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Sunday, July 2, 2017

नाम 'पंडित' था तो मार डाला, होते तो क्या करते?

श्रीनगर की जामिया मस्जिद के बाहर राज्य पुलिस के डीएसपी मोहम्मद अयूब पंडित को उन्मादी भीड़ ने सिर्फ इसलिए पीट-पीटकर मार डाला क्योंकि उनके नाम में ‘पंडित’ शब्द शामिल था। वह अपना नाम एम.ए. पंडित लिखते थे। मस्जिद के बाहर सुरक्षा में तैनात पंडित किसी से फोन पर बात कर रहे थे, इस पर उन्मादियों को संदेह हुआ कि वह रिकॉर्डिंग कर रहे हैं। उन पर हमला करने वाली भीड़ ने जब उनके नेमप्लेट पर पंडित लिखा देखा तो वह जानलेवा हो गई और अयूब को वहीं पीटकर मार डाला। ‘पंडित’ शब्द पढ़कर किसी का बेरहमी से कत्ल कर देना बताता है कि कश्मीर घाटी का अलगाववादी तबका किस कदर कट्टर इस्लामिक है। समझा जा सकता है कि जिन लोगों ने सिर्फ एक पंडित शब्द पर अपनी ही सुरक्षा में तैनात अधिकारी को बेदम कर दिया हो, उन्होंने कश्मीरी पंडितों का क्या हाल किया होगा।

यही वजह है कि आज भी देश भर में भटक रहे कश्मीरी पंडित अपने ऊपर हुए अत्याचारों को याद कर सिहर उठते हैं। यह घटना बताती है कि अलगाववादी और उनका अनुसरण करने वाले लोग कथित आजादी के नाम पर इस्लामी निजाम की स्थापना के लिए लड़ रहे हैं, जिसमें किसी कश्मीरी पंडित या सिख के लिए जगह नहीं होगी। यदि उनके नाम का कोई मिल भी जाए तो उसका कत्ल कर दिया जाएगा।

बीते साल हिज्बुल के खूंखार आतंकी बुरहान वानी की मौत के बाद खुद उसकी मां ने स्पष्ट तौर पर कहा था कि उसके बेटे ने आजादी के लिए नहीं, बल्कि इस्लामी निजाम की स्थापना के लिए शहादत दी है। इसके अलावा गाहे-बगाहे इस्लामिक स्टेट के झंडे फहराए जाने और पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगना यह साबित करता है कि कश्मीर में अलगाववादी कौन सी आजादी चाहते हैं।

शब-ए-कद्र की रात हुआ इंसानियत का कत्ल
इंसानियत को रौंदने वाली यह घटना रमजान की 27वीं रात को हुई, जिसे शब-ए-कद्र की मुबारक रात कहा जाता है। इस मौके पर मस्जिदों के साथ खानकाहों और दरगाहों में नमाज व इबादत होती है। लोग अपने-अपने गुनाहों से तौबा करते हैं। माना जाता है कि इस दिन कुरान को आकार मिला था। लेकिन, मस्जिद से नमाज अता करने के बाद निकली उन्मादियों की ‘भीड़’ ने जिस तरह से अयूब का कत्ल कर दिया, वह यह बताने के लिए काफी है कि कश्मीर घाटी की मस्जिदों पर अलगाववादी किस तरह से पैठ बना चुके हैं और वहां से क्या संदेश देने की कोशिश की जा रही है।

कहां हैं गंगा-जमुनी तहजीब की वकालत करने वाले?
इस देश की साझा हिंदू-मुस्लिम संस्कृति को गंगा-जमुनी तहजीब कहने वाले अक्सर देश में सेक्युलरिज्म की बात करते हैं। लेकिन, इस घटना पर ऐसे लोगों की चुप्पी बताती है कि वे गंगा-जमुनी तहजीब के किस स्वरूप को लागू करना चाहते हैं। क्या वह ऐसा सेक्युलरिज्म चाहते हैं जिसमें अयूब के नाम के साथ पंडित जुड़ा हो तो उन्हें कुचलकर मार दिया जाए। उल्लेखनीय है कि पूरे देश की तरह जम्मू-कश्मीर की बड़ी मुस्लिम आबादी पीढ़ियों पहले हिंदू धर्म से ही मतांतरित हुई है।

लेकिन, इस विरासत पर गर्व करने वाले बहुत से ऐसे लोग हैं, जो अब भी अपने पूर्वजों के नाम से जुड़े हैं। अयूब पंडित भी उनमें से एक थे, तो मौजूदा मुस्लिम पहचान के साथ ही खुद को पूर्वजों के नाम से भी जोड़े हुए थे। लेकिन, इस्लामी निजाम की स्थापना का सपना देखने वाले उन्मादियों को भला यह कहां मंजूर था। उससे भी दु:खद है देश भर में सेक्युलरिज्म की वकालत करने वाले राजनीतिक दलों, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों की चुप्पी। यह चुप्पी उनके राजनीतिक हितों को साध सकती है, लेकिन सेक्युलरिज्म की कीमत पर ही ऐसा होगा।

कश्मीर की मस्जिदें क्यों बनीं अलगाववाद का केंद्र?
1990 के दशक में कश्मीरी पंडितों और सिखों के खिलाफ हिंसा का ऐलान वहां की मस्जिदों पर लगे लाउडस्पीकरों से ही होता था। इस ऐलान के बाद उन्मादियों की ‘भीड़’ हजारों सालों से साथ रह रहे पड़ोसियों के कत्ल कर देती थी। महिलाओं के रेप करती थी। इन दिनों एक बार फिर यह दौर देखने को मिल रहा है। बीते कई सालों से हर साल ईद की नमाज के बाद ईदी के तौर पर उन्मादी उपद्रव मचाते हैं। ऐसे में राज्य सरकार को इसके लिए प्रयास करने चाहिए कि कश्मीर घाटी की मस्जिदें अलगाववादियों का केंद्र न बनें। वहां से शब-ए-कद्र की मुबारक रात पर शांति का संदेश ही निकले, न कि मस्जिद से निकल उन्मादी ‘भीड़’ फिर किसी अयूब पंडित को मौत के घाट उतार दे।

(नवभारत टाइम्स डॉट कॉम में प्रकाशित ब्लॉग)

इंसानियत से परे यह कैसी कश्मीरियत!

