ने देश में उभर रहे जनाक्रोश के कारण चीनी उत्पादों को भारतीय बाजार में रोकने के उपक्रम शुरू किएतो चीनी मीडिया और सरकार ने एक बार फिर अपने रूख में बदलाव किया। इसकी बानगी यह है कि बीते 9 मई को सलमान खुर्शीद की भारत यात्रा का चीनी मीडिया ने जमकर स्वागत किया और सीमा के मुद्दे को नेपथ्यमें धकेलते हुए व्यापारिक संबंधों को महत्वपूर्ण बताने का काम किया। यही नहीं चीन ने एशिया के दो बड़े देशों में उपजे तनाव के लिए अपनी नीतियों को नहीं बल्कि पश्चिमी मीडिया के प्रचार को दोषी ठहराया। चीन कीकम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र पीपुल्स डेली ने लिखा कि-
‘‘भारतीय विदेश मंत्री की चीन यात्रा दोनों ही देशों के लिए महत्वूपर्ण है और यह दुनिया के दो बड़े देशों के बीच मित्रता को बढ़ाने में सहायक होगी। खुर्शीद के दौरे ने सारेविश्व का ध्यान आकर्षित किया है और पश्चिमी मीडिया ने इस दौरे का कारण रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता और सीमा विवाद बताया है‘‘ (http://english.peopledaily.com.cn/90883/8239917.html½    
चीनी मीडिया जिसने घुसपैठ के बाद बढ़े तनाव के लिए भारतीय मीडिया को जिम्मेदार बताया थाउसने ही अपने रूख में बदलाव करते हुए पश्चिमी मीडिया पर दुष्प्रचार का आरोप जड़ दिया। कहना  होगा कि चीन केसाम्राज्यवादी मंसूबों की सफलता के लिए चीनी मीडिया ने भी सरकार की ढाल के रूप में काम किया। दूसरी तरफ भारतीय मीडिया की बात करें तो वह भारत के राष्टीय हितों को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने मेंअसफल रहा अथवा उसने इसका प्रयास ही नहीं किया। इसके उलट भारत का मीडिया रेप जैसे मामलों पर तेजतर्रार दिखायहां कहने का अर्थ यह नहीं है कि मीडिया को रेप के मामलों को तवज्जो नहीं देनी चाहिए। लेकिनराष्टहित से जुड़े मुद्दे भी तो मीडिया विमर्श के लिए कुछ मांगते हैं। 

हालांकि चीन की मीडया से भारत की तुलना नहीं की जा सकती क्योंकि चीन में मीडिया पूरी तरह सरकार अधीन है। वहीं भारत में मीडिया का अपनास्वतंत्र अस्तित्व है। पर इस स्वतंत्र अस्तित्व का अर्थ सरकार को दर्पण दिखाना ही नहींराष्टहित के लिए कुछ अर्पण करना भी है। अंतर्राष्टीय कूटनीति के स्तर पर यह जरूरी लगता है कि मीडिया और सरकार समन्वितरूप से कार्य करें और दोनों एक ही स्वर में बात करें। तभी वैश्विक कूटनीति में भारत भी अपने पक्ष को मजबूती से रख पाएगा। अकसर भारतीय मीडिया ऐसे मुद्दों को तरजीह देता हैजिससे अन्य देशों में भी भारत कीछीछालेदर हो। यह सही है कि देश के भीतर की समस्याओं को उठाना मीडिया काम हैलेकिन भारत की मीडिया को अपनी जिम्मेदारियों का विस्तार करना होगा। उसे वैश्विक परिदृश्य में भारत के अनुकूल नीतियों कोस्थापित करने का प्रयास करना होगा। यदि चीनी मीडिया नए प्रोपेगेंडे गढ़ सकता है और चीन की विस्तारवादी नीतियों की ढाल बन सकता है तो भारतीय मीडिया को भी अपने पक्ष को वैश्विक परिदृश्य में मजबूती सेस्थापित करने के प्रयास अवश्य करने चाहिए।