भारत की आजादी के 70 साल होने को हैं। बंटवारे के समय उत्पीड़न के चलते पश्चिमी पाकिस्तान से भागकर जम्मू-कश्मीर आए शरणार्थियों को आज भी अपने अस्तित्व की तलाश है। मौजूदा बीजेपी-पीडीपी सरकार ने उन्हें मामूली राहत देते हुए आवास प्रमाण पत्र जारी करने का फैसला लिया है ताकि वे केंद्रीय संस्थानों और अर्ध सैनिक बलों में नौकरियों के लिए आवेदन कर सकें। ध्यान रहे कि अब भी उनका स्टेटस नहीं बदलेगा और वह प्रदेश विधानसभा के चुनाव में मतदान नहीं कर सकेंगे। सूबे के विभागों में निकलने वाली नौकरियों के भी वे हकदार नहीं होंगे। इन 19 हजार 960 परिवारों के करीब 85 हजार लोगों के पास आम चुनाव में मतदान का अधिकार है, लेकिन जम्मू-कश्मीर का संविधान विधानसभा चुनाव में उन्हें वोट डालने की अनुमति नहीं देता। विधानसभा और निकाय चुनावों में वही व्यक्ति मतदाता हो सकता है, जो वहां का मूल निवासी हो।

इन 85 हजार लोगों को सिर्फ केंद्र की नौकरियों के आवेदन के लायक दर्जा देने पर जम्मू-कश्मीर की घाटी में कोहराम मचा है। कश्मीरियत और इंसानियत की दुहाई देने वाले कट्टरपंथी इन बेसहारा लोगों को मामूली सहारा दिए जाने के विरोध में सूबे में आग लगाने को तैयार हैं। घाटी बंद का ऐलान किया जा रहे है और कहा जा रहा है कि इससे प्रदेश का जनसंख्या संतुलन बिगड़ जाएगा। इसके उलट इन अलगाववादियों ने हजारों विदेशी मुस्लिम शरणार्थियों को घाटी में पनाह दे रखी है। निश्चित तौर पर यह इंसानियत भी है, लेकिन क्या यह सिर्फ इस्लाम को मानने वालों के लिए ही जगती है। आखिर, जो हमदर्दी सुदूर बर्मा से आए मुस्लिमों के लिए है, वही बेसहारा पश्चिम पाक से आए शरणार्थियों के लिए क्यों नहीं दिखती।

हुर्रियत कॉन्फ्रेंस और नैशनल कॉन्फ्रेंस ने इस मुद्दे पर बवाल काटना शुरू कर दिया है। लेकिन, आज तक रोहिंग्या मुस्लिमों की घाटी में मौजूदगी को लेकर एक पत्थर तक नहीं उछला। क्या कश्मीरियत सिर्फ मुस्लिमों से हमदर्दी सिखाती है और हिंदुओं से दुश्मनी? अलगाववादियों के सुर में सुर मिला रहे अब्दुल्ला परिवार को भी इन सवालों के जवाब देने होंगे। यदि कश्मीरियत के नाम पर यूं ही शरणार्थियों और बाशिदों के समुदायों को देखकर ही नीतियां बनेंगी तो फिर प्रदेश की समस्याएं हल नहीं होंगी।

अटल बिहारी वाजपेयी ने कश्मीर की नीति के तहत इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत का त्रिसूत्रीय फॉर्म्युला दिया था। 70 साल में पहली बार प्रदेश की सरकार ने इस नीति के पहले फॉर्म्युले, इंसानियत के तहत इन शरणार्थियों को एक पहचान देने का प्रयास किया है। यदि अलगाववादी और अब्दुल्ला परिवार इसी तरह इंसानियत का विरोध करते रहे तो प्रदेश में सांप्रदायिक उन्माद तो फैल सकता है, लेकिन जम्हूरियत और कश्मीरियत पर कभी बात नहीं हो सकेगी।

शरणार्थियों में 80 फीसदी दलित
पश्चिमी पाकिस्तान से आए इन शरणार्थियों में करीब 80 फीसदी संख्या दलित समुदाय के लोगों की है। लेकिन, आज भी भारत जैसे आजाद मुल्क में ये लोग गुलामों की जिंदगी जी रहे हैं। पूरे देश में आपसी रंजिश और अन्य व्यक्तिगत मुद्दों पर झगड़ों में दलित ऐंगल की तलाश करने वाले नेता आखिर यहां क्यों मौन साधे हैं। गुजरात के ऊना में दलितों का उत्पीड़न निश्चित तौर पर चिंता की बात है, लेकिन जम्मू-कश्मीर में उन्हें गुलाम बनाकर रखना कैसे सहन किया जा सकता है।

(नवभारत टाइम्स डॉट कॉम में प्रकाशित ब्लॉग)